2 घंटे पहले
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अक्टूबर के महीने में पितृपक्ष के समापन से लेकर करवा चौथ तक कुल 10 बड़े व्रत-त्योहार आएंगे। इस बार के पंचांग की खास बात यह है कि नवरात्रि में कोई भी तिथि घट नहीं रही है, इसलिए पूजा पूरे नौ दिन चलेगी। वहीं दशमी तिथि दो दिन रहने की वजह से देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा दो दिन मनाया जाएगा, हालांकि ज्यादातर शहरों में 20 अक्टूबर को ही मुख्य पर्व और रावण दहन होगा। इसके बाद शरद पूर्णिमा और फिर महीने के आखिरी हफ्ते में करवा चौथ रहेगा।

अब जानिए इन त्योहारों की खास बातें
6 अक्टूबर, मंगलवार: इंदिरा एकादशी आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी व्रत होता है। इसकी कथा माहिष्मती के राजा इंद्रसेन से जुड़ी है। पद्म पुराण के अनुसार नारद मुनि राजा इंद्रसेन के पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि राजा के पिता यमलोक में हैं। उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए इंदिरा एकादशी का व्रत करने को कहा। राजा ने विधि से व्रत रखा और भगवान विष्णु की पूजा की। उन्होंने पिता के लिए श्राद्ध भी किया और व्रत का पुण्य उन्हें अर्पित किया। इससे उनके पिता को सद्गति मिली। इसी कारण पितृपक्ष में आने वाली इस एकादशी को पितरों के लिए खास माना जाता है। इस दिन लोग उपवास रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा-जप करते हैं। इस दिन पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण भी किया जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण होता है।
10 अक्टूबर, शनिवार: सर्वपितृ अमावस्या ये पितृपक्ष का आखिरी दिन होता है। आश्विन महीने की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या कहते हैं। इस दिन सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है। खासतौर से उन लोगों का श्राद्ध होता है जिनकी मृत्यु तिथि पता नहीं होती। इसलिए इसे सभी पितरों के श्राद्ध का दिन माना जाता है। इस दिन जल, तिल और कुश से तर्पण करते हैं। पिंडदान और अन्नदान भी किया जाता है। गया समेत कुछ खास तीर्थों में इस दिन पिंडदान करने की विशेष परंपरा है। इसी अमावस्या के साथ पितृपक्ष खत्म होता है।
11 अक्टूबर, रविवार: शारदीय नवरात्रि और घटस्थापना आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष के पहले दिन से शारदीय नवरात्रि शुरू होती है। इस दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है। इसके बाद नौ दिनों तक देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। लोग व्रत रखते हैं और देवी के मंत्रों का जप करते हैं। दुर्गा सप्तशती यानी देवी माहात्म्य का पाठ भी किया जाता है। इसमें देवी के महिषासुर सहित कई असुरों के साथ युद्ध और जीत का वर्णन है। इसी कारण नवरात्रि को शक्ति की विजय का पर्व माना जाता है। उत्तर भारत में नवदुर्गा पूजा की परंपरा प्रमुख है। गुजरात में गरबा और डांडिया होता है। बंगाल में आखिरी दिनों में भव्य दुर्गा पूजा होती है। नवरात्रि का समापन दशहरे के दिन होता है।
11 अक्टूबर, रविवार: महाराजा अग्रसेन जयंती आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की पहली तिथि को महाराजा अग्रसेन जयंती मनाते हैं। अग्रवाल समाज महाराजा अग्रसेन को अपना आदि पुरुष मानता है। हरियाणा का प्राचीन अग्रोहा उनकी परंपरा और अग्रवाल समाज की पहचान से जुड़ी जगह है। अग्रसेन से जुड़ी मान्यताओं में समानता और आपसी सहयोग को खास माना जाता है। बिजनेस और सामूहिक विकास भी इनके प्रमुख विचारों से जोड़े जाते हैं। इसी कारण जयंती पर सामाजिक सेवा के कार्यक्रम होते हैं। दान, स्वास्थ्य शिविर और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। अग्रसेन के जीवन से जुड़ी प्राचीन कथाएं परंपराएं मिलती हैं। द्वापर युग से उनका संबंध और 18 पुत्रों जैसी बातें भी इन्हीं परंपराओं का हिस्सा हैं।
17 अक्टूबर, शनिवार : तुला संक्रांति सूर्य जब कन्या राशि से निकलकर तुला में आता है, तब तुला संक्रांति होती है। इस दिन कई जगह पवित्र स्नान और सूर्य पूजा की जाती है। दान करने की भी परंपरा है। कर्नाटक के कोडागु में तुला संक्रांति को बेहद खास माना जाता है। वहां इसे कावेरी संक्रामण कहा जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु कावेरी नदी के उद्गम स्थल तालकावेरी पहुंचते हैं। यहां ब्रह्म कुंडिका नाम का पवित्र जलस्रोत है। स्थानीय मान्यता के अनुसार विशेष समय पर इसमें जल उभरता है। इस घटना को तीर्थोद्भव कहते हैं। इसके दर्शन के लिए लोग तालकावेरी पहुंचते हैं।
18 अक्टूबर, रविवार: दुर्गाष्टमी नवरात्रि के आठवें दिन दुर्गाष्टमी या महाष्टमी होती है। इस दिन देवी दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। नवदुर्गा परंपरा में इस दिन महागौरी की पूजा होती है। घरों में कन्या पूजन किया जाता है। छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा करते हैं और भोजन कराते हैं। कई जगह हवन भी होता है। बंगाल की दुर्गा पूजा में महाष्टमी का खास महत्व है। अष्टमी खत्म होने और नवमी शुरू होने के बीच संधि पूजा की जाती है। इसे दुर्गा पूजा के सबसे खास समय में से एक माना जाता है।
19 अक्टूबर, सोमवार: महा नवमी नवरात्रि के नौवें दिन महा नवमी होती है। इस दिन नवदुर्गा के नौवें रूप सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। कई परिवार इस दिन कन्या पूजन और हवन करते हैं। इसके बाद नवरात्रि व्रत पूरा किया जाता है। दक्षिण भारत में महा नवमी पर आयुध पूजा करने की परंपरा है। इसमें देवी के अस्त्र-शस्त्र और कामकाज में इस्तेमाल होने वाले औजार, मशीन और वाहन पूजे जाते हैं। विद्यार्थी किताबों और पढ़ाई से जुड़ी चीजों की पूजा भी करते हैं। इसके अगले दिन विजयादशमी मनाई जाती है।
20 अक्टूबर, मंगलवार: दशहरा-विजयादशमी नवरात्रि के बाद आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी को दशहरा या विजयादशमी मनाते हैं। शक्ति परंपरा में इसे देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत से जोड़ा जाता है। राम से जुड़ी परंपरा में इस दिन को रावण पर उनकी जीत के रूप में मनाते हैं। इसी कारण उत्तर भारत में दशहरे पर रामलीला पूरी होती है। इसके बाद रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं। कई जगह इस दिन शस्त्र पूजा भी होती है। महाराष्ट्र और कुछ दूसरे क्षेत्रों में शमी और अपराजिता की पूजा की जाती है। नया काम और पढ़ाई शुरू करने के लिए भी इस दिन को शुभ माना जाता है।
22 अक्टूबर, गुरुवार: पापांकुशा एकादशी आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं। पद्म पुराण में इस व्रत का जिक्र है। इसमें श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को इस एकादशी का महत्व बताते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ रूप की पूजा की जाती है। लोग व्रत रखते हैं और विष्णु भगवान के नाम का जप करते हैं। इस दिन दान करने की भी परंपरा है। पुराणों में इस दिन अन्न, जल और तिल समेत कई चीजों के दान का जिक्र है। अगले दिन द्वादशी पर व्रत का पारण किया जाता है। इस व्रत को गलत कामों और पाप से दूर रहने की भावना से भी जोड़ा गया है।
25 अक्टूबर, रविवार: शरद पूर्णिमा आश्विन महीने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। बारिश का मौसम खत्म होने के बाद यह पूर्णिमा आती है। इस समय आसमान साफ रहता है और चंद्रमा की रोशनी ज्यादा साफ दिखाई देती है। वैष्णव परंपरा में इस रात को भगवान कृष्ण की रासलीला से जोड़ा जाता है। श्रीमद्भागवत में शरद ऋतु की रात में श्रीकृष्ण के रास का वर्णन है। कई जगह इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करने की भी परंपरा है। रात में खीर बनाकर चांदनी में रखी जाती है। इसे चंद्रमा की शीतल किरणों से जोड़ा जाता है। खीर में अमृत उतरने की बात धार्मिक मान्यता है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
26 अक्टूबर, सोमवार: मीराबाई जयंती मीराबाई कृष्ण भक्ति की प्रमुख संत और कवयित्री थीं। उनका जीवन राजस्थान के मेड़ता और मेवाड़ से जुड़ा था। बचपन से ही उनकी भगवान कृष्ण में गहरी आस्था थी। आगे चलकर यही भक्ति उनके जीवन का सबसे बड़ा आधार बनी। उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य और प्रियतम मानकर कई पद लिखे। इन पदों से मीरा भक्ति साहित्य की सबसे प्रसिद्ध कवयित्रियों में शामिल हुईं। उनकी सही जन्मतिथि को लेकर इतिहासकारों में एक राय नहीं है। परंपरा के अनुसार आश्विन पूर्णिमा के आसपास उनकी जयंती मनाई जाती है। राजस्थान में इस मौके पर मीरा के भजन और पद गाए जाते हैं। चित्तौड़गढ़ में मीरा महोत्सव भी होता है।
26 अक्टूबर, सोमवार: वाल्मीकि जयंती आश्विन पूर्णिमा पर महर्षि वाल्मीकि जयंती मनाने की परंपरा है। वाल्मीकि रामायण में उनके कवि बनने से जुड़ा प्रसंग मिलता है। एक बार उन्होंने क्रौंच पक्षियों का जोड़ा देखा। उसी समय शिकारी ने उनमें से एक पक्षी को मार दिया। यह देखकर वाल्मीकि दुखी हुए और उनके मुख से छंद में शब्द निकले। परंपरा में इसे संस्कृत काव्य का पहला श्लोक माना जाता है। इसके बाद ब्रह्मा ने उन्हें भगवान राम की कथा लिखने की प्रेरणा दी। फिर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। इसी कारण उन्हें आदि कवि कहते हैं। इस दिन वाल्मीकि मंदिरों में रामायण पाठ और भजन होते हैं। कई जगह शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं।
29 अक्टूबर, गुरुवार: करवा चौथ कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ व्रत होता है। इसे करक चतुर्थी भी कहते हैं। यह व्रत खासतौर पर उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में रखा जाता है। परंपरा के अनुसार विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और अच्छे दांपत्य जीवन की कामना से व्रत करती हैं। व्रत सुबह से शुरू होता है और चंद्रमा निकलने तक रखा जाता है। शाम को भगवान शिव-पार्वती और गणेशजी की पूजा होती है। इसके बाद करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। पूजा में मिट्टी के करवे का इस्तेमाल किया जाता है। इसी करवे से इस व्रत का नाम जुड़ा है। रात में चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद पानी और भोजन लेकर व्रत पूरा किया जाता है।

