हरकी पैड़ी पर सुबह 3 बजे से भारी भीड़ दिखी।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले गुरु पूर्णिमा पर्व ने धर्मनगरी हरिद्वार को एक बार फिर आस्था के रंग में रंग दिया। वेदों के रचयिता महर्षि वेद व्यास की जयंती के रूप में मनाए जाने वाले इस पर्व पर देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने हर
.
सुबह 3 बजे से 4 घंटे में हरकी पैड़ी पर 1.5 लाख श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी। गंगा तटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। हर-हर गंगे और जय गुरुदेव के जयघोषों के बीच श्रद्धालुओं ने गंगा में डुबकी लगाकर अपने गुरुजनों का स्मरण किया और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
गुरु पूर्णिमा का पर्व भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने वेदों का संकलन और महाभारत सहित अनेक महान ग्रंथों की रचना की। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
सनातन परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान दर्जा दिया गया है। यही कारण है कि इस दिन श्रद्धालु पहले गंगा स्नान करते हैं और फिर अपने गुरु या उनकी पादुकाओं का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
तस्वीरें देखिए-

हरकी पैड़ी पर सुबह 6:30 बजे गंगा आरती हुई।

सुबह 3 बजे से ही घाट के दोनों तरफ भीड़ दिखी।

हरकी पैड़ी पर गंगा स्नान करते श्रद्धालु।
कांवड़ यात्रा के बीच दिखा भक्ति का अनूठा संगम
इस वर्ष गुरु पूर्णिमा ऐसे समय पर आई है, जब हरिद्वार में कांवड़ यात्रा भी पूरे उत्साह के साथ जारी है। ऐसे में धर्मनगरी में श्रद्धालुओं और शिवभक्त कांवड़ियों का अनूठा संगम देखने को मिला। एक ओर श्रद्धालु गुरु पूजन और गंगा स्नान के लिए पहुंचे, वहीं दूसरी ओर हजारों कांवड़िए गंगाजल भरकर अपने गंतव्य की ओर रवाना होते नजर आए।
घाटों पर श्रद्धालुओं ने पूरे विधि-विधान से गंगा स्नान किया, दीपदान किया और अपने गुरुओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। कई श्रद्धालु अपने गुरुजनों के आश्रमों में पहुंचकर उनका आशीर्वाद लेने भी पहुंचे। पूरे शहर में धार्मिक अनुष्ठानों, भजन-कीर्तन और पूजा-अर्चना का सिलसिला चलता रहा।

गंगा स्नान करने के बाद कांवड़ ले जाते हुए श्रद्धालु।
‘गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला होता है’
ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज त्रिपाठी ने बताया कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। यह पर्व महर्षि वेद व्यास की स्मृति में मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि गुरु शब्द का अर्थ है- जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करे। जीवन में सही दिशा दिखाने वाला गुरु ही होता है और उसी के मार्गदर्शन से व्यक्ति सफलता और आत्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
उन्होंने बताया कि गुरु पूर्णिमा के दिन तीर्थ स्थल पर स्नान कर अपने गुरु अथवा उनकी पादुकाओं की पूजा करने और अपनी श्रद्धा एवं सामर्थ्य के अनुसार भेंट अर्पित करने का विशेष महत्व है। ऐसा करने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख, समृद्धि तथा उन्नति के मार्ग खुलते हैं।
गंगा स्नान से रोग-शोक दूर होने की मान्यता
पंडित मनोज त्रिपाठी के अनुसार, आषाढ़ी पूर्णिमा पर गंगा स्नान का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक गंगा स्नान करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाले रोग, शोक और अनेक प्रकार की बाधाएं गुरु कृपा से शांत होती हैं। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में पितृ दोष, गुरु संबंधी चांडाल योग अथवा हृदय एवं स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं हों, तो इस दिन गंगा स्नान और गुरु पूजन करने से सकारात्मक फल प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि अपने जीवन में ज्ञान देने वाले गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। गुरु के बताए मार्ग पर चलने से ही जीवन में सफलता, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति संभव होती है।
