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Main Hoon Apni Dhanlakshmi Book Review; Financial Independence


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27 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा

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किताब- मैं हूं अपनी धनलक्ष्मी

(‘आई एम माय ओन लक्ष्मी’ का हिंदी अनुवाद)

लेखिका- आरती गुप्ता

अनुवाद- यामिनी रामपल्लीवार

प्रकाशक- पेंगुइन

मूल्य- 350 रुपए

बेटियों को पढ़ाया जाता है, नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन निवेश, बीमा और बड़े वित्तीय फैसलों की बारी आते ही जिम्मेदारी पिता, पति या भाई संभाल लेते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर महिलाएं खुद को आर्थिक फैसले लेने में सक्षम मानती हैं, फिर भी वे उन फैसलों का हिस्सा नहीं बन पातीं। आरती गुप्ता की किताब ‘मैं हूं अपनी धनलक्ष्मी’ इसी विरोधाभास को समझने और तोड़ने की कोशिश करती है।

आरती गुप्ता खुद इंवेस्टमेंट मैनेजमेंट की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं। लेकिन किताब में वे एक ऐसी महिला की तरह सामने आती हैं, जिसने सीखते-सीखते अपना रास्ता बनाया, गलतियां कीं, सवाल पूछे और धीरे-धीरे समझा कि आर्थिक सशक्तिकरण का असली अर्थ क्या है।

किताब में क्या है?

यह किताब महिलाओं और पैसे के बीच मौजूद उस दूरी की कहानी है, जो अक्सर घर की चारदीवारी के भीतर बनती है। किताब पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि आर्थिक आजादी का मतलब सिर्फ कमाई नहीं है। असली सवाल यह है कि कमाए गए पैसे पर निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है।

किताब की असरदार बात

किताब बड़े सिद्धांतों से नहीं, छोटे सवालों से शुरू होती है। आरती गुप्ता लिखती हैं कि बचपन से हमें बताया जाता है कि लक्ष्मी समृद्धि की देवी हैं। हम नारी शक्ति का सम्मान करने की बातें करते हैं। महिला पायलट, सीईओ, राष्ट्रपति और ओलंपिक पदक विजेताओं पर गर्व करते हैं। लेकिन घर के भीतर, जहां रोजमर्रा की आर्थिक ताकत तय होती है, वहां तस्वीर बदल जाती है। पैसों पर भरोसा अक्सर पुरुषों को सौंप दिया जाता है।

यहीं किताब का सबसे महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है कि अगर महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में नेतृत्व कर सकती हैं तो आर्थिक फैसलों से उन्हें दूर क्यों रखा जाता है?

किताब इस सवाल का जवाब भावनात्मक नारों से नहीं देती। इसके लिए लेखक ने महिलाओं से बातचीत की, उनके अनुभव सुने और आंकड़ों के जरिए एक तस्वीर सामने रखी।

किताब के सबसे चौंकाने वाले आंकड़े

किताब का एक हिस्सा ऐसा है, जो पढ़ते समय लंबे समय तक दिमाग में बना रहता है। लेखिका ने महिलाओं से पूछा कि वे क्या मानती हैं और वास्तव में क्या करती हैं। दोनों के बीच का अंतर हैरान करता है। डिटेल ग्राफिक में देखिए-

इन आंकड़ों का असर इसलिए ज्यादा है क्योंकि वे एक गहरे विरोधाभास को सामने रखते हैं। महिलाएं अपनी क्षमता पर भरोसा करती हैं, लेकिन निर्णय की मेज तक नहीं पहुंच पातीं।

सीखने का सफर, जो किताब को भरोसेमंद बनाता है

किताब का एक सुंदर हिस्सा लेखिका की अपनी यात्रा है। विवाह के बाद घर, बच्चों और जिम्मेदारियों के बीच उनकी जिंदगी आगे बढ़ रही थी। फिर 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट आया। बाजारों में अफरा-तफरी थी। परिवार के निवेश को लेकर चिंताएं थीं। उसी दौर में उन्होंने निवेश की दुनिया को करीब से समझना शुरू किया।

आरती गुप्ता बताती हैं कि शुरुआत में उनके पास भी अनुभव नहीं था। उन्होंने बैठकों में हिस्सा लिया, विशेषज्ञों को सुना, गलतियां कीं, नुकसान भी देखा और धीरे-धीरे फैसले लेने का आत्मविश्वास विकसित किया।

यही ईमानदारी किताब को मजबूत बनाती है। लेखक हर जगह खुद को विजेता की तरह पेश नहीं करतीं। वे बताती हैं कि आर्थिक समझ एक दिन में नहीं आती। यह लगातार सीखने और अभ्यास का परिणाम होती है।

वित्तीय दुनिया का अदृश्य भेदभाव

  • किताब का एक हिस्सा विशेष रूप से ध्यान खींचता है।
  • आरती गुप्ता लिखती हैं कि इंन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट में एक्टिव भूमिका निभाने के बावजूद कई बार लोग सीधे उनसे बात करने के बजाय उनके पिता या परिवार के किसी पुरुष सदस्य से पुष्टि करना चाहते थे। सामने काम वे कर रही थीं, लेकिन भरोसा किसी और पर किया जा रहा था।
  • यह उस सामाजिक सोच का उदाहरण बन जाता है, जिसमें महिलाओं की क्षमता को अक्सर अतिरिक्त प्रमाण की जरूरत पड़ती है।
  • किताब यहां किसी गुस्से या शिकायत की भाषा नहीं अपनाती। वह सिर्फ यह दिखाती है कि आर्थिक दुनिया में बराबरी की लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है।

आर्थिक आजादी का असली मतलब

  • आजकल आर्थिक स्वतंत्रता को अक्सर बैंक बैलेंस या बड़ी सैलरी से जोड़कर देखा जाता है।किताब इस धारणा को चुनौती देती है।
  • लेखिका के अनुसार आर्थिक आजादी का मतलब है कि व्यक्ति अपने फैसले खुद ले सके, अपनी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर न रहे और अनिश्चित परिस्थितियों में भी विकल्प चुनने की स्थिति में हो।
  • यह विचार किताब के लगभग हर हिस्से में दिखाई देता है। कई बार लगता है कि लेखिका निवेश की बात कर रही हैं, लेकिन कुछ पन्नों बाद समझ आता है कि असल चर्चा आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता की है।

किताब की सबसे बड़ी ताकत

  • इस किताब की सबसे बड़ी ताकत इसकी भाषा है।
  • फाइनेंस पर लिखी गई ज्यादातर किताबें पाठक को आंकड़ों, तकनीकी शब्दों और जटिल अवधारणाओं में उलझा देती हैं। यहां ऐसा नहीं होता।
  • म्यूचुअल फंड, निवेश, जोखिम, बजट और आर्थिक योजना जैसे विषयों को बेहद सरल भाषा में समझाया गया है। महसूस होता है कि कोई अनुभवी व्यक्ति अपने अनुभव साझा कर रहा है।
  • कई जगह ऐसा लगता है जैसे कोई परिचित व्यक्ति बैठकर पैसों की उलझन सुलझा रहा हो। उदाहरणों की वजह से किताब उन पाठकों के लिए भी आसान बनी रहती है, जिन्हें फाइनेंस बिल्कुल समझ नहीं आता।
  • व्यक्तिगत अनुभव और आंकड़े साथ-साथ चलते हैं। इससे किताब में सिर्फ सलाह नहीं रहती, उसके पीछे वजह भी दिखाई देती है।
  • सबसे अच्छी बात यह है कि किताब डर पैदा नहीं करती। वह पाठक को धीरे-धीरे आर्थिक बातचीत में शामिल होने के लिए प्रेरित करती है।

कुछ बातें जो लंबे समय तक याद रहती हैं

किताब खत्म होने के बाद भी कुछ विचार मन में बने रहते हैं।

  • एक विचार यह कि सिर्फ शिक्षित होना पर्याप्त नहीं है। आर्थिक रूप से जागरूक होना भी उतना ही जरूरी है।
  • दूसरा यह कि पैसा सिर्फ सुविधा नहीं देता, निर्णय लेने की क्षमता भी देता है।
  • तीसरा यह कि आर्थिक सशक्तिकरण की शुरुआत बड़े निवेश से नहीं, छोटे कदमों से होती है। अपने बैंक खाते को समझना, खर्चों को देखना, बजट बनाना और वित्तीय बातचीत का हिस्सा बनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यह किताब किसे पढ़नी चाहिए?

अगर कोई महिला अपने पैसों को बेहतर समझना चाहती है, निवेश की दुनिया में पहला कदम रखना चाहती है या सिर्फ यह जानना चाहती है कि आर्थिक आजादी वास्तव में क्या होती है, तो यह किताब उसके लिए एक अच्छी शुरुआत साबित हो सकती है। लेखिका पहले डर कम करती हैं, फिर समझ बढ़ाती हैं और आखिर में निवेश की तरफ ले जाती हैं।

किताब के बारे में मेरी राय

किताब पढ़ते हुए कई बार महसूस होता है कि आर्थिक असमानता की सबसे बड़ी वजह संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि भागीदारी की कमी है। यही बात इसे साधारण फाइनेंस किताबों से अलग बनाती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि किताब यह भरोसा पैदा करती है कि आर्थिक समझ कोई जन्मजात प्रतिभा नहीं, बल्कि सीखा जाने वाली कौशल है। सीखने की शुरुआत किसी भी उम्र में की जा सकती है।

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ग्राफिक- विपुल शर्मा

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