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16 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक दूरगामी फैसला लिया था, जो देश में महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति को बदल सकता था। मंत्रिमंडल ने महिलाओं के विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र को 18 से बढ़ाकर पुरुषों की तरह 21 वर्ष करने के फैसले को मंजूरी दी थी। इससे पहले एक साल से अधिक समय तक जया जेटली की अध्यक्षता वाली समिति ने इस मुद्दे की पड़ताल की थी और इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि पुरुषों और महिलाओं के विवाह की आयु को एक कर देना ही उचित होगा। लेकिन उसके बाद जाने किस वजह से इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और वह सरकार की किसी भूली-बिसरी अलमारी में धूल खाती रही। जब मंत्रिमंडल ने यह फैसला लिया था, तब इसे दूरदर्शी कदम माना गया था। इससे बाल विवाह को कम करने में मदद मिलती, जो गैरकानूनी होने के बावजूद देश के कुछ हिस्सों में अब भी जारी है। इससे लड़कियों को विवाह की चिंता से मुक्त होकर स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के लिए भी प्रोत्साहन मिलता और अनेक लड़कियां आगे की पढ़ाई भी कर पातीं। उम्मीद थी कि इससे भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले कई माता-पिता को अपनी बेटियों का जल्द से जल्द विवाह कर देने के लिए समुदाय की ओर से पड़ने वाले दबाव का विरोध करने में मदद मिलती। कानून का डर भी कई बार सामाजिक बहाना उपलब्ध करा देता है। विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष होने के बाद बेटियों को घर पर बैठाए रखने के बजाय कई माता-पिता उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज भेजने या कोई विशेष स्किल सीखने के लिए अन्य संस्थानों में दाखिला दिलाने के लिए भी सहर्ष तैयार हो सकते थे। दिलचस्प बात यह है कि 2018 में हैदराबाद स्थित नंदी फाउंडेशन द्वारा किए गए एक अध्ययन में बड़ी संख्या में लड़कियों से बातचीत की गई थी। भारत के 30 राज्यों और 600 जिलों की 75,000 लड़कियों ने इसमें हिस्सा लिया था। अध्ययन में पाया गया कि बड़ी संख्या में लड़कियां शादी की उम्र 21 वर्ष करने के पक्ष में थीं। कई लड़कियों ने भावुक होकर यह भी बताया था कि वे शादी से पहले एक नौकरी करना चाहती हैं, ताकि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए सामाजिक रूप से अधिक आत्मविश्वासी हो सकें। उन्होंने यह भी कहा था कि वे सिलाई-कढ़ाई जैसे पारंपरिक कौशलों तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि टेक्नोलॉजी आदि से जुड़े आधुनिक कौशल सीखना चाहती हैं। वास्तव में, युवा महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं और बढ़ भी रही हैं। आज महिलाएं देश का सबसे अधिक आकांक्षी वर्ग हैं। उनका समर्थन हासिल करने के लिए हर राजनीतिक दल कल्याणकारी योजनाओं के जरिए उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है। सरकार भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व देने वाले महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने के लिए उत्सुक है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद सरकार इसे परिसीमन विधेयक के साथ पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही थी। इसी पृष्ठभूमि में गृह मंत्री अमित शाह ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मुद्दे को फिर से सामने रखा है। इसका घोषित उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने के मामलों में महिलाओं को समान अधिकार देना और देश के अलग-अलग समुदायों पर लागू अलग-अलग धार्मिक निजी कानूनों की जगह एक समान कानून लाना है। यूसीसी लागू करना भाजपा का कोर एजेंडा रहा है। 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की का विवाह भारत में बाल विवाह की श्रेणी में आता है और यह नियम सभी समुदायों पर लागू होता है। विवाह की न्यूनतम आयु को 18 से बढ़ाकर 21 करने का लाभ भी हर समुदाय की लड़कियों को मिलेगा, किंतु इसका स्वरूप समान नागरिक संहिता जैसा लग सकता है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को उम्मीद हो सकती है कि 2027 की शुरुआत में होने वाले महत्वपूर्ण चुनावों- खासकर उत्तर प्रदेश में- यूसीसी के मुद्दे पर ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा की जा सकती है। यह पार्टी के लिए चुनाव जीतने का आजमाया-परखा तरीका रहा है। लेकिन किसी भी स्वरूप में यूसीसी को लागू करना आसान नहीं है। अल्पसंख्यक समुदायों- खासकर बड़ी संख्या में मुसलमानों के लिए यूसीसी उनके निजी कानूनों में हस्तक्षेप और अपनी पसंद के धर्म को मानने के उनके मौलिक अधिकार के उल्लंघन के रूप में देखा जाता है। भाजपा के कई एनडीए सहयोगी अपने-अपने राज्यों में चुनाव जीतने के लिए मुस्लिम वोटों पर निर्भर हैं और उन्होंने अमित शाह के इस ‘ट्रायल बैलून’ पर सावधानी से प्रतिक्रिया दी है। जद(यू) में कई नेताओं ने इस विचार का विरोध किया है। चिराग पासवान ने अपना फैसला टालते हुए कहा है कि उनकी पार्टी विधेयक के प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद ही निर्णय लेगी। टीडीपी ने भी स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है, हालांकि उसने कहा है कि वह इस मुद्दे पर बातचीत के लिए तैयार है। अनुप्रिया पटेल और सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (अजित पवार) का रुख भी ऐसा ही रहा है। हालांकि, शिंदे की शिवसेना ने इस कदम का समर्थन किया है। अब जब 2029 तक भारत के 21 राज्यों में यूसीसी को लेकर चर्चा केंद्र में है (इन राज्यों में भाजपा या उसके एनडीए सहयोगियों की सरकारें हैं और उत्तराखंड पहले ही यूसीसी लागू कर चुका है) तो शायद समय आ गया है कि जेटली समिति की रिपोर्ट को भी अलमारी से निकालकर उस पर नए सिरे से विचार किया जाए। यूसीसी के विपरीत, महिलाओं के विवाह की उम्र 21 वर्ष करने के निर्णय के विरोध की संभावना कम है। यह आसानी से हासिल किया जा सकने वाला कदम है और इससे करोड़ों महिलाओं की जिंदगी में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे उन्हें शिक्षा, समानता और न्याय के अधिक अवसर मिल सकते हैं। निकट भविष्य में यूसीसी लागू हो पाए या नहीं, इस निर्णय को लागू करना भारत की महिलाओं के लिए एक मजबूत संदेश होगा। स्त्री-पुरुष में समानता हो…
एक साल से अधिक समय तक पड़ताल करने के बाद जया जेटली की अध्यक्षता वाली समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि पुरुषों और महिलाओं के विवाह की न्यूनतम आयु को समान करके 21 वर्ष कर देना ही उचित होगा। लेकिन उसके बाद जाने किस वजह से इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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नीरजा चौधरी का कॉलम:लड़कियों के विवाह की उम्र बढ़ाना जरूरी
