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Mohanlal Bhaskar Spy Files | Pakistan Betrayal & Captivity Story


दैनिक भास्कर की ‘स्पाई फाइल्स’ सीरीज में आप पढ़ रहे हैं- ‘जासूस मोहनलाल भास्कर’ की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा- पंजाब का रहने वाला मोहनलाल टीचर की नौकरी छोड़कर जासूस बन चुका था।

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एक साल के दौरान वह 16 बार पाकिस्तान आ-जा चुका था। पाकिस्तानी फौज की मूवमेंट और अमेरिका से आ रहे पैटन टैंकों के बारे में वह भारत की खुफिया एजेंसी को बता चुका था।

16 सितंबर 1968 को पत्नी से नौकरी पर जाने की बात कहकर वो फिर से पाकिस्तान के लिए निकला, लेकिन इस बार उसके मन में डर बैठ गया था।

वह बस से उतरकर भागना चाहता था। तभी बस में एक और एजेंट अमरीक सिंह चढ़ गया। वही अमरीक, जिसे पाकिस्तानी एजेंसियों ने खरीद लिया था, लेकिन मोहनलाल इस बात से अनजान था। पार्ट-2 में आगे की कहानी…

17 सितंबर 1968… मोहनलाल 17वीं बार पाकिस्तान में कदम रख चुका था। जगह थी बेदियां। पीछे मुड़कर देखा तो 3-4 किलोमीटर पर भारत था।

उसने बेदियां मोड़ से लाहौर की बस पकड़ी। बगल वाली सीट पर अमरीक सिंह अपने चार साथियों के साथ बैठा था। बस जैसे ही एक नहर के ऊपर से गुजरी, मोहनलाल ने चुपके से अपना मिनी कैमरा नहर में फेंक दिया।

आगे रेलवे फाटक बंद था। बस रुकी तो मोहनलाल उतरा और टहलने लगा। एक ट्रेन गुजरने वाली थी। उसने सोचा, ‘छलांग लगाऊं और लाइन पार भाग निकलूं!’ वह पैर उठाने ही वाला था कि कंधे पर भारी हाथ आ पड़ा। अमरीक बिल्कुल सटकर खड़ा था।

मोहनलाल ने घबराकर पूछा, ‘अमरीक, तुम्हारे साथ ये कौन लोग हैं?’

अमरीक हंसकर बोला, ‘मेरे स्मगलर यार हैं। तुम्हारा रंग क्यों उड़ा जा रहा है? खुद को संभालो, वरना तुम्हारे चक्कर में हम भी मारे जाएंगे!’

तभी ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। दोनों अपनी सीट पर जाकर बैठ गए।

लाहौर पहुंचने के बाद मोहनलाल भास्कर। AI इमेज

लाहौर पहुंचने के बाद मोहनलाल भास्कर। AI इमेज

लाहौर पहुंचते ही अमरीक और उसके साथी मोहनलाल को लेकर एक होटल पहुंचे। मोहनलाल का दिमाग तेजी से दौड़ा। उसने होटल वाले से कहा, ‘ओ मियां, दो सेर दूध उबाल दो।’ सोचा- उबलता दूध इन पर फेंकना है और भाग जाना है।

दूध अंगीठी पर चढ़ गया। तभी अमरीक बोला, ‘मैं सिगरेट लेकर आता हूं।’

अमरीक जैसे ही आगे बढ़ा, उसके साथियों ने जेब से पिस्टल निकाली और सीधे मोहनलाल के माथे पर तान दी, ‘हैंड्स-अप!’

मोहनलाल ने हाथ ऊपर कर लिए।

‘कौन हो तुम?’

‘मुहम्मद असलम।’

‘कहां के रहने वाले हो?’

‘साहीवाल के 7 चक के।’

‘वहां का चेयरमैन कौन है?’

‘शेख अब्दुल रहमान।’

‘क्या धंधा करते हो?’

‘भैंसों के व्यापारी हैं जनाब।’

‘अभी कहां से आ रहे हो?’

‘सरजा मिरजा से।’

अब उन लोगों ने मोहनलाल का हाथ पीछे बांधा, आंखों पर पट्टी चढ़ाई और टैक्सी में ठूंसकर लाहौर छावनी की तरफ निकल पड़े।

टैक्सी रुकी। आंखों की पट्टी हटाई गई तो सामने लिखा था- 596 फील्ड इंटेरोगेशन यूनिट। दरवाजे पर राइफल ताने संतरी खड़े थे। वे मोहनलाल को घसीटते हुए अंदर ले गए। कमरे में हट्टा-कट्टा मेजर ऐजाज मकसूद बैठा था।

पाकिस्तानी मेजर ऐजाज के साथ मोहनलाल भास्कर। AI इमेज

पाकिस्तानी मेजर ऐजाज के साथ मोहनलाल भास्कर। AI इमेज

मोहनलाल को कुर्सी पर टिका दिया गया और हाथों की रस्सियां खोल दी गईं। मेजर ने चाय की प्याली उसकी तरफ बढ़ाई और बोला- ‘मिस्टर मोहनलाल, शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ और तुम इस पेशे में कूद पड़े?’

मोहनलाल ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘मौत का एक दिन मुकर्रर है मेजर साहब। आपको अपने वतन से मोहब्बत है, तो मेरी बात समझ सकते हैं।’

मेजर एक पल के लिए झेंप गया। फिर सिगरेट का कश खींचते हुए बोला, ‘कसम क़ुरान की, बस इतना बता दो कि एटॉमिक एनर्जी वाली फाइल तुम्हें किसने दी थी? अभी के अभी रिहा करवाकर तुम्हें तुम्हारे मुल्क भिजवा दूंगा।’

मोहनलाल ने फिर मुस्कुराते हुए कहा- ‘माफ करना मेजर साहब, मुझे कुछ नहीं पता।’

इतना सुनते ही मेजर ने जोर से लात मारी। मोहनलाल कुर्सी समेत जमीन पर जा गिरा। चाय की प्याली हाथ से छूटकर दीवार से जा टकराई।

मेजर का चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था, ‘मैं तुम पर तरस खा रहा हूं और तुम मुझे बेवकूफ बना रहे हो? अमरीक सब उगल चुका है। तुमने 13 हजार रुपए देकर इस्लामाबाद के एटॉमिक एनर्जी कमीशन से फाइल निकालकर भारत भेजी है।’

मोहनलाल ने होंठों से बहता खून पोंछा और कहा, ‘मेजर, आप जैसे पढ़े-लिखे अफसर को यह कैसे मुमकिन लगता है?’

‘मुझे बच्चा मत समझो। अगर हम अमरीक को खरीद सकते हैं, तो क्या तुम हमारे बंदे को नहीं खरीद सकते?’ मेजर ने चिल्लाते हुए कहा।

मोहनलाल चुप रहा।

अब मेजर ने सिपाही को हुक्म दिया- ‘ले जाओ इसे हवलदार अजीज के पास। कहो, इसकी अच्छी तरह मरम्मत कर दे।’

हवलदार अजीज उसे खींचकर एक कोठरी में ले गया। सारे कपड़े उतरवाए और तख्त पर उल्टा लिटा दिया। बाहर पेड़ से एक मोटी लकड़ी तुड़वाई गई, जिसकी गांठें नहीं छांटी गई थीं।

इसके बाद अजीज ने पीटना शुरू किया। चीखों से पूरी कोठरी गूंज उठी। लगातार डेढ़ घंटे तक मार पड़ती रही, लेकिन मोहनलाल के मुंह से एटॉमिक एनर्जी की फाइल वाली बात नहीं निकली। आखिर में उसका शरीर शांत पड़ गया।

मोहनलाल भास्कर को डंडे से पीटता हुआ पाकिस्तानी हवलदार। AI इमेज

मोहनलाल भास्कर को डंडे से पीटता हुआ पाकिस्तानी हवलदार। AI इमेज

घंटे भर बाद मोहनलाल की आंख खुली, तो सामने बैठा मेजर ऐजाज सिगरेट पी रहा था। उसने हंसते हुए कहा, ‘बेटा, अगर तुम जान देने पर ही तुले हो, तो कोई बात नहीं… हम भी कोई रहम खाने वालों में से नहीं हैं।’

मोहनलाल को एक मेज पर खड़ा किया गया और दोनों हाथ छत से लटकती रस्सी से कसकर बांध दिए गए। फिर एक सिपाही ने नीचे से मेज खींच ली। मोहनलाल अब हवा में झूल रहा था। रस्सी चमड़ी को काटती हुई कलाइयों में धंसने लगी।

6 फौजी डंडे लेकर उस पर टूट पड़े। कोई पिंडलियों पर मार रहा था, कोई कूल्हों पर, तो कोई पीठ की चमड़ी उधेड़ रहा था। जबकि मेजर ऐजाज शहतूत की बारीक छड़ी से उसके सिर पर मार रहा था।

थोड़ी देर बाद सिपाहियों ने रस्सी को और ऊपर खींचना शुरू किया। जैसे-जैसे रस्सी खिंचती गई, मोहनलाल की चीखें उतनी ही बढ़ती चली गईं। फिर धीरे-धीरे उसकी छटपटाहट बंद हो गई।

मेजर ने उसके मुंह पर ठंडे पानी का छींटा मारा और घूरते हुए बोला, ‘बेटा, यहां मर सकते हो, लेकिन सो नहीं सकते।’

मोहनलाल की जुबान लड़खड़ा रही थी- ‘साहब… पानी पिला दो…’

मेजर चिल्लाया, ‘ओए… हमने तो अपने मोहम्मद साहब के नवासे को करबला के मैदान में पानी की एक बूंद नहीं दी थी, तुझे कहां से पिला दें?’

कुछ ही देर में मोहनलाल बेहोश हो गया।

आंख खुली तो वह एक अंधेरी कोठरी में पड़ा था। दर्द से चूर मोहनलाल खुद को कोसने लगा- मां-बाप का अकेला बेटा हूं, घर में कभी थप्पड़ नहीं खाया। न जाने कौन-से पाप का फल भोग रहा हूं जो यह नरक देखना पड़ रहा है।’

नौलखा थाने की उस कोठरी में 15 दिन घिसटने के बाद उसे लाहौर की लखपत जेल भेज दिया गया। तब यह जेल शहर से दूर, वीरान खेतों के बीच बनी थी। खाना एकदम रद्दी। दिन में दो रूखी रोटियां और नाम की एक कड़छी दाल। सुबह नाश्ते में एक मुट्ठी उबले चने और गुड़ का टुकड़ा। चाय मांगना तो गुनाह था।

एक रात करीब 12 बजे अचानक शोर से मोहनलाल की नींद खुल गई। जेल नारों से गूंज रही थी- ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘पीपुल्स पार्टी जिंदाबाद’, ‘अयूबशाही मुर्दाबाद!’

कैदी अपनी-अपनी कोठरियों की खिड़कियों को पागलों की तरह पीट रहे थे।

जुल्फिकार अली भुट्टो को तनाशाह अयूब खान ने भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार करवाया था। AI इमेज

जुल्फिकार अली भुट्टो को तनाशाह अयूब खान ने भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार करवाया था। AI इमेज

तभी जेल के दारोगा की आवाज गूंजी, ‘सुबह भुट्टो साहब से आपकी मुलाकात करवा देंगे। फिलहाल उनकी बात सुनो, वे आपसे कुछ कहना चाहते हैं।’

अगले ही पल भुट्टो की आवाज माइक पर गूंजी, ‘मेरे कैदी भाइयो, अस्सलामु अलैकुम! आपने जो प्यार दिया है, उसके लिए शुक्रगुजार हूं। सुबह आप सब से मुलाकात होगी। उम्मीद है अब आप शांत रहेंगे।’

अगली सुबह भुट्टो मोहनलाल वाली बैरक में थे। उन्होंने कैदियों से कहा, ‘दोस्तो, मैंने अभी एक और बैरक देखी है जो हिंदुस्तानी कैदियों से भरी पड़ी है। आपकी यह हालत देखकर मुझे गहरा सदमा पहुंचा है। भारत में भी हमारे पाकिस्तानी कैदियों का यही हाल होगा। आप यकीन रखें, जिस दिन हमारी हुकूमत आई, साल भर के भीतर आप सब अपने मुल्क में होंगे।’

इतना सुनना था कि बैरक गूंज उठी, ‘भुट्टो साहब जिंदाबाद!’

भुट्टो मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर आगे बढ़ गए।

वक्त बीतता रहा और मोहनलाल पर सितम बढ़ते रहे। एक शाम मोहनलाल को FIC, यानी ‘फाइनल इंटेरोगेशन सेंटर ऑफ पाकिस्तान’ ले जाया गया।

शाम ढलते ही सूबेदार शेर खान चिल्लाया, ‘इसके कपड़े उतारो। सिर पर कंबलों की तह रखो और पूरी रात कमरे में टहलाओ। जहां ये रुके, सीधे टांगों पर डंडे मारो।’

मोहनलाल के सिर पर चार भारी कंबल मोड़कर रख दिए गए। 5-6 घंटे तक वह बदहवास सा कमरे में चक्कर काटता रहा। जरा सी रफ्तार धीमी होती कि पीछे से पिंडलियों पर डंडे बरस पड़ते। रात के तीन बजे शरीर ने जवाब दे दिया। वह बेसुध होकर गिर पड़ा।

एक सिपाही दौड़कर आया और मोहनलाल के चेहरे पर धड़ाधड़ चार-पांच थप्पड़ जड़ दिए। उसे घसीटा, मुंह पर पानी का जग उड़ेल दिया, पर मोहनलाल को होश नहीं आया। वह पूरी रात वहीं पड़ा रहा।

सुबह नया कमांडर आया। उसने मोहनलाल की कलाई पकड़कर नब्ज़ टटोली। सांसें चल रही थीं। उसने सिपाहियों से कहा- ‘इसे कंबल में लपेटो और कोने में फेंक दो।’

सिपाहियों ने उसे कोने में धकेल दिया। मोहनलाल बेहोश पड़ा रहा।

फर्श पर बेहोश पड़ा मोहनलाल भास्कर। AI इमेज

फर्श पर बेहोश पड़ा मोहनलाल भास्कर। AI इमेज

सुबह 8 बजे उसकी आंखें खुलीं। एक सिपाही उसे उठाकर दूसरे कमरे में ले गया। सामने मेजर जादून और डॉक्टर सईद बैठे थे। डॉक्टर सईद, ‘टॉर्चर एक्सपर्ट’ के नाम से जाना जाता था।

सईद ने मोहनलाल की आंखों में गाढ़ा केमिकल उड़ेल दिया। फिर एक अखबार उसकी तरफ उछालते हुए बोला, ‘पढ़ इसे।’

मोहनलाल को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

थोड़ी देर बाद सईद ने कहा- ‘चलो, इस पर थोड़ा तरस खाते हैं।’

उसने सीरिंज भरी और मोहनलाल के हाथ में इंजेक्शन लगा दिया। फिर बोला, ‘आंखें पोंछ ले अब।’

आंखें साफ करते ही मोहनलाल को साफ दिखने लगा।

मोहनलाल ने हंसते हुए कहा, ‘साहब, आपका यह मॉर्फीया इंजेक्शन मुझ पर कोई असर नहीं करने वाला। मैं तो व्हिस्की की पूरी बोतल पीकर भी सीधे कदम चल सकता हूं।’

‘साले पक्के शराबी हो।’ यह कहते हुए डॉक्टर सईद ने फौरन एक और इंजेक्शन उसकी नस में उतार दी।

कुछ ही मिनटों में दवा का जहर दिमाग पर चढ़ा और मोहनलाल बड़बड़ाने लगा। मेज पर रखा टेप रिकॉर्डर घूम रहा था और उसकी लड़खड़ाती जुबान से निकलती एक-एक बात रिकॉर्ड होती जा रही थी। फिर वो बेहोश हो गया।

26 घंटे बाद मोहनलाल को होश आया। सामने खड़ा डॉक्टर सईद मुस्कुरा रहा था। उसने कहा- ‘तुमने हमें एटॉमिक एनर्जी कमीशन से जुड़े दो अफसरों के नाम बताए हैं, वे बहुत जल्द तुम्हारे सामने होंगे।’

आधे घंटे बाद सफेद कपड़ों में दो शख्स कमरे में पहुंच चुके थे। मेजर जादून ने मोहनलाल की तरफ उंगली उठाई और उनसे पूछा, ‘पहचानते हो इसे?’

दोनों एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे।

मेजर ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘तुम दोनों ने ही वो फाइल 13 हजार में इसे बेची थी। अब तुम्हारी खाल उतारी जाएगी।’

दो सिपाही उन पर टूट पड़े। दो घंटे तक डंडे बरसाते रहे। कमरा उनकी चीखों से गूंजता रहा। ऐसा कई दिन चला।

एक रोज मोहनलाल को समरी कोर्ट मार्शल के लिए लाहौर ले जाया गया। वहां फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट सैयद मिर्जा और डीएसपी अजीम दुर्रानी पहले से मौजूद थे।

दुर्रानी ने घूरते हुए कहा, ‘तुम्हारा कोर्ट मार्शल होने जा रहा है। तुम्हें सजा-ए-मौत भी हो सकती है। अब भी वक्त है, सच उगल दो।’

मोहनलाल खामोश खड़ा रहा।

दुर्रानी ने फिर कहा, ‘अगर तुम अपने मुल्क जाकर पाकिस्तान के लिए काम करने को तैयार हो जाओ, तो तुम्हारी जान भी बच जाएगी और हिंदुस्तानियों की नजर में हीरो भी बने रहोगे।’

मोहनलाल हंस पड़ा, ‘साहब! आप क्या समझते हैं कि हिंदुस्तानी इंटेलिजेंस बेवकूफ है? और रही बात सजा-ए-मौत की, तो उसमें भी फजीहत पाकिस्तान की ही होनी है। आपको फैसले की एक कॉपी भारतीय हाई कमीशन को भी भेजनी पड़ेगी, और सबूत के नाम पर आपके पास कुछ नहीं है।’

दुर्रानी चीखा, ‘साले! जिस दिन अदालत का हुक्म सुनेगा, सारा कानून भूल जाएगा!’

मोहनलाल ने भी चीखते हुए कहा- ‘कमाल है! यहां पुलिस तय करती है कि अदालत क्या फैसला सुनाएगी। तो फिर यह सारा नाटक किस लिए रचा रहे हो? चढ़वा दो मुझे फांसी।’

थाने में मोहनलाल से पूछ-ताछ करता हुआ पाकिस्तानी फौजी। AI इमेज

थाने में मोहनलाल से पूछ-ताछ करता हुआ पाकिस्तानी फौजी। AI इमेज

एक सिपाही हांफता हुआ अंदर आया, ‘जनाब, समरी कोर्ट मार्शल के चेयरमैन मेजर साहब तशरीफ ला चुके हैं।’

मोहनलाल को जज के सामने पेश किया गया। एक-एक करके गवाह आते गए और रटे-रटाए बयान बोलते गए।

अब फैसले का वक्त आ चुका था। जज ने फैसला पढ़ा- अदालत मोहनलाल भास्कर को जासूसी के जुर्म में मुजरिम करार देती है और सजा-ए-मौत का हुक्म देती है।’

इसके बाद उसे फांसी कोठरी में शिफ्ट कर दिया गया। वहां रहते हुए मोहनलाल ने गौर किया कि किसी कैदी को फांसी लगने के बाद जेल वाले उसका सारा सामान आपस में बांट लेते हैं।

पूछताछ की तो पता चला कि वहां सिपाही को महीने के 70 रुपए मिलते थे, जबकि उस दौर में भारत में सिपाही की तनख्वाह 255 रुपए थी। भारत में 700 रुपए कमाने वाला थानेदार टूटी साइकिल पर चलता था, लेकिन पाकिस्तान में 350 रुपए पाने वाला थानेदार कार में घूमता था। किसी टैक्सी वाले की क्या मजाल जो उनसे किराए मांग ले।

महीने गुजरते रहे। एक दिन गुस्से में मोहनलाल ने अपने सारे कपड़े फाड़ डाले और नंगा रहने लगा। उसने दाढ़ी और बाल बनवाना भी बंद कर दिया।

यह देखकर कमांडर चिढ़ गया। उसने हुक्म दिया, ‘कल सुबह इसकी दाढ़ी का एक-एक बाल उखाड़कर नोचा जाए।’

उस रात मोहनलाल अपने ही हाथों से अपनी दाढ़ी-मूंछ के बाल उखाड़ने लगा। दर्द से शरीर ऐंठता रहा, लेकिन सुबह होने तक उसने दाढ़ी और मूंछें पूरी तरह साफ कर दी थीं।

सुबह आठ बजे कोठरी का दरवाजा खुला तो मोहनलाल को देखकर सूबेदार के होश उड़ गए, ‘तुम्हारी दाढ़ी और मूंछें कहां गईं?’

मोहनलाल ने हंसते हुए कहा, ‘साहब, जो जहमत आप उठाने आए थे, वह मैं खुद ही निपटा चुका हूं।’

सूबेदार ने अपना सिर पीट लिया और गाली देते हुए बोला, ‘पता नहीं किस मिट्टी के बने हो तुम।’

एक महीने बाद मोहनलाल को ‘फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल’ ले जाया गया। अदालत की मेज के उस पार एक कर्नल और चार मेजर जज बनकर बैठे थे।

अदालत ने फैसला सुनाया- ‘मोहनलाल भास्कर उर्फ मुहम्मद असलम… यह अदालत तुम्हें 14 साल बामशक्कत कैद की सजा सुनाती है।’

मोहनलाल खुशी से उछल पड़ा। वह भागता हुआ अपनी बैरक में पहुंचा। एक कैदी ने पूछा, ‘भाई, क्या हुआ? रिहा कर दिए गए?’

मोहनलाल बोला- ’14 साल का राम-बनवास हुआ है।’

अगले दो साल मोहनलाल को पाकिस्तान की अलग-अलग जेलों में घुमाया जाता रहा। इसी बीच दिसंबर 1971 में दोनों मुल्कों के बीच जंग छिड़ गई। 13 दिन बाद ही पाकिस्तान को सरेंडर करना पड़ा। बांग्लादेश नाम का नया मुल्क बना। हार की जिल्लत के बाद याह्या खान को गद्दी छोड़नी पड़ी और जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के नए सदर बने।

फिर आई 2 जुलाई 1972 की तारीख, जब शिमला में भुट्टो और भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच ‘शिमला समझौता’ हुआ।

जेल में रेडियो पर मोहनलाल ने यह खबर सुनी, तो वह खुशी के मारे पागल हो गया। क्योंकि समझौते में कहा गया था- दोनों मुल्क एक-दूसरे के कैदियों को रिहा करेंगे।

2 जुलाई 1972, पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ पीएम इंदिरा गांधी।

2 जुलाई 1972, पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ पीएम इंदिरा गांधी।

मोहनलाल खुश था कि वो जल्द भारत लौटेगा, लेकिन अगले 9 महीने तक कुछ नहीं हुआ। वह सीलन भरी कोठरी में पड़ा रहा।

अब तारीख आई 15 मार्च 1973, जेल में खबर फैली कि हिंदुस्तानी कैदियों को इकट्ठा करके मियांवाली जेल से लाहौर भेजा जा रहा है।

उस रात हिंदुस्तानी कैदियों की बैरक में मानो दीवाली मन गई। सबने जमकर जश्न मनाया, नाचे-गाए और उनके पास जो भी थोड़ा-बहुत अफीम या चरस बचा था, सब उड़ा दिया।

अगले दिन सुबह कैदियों को जेल के बड़े से लॉन में इकट्ठा किया गया। एक फौजी अफसर ने कहा- ‘प्यारे हिंदुस्तानी भाइयो… अभी तक आप पाकिस्तान की जेलों में कैदी की तरह रहे, लेकिन हमारे सदर, जनाब ज़ुल्फिकार अली भुट्टो साहब के हुक्म से आप सबकी कैद खत्म की जाती है। जैसे-जैसे आपकी रवानगी की बारी आएगी, हम गाड़ी में बिठाकर आपको बॉर्डर तक छोड़ आएंगे।’

लेकिन इंतजार का सिलसिला खिंचता चला गया। शिमला समझौते को दो साल से ऊपर हो गए, पर रिहाई का कोई अता-पता न था। मोहनलाल ने मान लिया था कि अब जिंदगी की आखिरी सांसें इसी की जेल में टूटेंगी।

फिर आई 9 दिसंबर 1974 की सुबह। 30 हिंदुस्तानी कैदियों को एक गाड़ी में ठूंसा गया। गाड़ी वाघा बॉर्डर की तरफ चल पड़ी। सरहद के दोनों पार, एक-एक किलोमीटर दूर तक हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। हवा में ढोल और बैंड-बाजों की आवाजें गूंज रही थीं।

मोहनलाल की हथकड़ियां खोल दी गईं और उसे एक टेंट में बिठाया गया। टेंट के चारों तरफ पुलिस और सीआईडी के जवानों का कड़ा पहरा था। सबसे पहले पाकिस्तानी कैदियों की अदला-बदली शुरू हुई। उस दिन लगभग 108 पाकिस्तानी कैदी सरहद पार अपने घर लौटे।

शाम के ठीक चार बज रहे थे जब हिंदुस्तानी कैदियों की बारी आई। लिस्ट में 15वां नाम मोहनलाल का था। पाकिस्तानी अफसर ने चिल्लाकर नाम पुकारा, ‘मोहनलाल भास्कर।’

उस पार से हिंदुस्तानी अफसर की आवाज गूंजी, ‘वेलकम एक्सेप्टेड।’

मोहनलाल की आंखों से आंसू छलक पड़े। वह पूरे जोर से ‘भारत माता की जय…’ कहते हुए हिंदुस्तानी सीमा में कूद पड़ा।

सामने ही उसके बूढ़े पिता खड़े थे। बेटे के गम में रो-रोकर उनकी आंखें अंदर धंस चुकी थीं और चेहरे पर बेहिसाब झुर्रियां थीं। मोहनलाल दौड़कर उनसे लिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा।

इस तरह 6 साल पाकिस्तान की जेल में रहने के बाद 1974 में मोहनलाल भास्कर भारत लौटा।

पाकिस्तान से भारत पहुंचने के बाद मोहनलाल ने पत्नी के साथ फिर से शादी की थी।

पाकिस्तान से भारत पहुंचने के बाद मोहनलाल ने पत्नी के साथ फिर से शादी की थी।

जासूस मोहनलाल भास्कर की पहली कड़ी भी पढ़िए :

सेक्स वर्कर बोली- ‘जंग हुई तो हिंदुस्तान दहल जाएगा’:जासूस ने शराब पिलाकर उगलवाए पाकिस्तानी फौज के राज, अमेरिका भेज रहा था पैटन टैंक; पार्ट-1

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रेफरेंस :

  1. Main Pakistan Mein Bharat Ka Jasoos Tha : By Mohanlal Bhaskar
  2. An Indian Spy in Pakistan : By Mohanlal Bhaskar



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