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- N. Raghuraman’s Column – For Us, This Is Puja prasad (offering), But For Someone Else, It Becomes Wages.
43 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
येल्लमा वर्ष 2021 में एक कंस्ट्रक्शन वर्कर थीं। चूंकि हर मानसून में कंस्ट्रक्शन गतिविधियां धीमी हो जाती हैं तो उन्हें काम ढूंढ़ने में परेशानी होती थी। तब वे भारती मेधी से संपर्क करतीं, ताकि उन्हें मेधी की पुणे के करवे नगर स्थित मोदकघर फैक्ट्री में कोई काम मिल जाए। उस वक्त उस छोटी-सी फैक्ट्री में रोज करीब एक हजार मोदक ही बनते थे।
मेधी और उनके पति ने 2009 में यह बिजनेस शुरू किया था। वे मोदक और दूसरे पारंपरिक व्यंजन बनाते थे। जब येल्लमा और अन्य महिलाएं काम की तलाश में वहां पहुंचीं तो मेधी को समझ आया कि उन्हें काम करने वाले लोग चाहिए और इन महिलाओं को काम की जरूरत है। तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मोदकघर उस छोटी-सी शुरुआत से बढ़ा और आज रोजाना 18 से 20 हजार हाथ से बने उकड़ीचे मोदक (स्टीम्ड मोदक) बनाने लगा है।
पिछले साल का प्रोडक्शन 3 लाख मोदक तक पहुंचा। इस साल पहले ही दिन 3.5 लाख मोदक बनाने का टारगेट है, जबकि गणेश चतुर्थी तक 10 दिनों में कुल 10 लाख मोदक बनाने का लक्ष्य है। मोदकघर की अब पूरे पुणे में पांच शॉप हैं, जहां दिल्ली, कोलकाता और उससे भी परे कई जगहों से ऑर्डर आते हैं। मेधी के बेटे आकाश भी अब कारोबार से जुड़ गए हैं। वे इसमें डिजिटल टेक्नोलॉजी को जोड़ कर फैमिली बिजनेस को आगे बढ़ा रहे हैं।
इसीलिए मैंने लेख की शुरुआत इस विचार से की थी कि एक परिवार के लिए यह प्रसाद है, तो दूसरे के लिए हफ्तेभर की मजदूरी हो सकती है। गणेश चतुर्थी का महज एक धार्मिक त्योहार से कहीं ज्यादा महत्व है। यह सामाजिक रिश्ते बनाता है। लोगों को उनके निजी जीवन से निकालकर फिर-से परिवारों, आस-पड़ोस, गांवों, बाजारों, क्राफ्ट और वॉलंटरी वर्क से जोड़ता है। और शायद आज इस त्योहार की सबसे दिलचस्प बात वो तरीका है, जिससे यह युवाओं को जोड़ता है- वो भी ऐसे वक्त में जब पारंपरिक त्योहारों से दूर जाने के लिए उनकी आलोचना की जाती है।
इन दिनों में आसपास देखेंगे तो आप पाएंगे कि युवा काम से पर्सनल लीव लेते हैं, पांडाल डेकोरेशन के लिए देर रात तक रुकते हैं और पूरा वीकेंड इसमें लगा देते हैं कि उनका मंडल सबसे अलग दिखे। वे कार्यक्रमों का आयोजन, क्राउड मैनेजमेंट, वेंडरों से तालमेल करते हैं। फंड जुटाते हैं और मिलजुल कर अपने पांडाल को सोमवार से शुरू हो रहे 10 दिवसीय सेलेब्रेशन के लिए तैयार करते हैं।
जिस पीढ़ी पर स्क्रीन पर बहुत ज्यादा समय खपाने का आरोप लगाया जाता है, उसे गणेश चतुर्थी कुछ अलग देती है: बाहर निकलने की वजह, हाथों से काम करने, लोगों से मिलने, साथ मिलकर कुछ बनाने और खुद से भी बड़ी किसी चीज का हिस्सा बनने का अवसर। हमारे त्योहार कुछ ऐसा करते हैं, जो टेक्नोलॉजी के लिए मुश्किल है- ये त्योहार लोगों को फोन छोड़ने और रिश्तों को थामने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन इन उत्सवों का एक और पहलू है, जिस पर हम पर्याप्त बातचीत नहीं करते: इनके जरिए होने वाला आर्थिक-सामाजिक लेन-देन।
देखिए, गणेश चतुर्थी आती है तो क्या होता है। कोई मूर्ति खरीदता है। कोई उसे बनाता है। किसी पेंटर को काम मिलता है। किसी डेकोरेटर को ऑर्डर मिलता है। फूल बेचने वाला कमाता है। कोई कारपेंटर पांडाल बनाता है। किसी इलेक्ट्रिशियन को भुगतान होता है। किसी ट्रांसपोर्टर को ट्रिप मिलती है। मोदक बनाने वाली किसी महिला को ज्यादा ऑर्डर मिलते हैं। किसी दिहाड़ी मजदूर को कई दिनों का रोजगार मिलता है। किसी छोटे दुकानदार की ज्यादा बिक्री होती है। किसी युवा को आयोजन करने का मौका मिलता है। कोई परिवार अपने गांव लौटकर वहां पैसा खर्च करता है।
खर्च होने के बाद यह पैसा गायब नहीं हो जाता। यह एक से दूसरे हाथ तक पहुंचता रहता है। शायद इसीलिए भारत के पारंपरिक कैलेंडर में पूरे साल इतने सारे त्योहार होते हैं। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि हमारे पूर्वज बैठकर त्योहारों को किसी आर्थिक नीति के जैसे डिजाइन कर लेते थे। बल्कि, उन्होंने ऐसी संस्कृति को बनाया, संरक्षित और सेलेब्रेट किया, जिसमें पूरे साल शेयरिंग, ट्रैवलिंग, खरीदारी, निर्माण, खाना-पीना, देना और मिलना-जुलना चलता रहता था। नतीजतन, एक इकोनॉमी विकसित हुई, जिसमें पैसा एक परिवार, एक कारोबार या एक जेब में ब्लॉक होने के बजाय समुदायों के बीच घूमता रहता है।
फंडा यह है कि हमारी परंपरा में प्रोग्रेस को आगे ले जाने की ताकत है। इसीलिए आज पूरे देश में यह गूंज सुनाई देती है- ‘आला रे आला, गणपति आला।’

