जालंधर के कंपनी बाग में 300 साल पुराना बरगद का पेड़।
जालंधर का कंपनी बाग- आज यहां बच्चे खेलते हैं, लोग सैर करते हैं। लेकिन कभी यहां अंग्रेजों का खौफ था। करीब 300 साल पुराना बरगद का पेड़ आज भी खड़ा है, जिस पर अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को लटकाकर फांसी दी थी।
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यही नहीं, 1857 में पास की जालंधर छावनी में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी थी। पकड़े गए विद्रोहियों को फांसी दी गई, कुछ को तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया गया।
इसका नाम कंपनी बाग कैसे पड़ा? इस बरगद की कहानी क्या है? 15 अगस्त पर पढ़िए जालंधर के उस पार्क की कहानी, जिसकी जमीन में अंग्रेजी हुकूमत के खौफनाक किस्से दफन हैं।

कंपनी बाग में मौजूद करीब 300 साल पुराना बरगद का पेड़, जिसे क्रांतिकारियों को फांसी दिए जाने की घटनाओं से जोड़ा जाता है।
जालंधर पर अंग्रेजों का कब्जा, फिर बनी सैन्य छावनी
महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद 1846 में प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने जालंधर पर कब्जा किया। जालंधर दोआबा यानी सतलुज और ब्यास नदियों के बीच के इलाके पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने लाहौर-दिल्ली रूट पर अपनी सैन्य पकड़ मजबूत करने के लिए यहां छावनी बनाई।
छावनी में ब्रिटिश सैनिकों के साथ भारतीय पैदल सेना यानी नेटिव इन्फैंट्री, घुड़सवार सेना और तोपखाने की टुकड़ियां तैनात की गईं। इसके पास ब्रिटिश प्रशासन के मुख्य दफ्तर और अधिकारियों के बंगले भी बनाए गए। प्रशासनिक अधिकारियों और सैन्य अफसरों के विश्राम और सैर के लिए पार्क विकसित किया गया।
जालंधर में ईस्ट इंडिया कंपनी का दफ्तर भी खोला गया। अंग्रेजी फौज की एक कंपनी यहां आई और इसी से इस जगह का नाम कंपनी बाग पड़ने की बात सामने आती है।
कंपनी बाग का 300 साल पुराना बरगद पेड़ और फांसी की कहानी
कंपनी बाग में करीब 300 साल पुराना बरगद का पेड़ आज भी मौजूद है। इतिहासकार दीपक जालंधरी की किताब ‘एक शहर जालंधर’ के अनुसार, अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाने वाले कई क्रांतिकारियों को इसी पेड़ पर लटकाकर फांसी दी गई थी।
दीपक जालंधरी के अनुसार, यह जगह अंग्रेजों के आने से पहले से आबाद थी। बाद में अंग्रेजों ने इसे अपने सैन्य इस्तेमाल के लिए विकसित किया। आज इसी जगह पर लोग सुबह-शाम सैर करने आते हैं और पार्क में बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं।

अंग्रेजों के आने के बाद कई बार बदला कंपनी बाग का नाम
कंपनी बाग का नाम समय के साथ कई बार बदला गया। इतिहासकार दीपक जालंधरी के अनुसार, दिल्ली गेट के सामने होने के कारण इसे पहले दिल्ली पार्क के नाम से जाना जाता था। अंग्रेजी शासन के दौरान जब यहां फौज की टुकड़ी तैनात की गई तो बाग को दोबारा विकसित किया गया। अंग्रेजों ने इसका नाम एम्प्रेस पार्क रखा।
कुछ समय बाद अंग्रेजों ने शहर से बाहर अपनी बड़ी सैन्य छावनी बनाई, जिसे आज जालंधर कैंट के नाम से जाना जाता है। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन ब्रिटिश सरकार के हाथ में जाने के बाद कंपनी बाग का नाम क्वींस गार्डन किए जाने का भी उल्लेख है। आजादी के बाद इसका नाम नेहरू गार्डन रखा गया। इसके बाद फिर से यह कंपनी बाग के नाम से पहचाना जाने लगा।

1857 की क्रांति: जालंधर छावनी में भी हुई बगावत
मई-जून 1857 में मेरठ और दिल्ली की छावनियों से शुरू हुई बगावत का असर जालंधर तक पहुंचा। 7-8 जून 1857 की रात जालंधर छावनी में तैनात भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इसमें 6वीं नेटिव इन्फैंट्री, 36वीं नेटिव इन्फैंट्री और 8वीं लाइट कैवलरी के सैनिक शामिल थे।
भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ हथियार उठा लिए। उन्होंने सरकारी खजाने और हथियारों पर कब्जा करने का प्रयास किया। बगावत के बाद कई सिपाहियों को गिरफ्तार किया गया। कुछ सिपाही जालंधर से निकलकर दिल्ली पहुंच गए। गिरफ्तार किए गए विद्रोहियों के खिलाफ अंग्रेजों ने कार्रवाई की और कई को फांसी दी गई।

1857 में जालंधर कंपनी बाग की ब्रिटिश लाइब्रेरी में दर्ज फोटो।
विद्रोहियों को फांसी दी, तोप के आगे बांधकर भी उड़ाया
1857 की बगावत को दबाने के बाद अंग्रेजों ने पकड़े गए विद्रोहियों और उनके स्थानीय मददगारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। 1904 और 1980 के गजेटियर संस्करणों में 1857 के विद्रोह के दौरान दी गई सजाओं का उल्लेख है। 7-8 जून 1857 को जालंधर छावनी में 6वीं और 36वीं नेटिव इन्फैंट्री तथा 8वीं कैवलरी के सैनिकों के विद्रोह के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने स्थिति पर नियंत्रण किया।
इसके बाद पकड़े गए विद्रोहियों के खिलाफ त्वरित सैन्य मुकदमे चलाए गए। विद्रोह को पूरी तरह दबाने और जनता व दूसरे सैनिकों में खौफ पैदा करने के लिए पकड़े गए सिपाहियों व उनके स्थानीय मददगारों को फांसी दी गई। कुछ को तोप के आगे बांधकर उड़ा दिया गया।
आजादी की लड़ाई में भी बना रहा कंपनी बाग
कंपनी बाग सिर्फ अंग्रेजी सेना की गतिविधियों से जुड़ा स्थान नहीं था। दीपक जालंधरी की किताब के अनुसार, स्वतंत्रता सेनानी यहां जलसे करने आते थे। इन कार्यक्रमों के जरिए लोगों को जागरूक किया जाता था। समय-समय पर नेता भी यहां सभाएं करते थे। आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू जालंधर आए तो कंपनी बाग भी पहुंचे। इसके बाद इसे नेहरू गार्डन नाम दिया गया।
स्थानीय इतिहास के अनुसार, इंदिरा गांधी भी यहां जलसा करने पहुंची थीं। शुरुआत में यहां कुछ ही पेड़ थे। बाद में इसे आधुनिक पार्क के रूप में विकसित किया गया। आज इसका रखरखाव जालंधर नगर निगम करता है। शहर के लोग यहां सुबह-शाम सैर करने आते हैं और बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं।

(सोर्स- ‘एक शहर जालंधर’ किताब- दीपक जालंधरी( कंपनी बाग, पुराने जालंधर, बरगद और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्थानीय इतिहास के संदर्भ।) और पंजाब/जालंधर गजेटियर: अंग्रेजी शासन, जालंधर छावनी और 1857 की बगावत के दौरान हुई कार्रवाई और सजाओं से जुड़े संदर्भ।)
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