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Neerja Chowdhury’s Column – The equations in each state differ from one another in the upcoming elections.


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45 मिनट पहले

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नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार

दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री के सम्मिलित होने को असल में अगले साल यूपी, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, मणिपुर और गोवा में होने जा रहे चुनावों का ‘कर्टेन रेजर’ माना जा सकता है। प्रधानमंत्री यूं तो देश की राजधानी में एक छात्र-समूह को संबोधित कर रहे थे, लेकिन यह चुनावों में युवाओं, जेन-जी और यहां तक कि जेन-अल्फा की अहमियत को भी मान्यता देने जैसा था।

मोदी भलीभांति समझते हैं कि देश की चुनावी राजनीति में इन युवाओं ने क्या अहमियत हासिल कर ली है। आज कोई पार्टी इन्हें नजरअंदाज करने का जोखिम उठा नहीं सकती। यही वजह है कि राहुल गांधी ‘छात्रों की गूंज’ कर रहे हैं और प्रधानमंत्री एसआरसीसी के आयोजन में गए। चुनावी राज्य बड़ा हो या छोटा, लोकसभा चुनावों पर उसके प्रभाव के चलते सत्ताधारी दल और विपक्ष, दोनों के लिए उसका महत्व है।

आगामी चुनावों में भाजपा के लिए अपेक्षाकृत बहुत कुछ दांव पर लगा है। बंगाल की जीत ने भाजपा के पक्ष में खूब माहौल बनाया था, लेकिन जेन-जी के प्रदर्शन के बाद पार्टी अपनी लय खोती लगी। ऐसे में यदि बड़े राज्य उसके हाथ से निकलते हैं तो यह उसके लिए आदर्श स्थिति नहीं होगी। गोवा में भाजपा 2012 से ही सत्ता में है। एंटी-इन्कम्बेंसी ने वहां असर दिखाया है और लोग व्यापक भ्रष्टाचार की बातें भी करते हैं।

लेकिन अन्य राज्यों की तरह गोवा में भी कांग्रेस ने भाजपा से मुकाबले के लिए गैर-भाजपाई दलों से गठजोड़ में खासी रुचि नहीं दिखाई है। वह जेन-जी हितों के हिमायती और पिछले चुनाव में 10% वोट हासिल करने वाले अपेक्षाकृत नए दल रिवोल्यूशनरी गोअन्स पार्टी से बातचीत जरूर कर रही है, लेकिन उसने गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ अपना गठबंधन जारी रखने या आम आदमी पार्टी के साथ तालमेल बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

पंजाब के चुनाव में इस बार लोगों की बहुत रुचि है। वहां आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, भाजपा और अमृतपाल सिंह के नेतृत्व वाले खालिस्तान-समर्थक अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के बीच पंचकोणीय मुकाबला हो सकता है। अमृतपाल 2023 से जेल में हैं। भाजपा और अकाली दल फिर साथ आएं तो यह चतुष्कोणीय-संघर्ष रह जाएगा। इस गठबंधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सुखबीर बादल कुछ समय पहले ही प्रधानमंत्री से मिले थे।

हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को ‘रोका’ नहीं, ‘मुंहदिखाई’ ही कहा गया था। दोनों पार्टियां यह गठबंधन चाहती भी हैं, लेकिन यह आसान नहीं होगा। टिकटों के लिए भाजपा की कड़ी सौदेबाजी के चलते अकाली दल के कुछ नेता/कार्यकर्ता ‘वारिस पंजाब दे’ के पाले में जा सकते हैं। भाजपा ने राज्य में व्याप्त नशे की समस्या से निपटने के लिए सितम्बर में ‘नशा मुक्ति यात्रा’ निकालने की घोषणा की है।

ऐसे में अकाली दल के साथ उसका गठजोड़ इस पहल की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है। क्योंकि अकाली दल के सत्ता में रहते उसके कई प्रमुख चेहरों के नशे के कारोबार से जुड़े होने की बात सामने आई थी। आम आदमी पार्टी सरकार बचाने के लिए जूझ रही है। उसे अपनी सामाजिक कल्याण की योजनाओं से उम्मीदें हैं। एक वक्त पर ऊपर बढ़ती दिख रही कांग्रेस विभाजित है।

भाजपा को उम्मीद है कि इस चुनावी दौड़ के बीच ही यदि अमृतपाल सिंह रिहा हो जाते हैं तो चुनावी परिदृश्य और विखंडित हो जाएगा और वह किंगमेकर के रूप में उभर सकती है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनावी जंग तो यूपी में लड़ी जानी है। इस राज्य की 80 लोकसभा सीटें उसे दूसरे राज्यों से अहम बनाती हैं।

अगर भाजपा ने 2014 में यहां पर 71 और 2019 में 62 सीटें नहीं जीती होतीं, या फिर नरेंद्र मोदी ने वड़ोदरा की सीट छोड़ वाराणसी के जरिए यूपी को अपनी कर्मभूमि न बनाया होता तो आज राष्ट्रीय परिदृश्य में भाजपा की यात्रा बहुत अलग होती। यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी ऊंचे दांव वाली लड़ाई है।

अगर वे तीसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री बनते हैं तो मोदी के बाद के दौर में वे देश के शीर्ष पद के दावेदार नेताओं की कतार में सबसे अग्रणी चेहरों में शुमार होंगे। संघ के कई लोगों का समर्थन भी योगी को प्राप्त है और यूपी से बाहर भी उनका एक प्रबल समर्थक-वर्ग है।

मसलन, हाल ही में जब उन्होंने तिरुपति का दौरा किया तो उत्साहजनक तरीके से स्थानीय लोगों ने उनका स्वागत किया था। ब्रिटेन के अखबार फाइनेंशियल टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट में तो उन्हें नरेंद्र मोदी के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में भी पेश किया गया है!

  • चुनावी राज्य बड़ा हो या छोटा, 2029 के लोकसभा चुनावों पर उसके प्रभाव के चलते सत्ताधारी दल और विपक्ष, दोनों के लिए उसका महत्व है। आगामी चुनावों में विशेष तौर पर भाजपा के लिए अपेक्षाकृत बहुत कुछ दांव पर लगा है। वह बड़े राज्यों को अपने हाथों से नहीं जाने देना चाहेगी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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