सबसे पहले प्याज के दामों से जुड़ा ये रेट चार्ट देखिए…
.

दिल्ली, चेन्नई, भोपाल, लखनऊ जैसे कई शहरों में प्याज की कीमतें 60 रुपए प्रति किलो के पार चली गई हैं। केंद्र सरकार सिचुएशन कंट्रोल करने के लिए ‘कांदा एक्सप्रेस’ चला रही है और बड़े शहरों में खुद प्याज बेच रही है।
आपको लग रहा होगा कि ऐसा तो हर साल होता ही है और हर 8-10 साल में प्याज का बड़ा संकट आता ही है। कभी कीमतें आसमान छूने लगती हैं, तो कभी बहुत कम हो जाती हैं।
लेकिन ऐसा बार-बार क्यों होता है?
इकोनॉमिक्स के हिसाब से आपको लगेगा कि प्याज की कमी के कारण दाम बढ़ रहे होंगे, लेकिन ये बहुत ही सतही वजह है। क्योंकि केंद्रीय कृषि मंत्रालय के मुताबिक प्याज की पैदावार में कोई खास कमी नहीं है।
2024-25 में 307.67 लाख मीट्रिक टन (LMT) प्याज की पैदावार हुई थी और इस बार ये आंकड़ा 307.37 LMT हो सकता है। जबकि प्याज की कुल घरेलू खपत करीब 200 LMT सालाना है। यानी कागजों पर प्याज की खपत से पैदावार ज्यादा है, तो फिर क्यों दाम बढ़ रहे हैं?
इसका जवाब जानने के लिए देश में होने वाली प्याज की 3 फसलों को समझना होगा…
- रबी की फसल (मार्च-मई): कुल पैदावार का लगभग 70% हिस्सा रबी की फसल से आता है। केवल इसी प्याज को 4-5 महीनों तक स्टोर किया जा सकता है।
- खरीफ की फसल (अक्टूबर-दिसंबर): पैदावार का करीब 20% हिस्सा इससे आता है, लेकिन इसे ज्यादा दिनों तक स्टोर नहीं किया जा सकता।
- लेट-खरीफ की फसल (जनवरी-मार्च): करीब 10% हिस्सा इस फसल से आता है और ये खरीफ से थोड़ी अच्छी होती है, लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं टिकती।
देश की बड़ी आबादी के खाने की थाली में प्याज हर दिन अच्छी-खासी मात्रा में रहता है। हर महीने करीब 17 LMT प्याज खाया जाता है, यानी 50 किलो प्याज की 3.4 करोड़ बोरियां। प्याज की मांग सालभर लगभग एक जैसी रहती है, लेकिन सप्लाई हर वक्त एक जैसी नहीं रहती।
दरअसल, मई-जून से लेकर अक्टूबर-नवंबर तक प्याज की मांग पूरी तरह से रबी की फसल पर निर्भर रहती है और खरीफ की फसल आने तक ये सिलसिला चलता है। यानी देश की प्याज खपत का एक बड़ा हिस्सा एक ही फसल की स्टोरेज कैपेसिटी और क्वालिटी पर निर्भर रहता है।
अगर रबी की बुवाई, रोपाई और खुदाई के दौरान भारी बारिश, सूखा या कोई अन्य मौसमी दिक्कत आई, तो पैदावार खराब या कम होती है। फिर अगर भरपूर पैदावार हुई तो अगली चुनौती है- स्टोरेज की। क्योंकि रखरखाव में लापरवाही और लंबे समय तक स्टोर करने से प्याज खराब हो जाती है।
लेकिन भारत में अब भी ज्यादातर किसान पुरानी तरकीबों से प्याज स्टोर करते हैं। कोल्ड स्टोरेज के बजाय खुले और हवादार शेडों में जमीन पर ही प्याज के ढेर लगा देते हैं। इससे प्याज सड़ने और खराब होने लगता है। रखे-रखे वजन भी घटने लगता है। मौसमी दिक्कतें आईं, तो ये नुकसान और भी ज्यादा हो जाता है।
देश की 40% प्याज उगाने वाले महाराष्ट्र के किसानों का मानना है कि इस साल अप्रैल में बेमौसम बारिश हुई, जिससे पैदावार में कमी आई। साथ ही प्याज के स्टोरेज और क्वालिटी पर असर पड़ा है।
यहीं पर एक और फैक्टर काम करता है- प्याज की जमाखोरी और कालाबाजारी। अगस्त-नवंबर के बीच ही कई व्यापारी प्याज की सप्लाई को जानबूझकर रोकते हैं और फिर मौका देखकर महंगे दामों पर बेंचते हैं।
कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया ने एक स्टडी में पाया कि किसानों से 34 रुपए के भाव से खरीदी गई प्याज लोगों को 80 रुपए के भाव से बेचा जा रहा था।
इसके अलावा एग्रो-इकोनॉमिक्स की एक दिलचस्प थ्योरी भी काम करती है, जिसका नाम है- कॉबवेब साइकिल।
दरअसल, हर बार किसान पिछली बार की कीमतों के हिसाब से तय करते हैं कि कितना प्याज बोना है, जिससे उन्हें बड़ा घाटा न हो?
मान लीजिए कि पिछले सीजन में प्याज की कीमतें बहुत गिर गईं, क्योंकि सप्लाई बहुत ज्यादा थी। इससे किसान हताश हो सकते हैं और कम फसल बोने का फैसला कर सकते हैं। कम बुवाई, यानी कम पैदावार और फिर प्याज की कमी। इस कमी के कारण कीमतें आसमान छू सकती हैं।
फिर ऊंची कीमतों के चलते किसानों में अगली बार ज्यादा प्याज बोने की होड़ में मच जाती है। लेकिन जब सभी किसान ऐसा करने लगते हैं, तो बाजार में प्याज की सप्लाई बढ़ जाती है और कीमतें घट जाती हैं। यही चक्र चलता रहता है।

अगस्त 2024 में विपक्षी सांसदों ने प्याज के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की मांग को लेकर संसद के बाहर प्रदर्शन किया था। तब वे प्याज की माला पहने प्रदर्शन करने पहुंचे थे।
तो इस बार प्याज के दाम कब कम हो सकते हैं?
एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी ‘लासलगांव कृषि उपज बाजार समिति’ के डायरेक्टर जयदत्ता होलकर कहते हैं कि ‘पिछले 4-5 महीनों में प्याज का भाव दोगुना हो गया है। आगे भी कुछ हफ्तों तक तेजी देखने को मिल सकती है। क्योंकि फिलहाल मंडी में प्याज की आवक कम है।’
हालांकि अक्टूबर के आखिरी हफ्तों में खरीफ की प्याज बाजार में आने लगती है, जिससे सप्लाई भरपूर हो जाती है और दाम घटने लगते हैं। ऐसा इस बार भी हो सकता है।
उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने भी कहा है कि देश में प्याज के स्टॉक को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है। आने वाले महीने में नया प्याज आने लगेगा, जिससे सप्लाई और कीमत को लेकर लोगों को राहत मिलेगी।
हालांकि प्याज विशेषज्ञ और नेशनल हॉर्टिकल्चरल रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन (NHRDF) के एडिशनल डायरेक्टर रहे सतीश भोंडे के मुताबिक, सामान्य तौर पर रबी की फसल का प्याज दीपावली तक बाजार में आता है और फिर खरीफ वाला प्याज आने लगता है। लेकिन मौजूदा खरीफ सीजन में प्याज की कम खेती से लगता है कि इसके दाम में मामूली गिरावट आएगी।
27 अगस्त को उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने दिल्ली में प्याज बेचने वाली सरकारी मोबाइल वैन का उद्घाटन किया।
फिलहाल इसके लिए सरकार क्या कर रही है?
केंद्र सरकार ने प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड में इस साल 2 LMT रबी प्याज बफर स्टॉक जमा करने का लक्ष्य रखा था। सरकार इसका इस्तेमाल प्याज के दाम को कंट्रोल करने के लिए करती है, यानी जब बाजार में प्याज के दाम बढ़ते तो सरकार सस्ती प्याज सप्लाई करती।
लेकिन सरकारी एजेंसियां नेशनल एग्रीकल्चरल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (NAFED), नेशनल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCCF) सिर्फ 1.21 LMT प्याज ही खरीद सके। यानी 40% कम।
मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि सरकारी बफर स्टॉक की 30% प्याज सड़ गया है या खराब हो गया है, जबकि ऐसा होने की सामान्य दर 20% है। हालांकि सरकार ने इसका खंडन किया है।
दरअसल, प्याज की इकोनॉमिक्स जितनी जटिल है, उतनी ही कठिन इसकी पॉलिटिक्स है। बीते 5 दशकों में प्याज की कीमतों ने कई चुनावी नतीजे तय किए। 1980 के लोकसभा चुनाव को तो इंदिरा गांधी ने ‘प्याज चुनाव’ तक कहा था और जनता पार्टी के चौधरी चरण सिंह की सरकार गिर गई थी।
फिर 1998 में जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए, तब प्याज 40-50 रुपए किलो बिक रहा था और बीजेपी चुनाव हार गई। 2013 में प्याज की कीमतें 100 रुपए तक पहुंची और 10 साल से सत्ता में काबिज कांग्रेस की मनमोहन सरकार अगले साल हुए लोकसभा चुनाव में हार गई। यानी किसी सरकार और पार्टियों के लिए प्याज काफी अहम है।

2013 में प्याज की कीमतें बढ़ने पर भोपाल में विरोध प्रदर्शन करतीं बीजेपी की महिला कार्यकर्ताएं।
ऐसे केंद्र की बीजेपी सरकार ने फिलहाल 2 मोर्चों पर काम शुरू कर दिया है…
- खुद सस्ती प्याज बेच रही: दिल्ली-NCR में NAFED, NCCF और केंद्रीय भंडारों के जरिए सब्सिडी वाली प्याज बेची जा रही है, जिसके दाम 35 रुपए किलो हैं। तमिलनाडु, बिहार, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों के उन शहरों में भी ऐसी बिक्री शुरू होने वाली है, जहां प्याज की खपत ज्यादा है।
- कांदा एक्सप्रेस शुरू: सरकार ‘कांदा एक्सप्रेस’ नाम से खास मालगाड़ियां चलवा रही है, जो नासिक के सरकारी भंडार से 5 बड़े शहरों- दिल्ली, चेन्नई, मदुरै, कोच्चि और गुवाहाटी तक प्याज पहुंचाएगी। कांदा एक्सप्रेस से 28 अगस्त को 453.65 टन प्याज दिल्ली और 31 अगस्त को 840 टन प्याज चेन्नई पहुंचा। NAFED और NCCF भी ट्रकों से कई शहरों तक करीब 1000 टन प्याज पहुंचा रहे हैं।
पिछले साल भी सरकार ने सप्लाई बनाए रखने के लिए 86 मालगाड़ियों से 16 शहरों में 88 हजार टन प्याज भेजा था। 2024 में सिर्फ 14 मालगाड़ियों के जरिए 12 हजार टन प्याज भेजा गया था।
_______
ये खबर भी पढ़िए…
50 दिनों में 19% महंगी क्यों हुई चीनी, क्या और बढ़ेंगे दाम; दुनिया को चीनी बेचने से खरीदने की नौबत कैसे आई

पिछले 50 दिनों में चीनी 19% महंगी होकर 55.7 रुपए किलो पर पहुंच गई। ये कीमतें देशभर का सरकारी औसत हैं। कई शहरों की फुटकर दुकानों पर चीनी 65 से 70 रुपए किलो तक बिक रही है। अब सरकार ने 10 लाख टन चीनी विदेशों से मंगाने का फैसला किया है। पूरी खबर पढ़िए…
