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Pandit Vijay Shankar Mehta Column


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56 मिनट पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

देश ने पहले मंदिरों पर आक्रमण देखे। फिर प्रतिमाओं को टूटते देखा। फिर हमने एकजुट होकर मंदिरों की रक्षा की, प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा की। हमने मंदिर इसलिए बनाए थे कि वे हमारे संकट दूर करेंगे। धीरे-धीरे मंदिर खुद ही संकट में आ गए। मंदिर की मूर्ति, भवन तो अब सुरक्षित है पर दानपेटियों को सुरक्षित किया जाए। मंदिर और मूर्ति तो आस्था से बनते हैं, लेकिन उसकी व्यवस्था मनुष्य ही बनाता है। धन को लेकर मनुष्य में कुछ नैसर्गिक दोष होते हैं। अत्यधिक धन आसपास बिखरा हुआ हो तो ईमानदार रहना बड़ी तपस्या है।

अच्छे-अच्छे तपोनिष्ठ भी धन की आंधी में डगमगा जाते हैं। एक भव्य मंदिर को बनता देख किसी ने पत्थर तोड़ने वाले कारीगर से पूछा कि यह मंदिर किसका बन रहा है? कारीगर ने ले जाकर एक छोटा-सा चौका और पत्थर दिखाया, जिसको शिलान्यास पट्टिका कहते हैं। कहा इस पर जो नाम लिखा है, यह मंदिर इनका बन रहा है। कभी-कभी मंदिर में प्रमुख वह पट्टिका हो जाती है, उस पर अंकित नाम हो जाते हैं। हमें मंदिरों को ऊर्जा के केंद्र बनाना चाहिए, ना कि उपद्रव के अड्डे।

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