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- Pt. Vijayshankar Mehta Column | Teach Intrinsic Values To Young Generation
1 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
बाजार में जो चीजें मिलती हैं, उनकी कीमतें हमने तय की हैं। हम बढ़ाते हैं, हम घटाते हैं। छोटा-सा उदाहरण है कि पहले हम बहुत पैदल चला करते थे। जब से गाड़ी आई हमने ही गाड़ियों का ऐसा उपयोग किया कि उनकी कीमतें बढ़ती गईं।
यही नियम अन्य वस्तुओं पर भी लागू होता है। लेकिन हमारे ऋषि-मुनियों ने कुछ वस्तुओं में आंतरिक मूल्य की भी स्थापना की है। उसको इंट्रिंसिक वैल्यू कहते हैं और हमें उन वस्तुओं का उपयोग इसी आधार पर करना चाहिए।
भारतीय संस्कृति ने आंतरिक मूल्यों के तीन बड़े सुंदर प्रयोग किए हैं- मूर्ति, अन्न और विवाह। बाहरी मूल्य पत्थर था, हमने उसका आंतरिक मूल्य स्थापित किया मूर्ति के रूप में। बाहरी मूल्य खानपान का सामान है पर हमने अन्न, भोग और प्रसाद बनाकर उसका आंतरिक मूल्य स्थापित किया।
रिश्तों में जो अपनापन होता है, वह उनका आंतरिक मूल्य है। हमारी संस्कृति ने विवाह को आयोजन नहीं, संस्कार माना। यह उसका आंतरिक मूल्य है। हम नई पीढ़ी को वस्तुओं में आंतरिक मूल्य देखना सिखाएं।

