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Rajasthan Politics Shift | Sachin Pilot & Satish Poonia Punjab Assignment


पंजाब प्रभारी बनते ही सचिन पायलट वहां की राजनीति में एक्टिव हो गए हैं। यहां पायलट का मुकाबला राजस्थान बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया से होगा। यह पहला मौका है, जब दोनों पार्टियों ने पंजाब की जिम्मेदारी राजस्थान के नेताओं को सौंपी

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ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पंजाब में पूनिया और पायलट अपनी-अपनी पार्टियों को कितना मजबूत कर पाएंगे। राजस्थान के इन दोनों नेताओं को ही पंजाब क्यों भेजा? नई जिम्मेदारी से राजस्थान की राजनीति में क्या-क्या बदलेगा? जानेंगे आज के राजस्थान एक्सप्लेनर में…

सबसे पहले राजस्थान के जिन दो दिग्गजों के बीच पंजाब की राजनीति में टक्कर होनी है, उनका परिचय जान लेते हैं।

सवाल-1: पंजाब में राजस्थान के नेताओं को ही क्यों भेजा गया?

जवाब: मोटे तौर पर तीन कारण सबसे अहम दिखते हैं…

पहला: सीमावर्ती कनेक्शन के साथ सामाजिक-राजनीतिक समझ

राजस्थान के श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ और पंजाब के फाजिल्का-फिरोजपुर बेल्ट का रिश्ता सिर्फ नक्शे का नहीं है। यहां की राजनीति में खेती, सिंचाई, नहर, MSP, किसान असंतोष और ग्रामीण नेटवर्क जैसे कॉमन मुद्दे गहराई से असर डालते हैं।

सतीश पूनिया जाट-किसान पृष्ठभूमि से आते हैं। लंबे समय से किसान, ग्रामीण और संगठन आधारित राजनीति का हिस्सा रहे हैं। सचिन पायलट भी गुर्जर-किसान सामाजिक आधार वाले नेता माने जाते हैं। उत्तर भारत के सियासी मुद्दों को करीब से समझते हैं।

दूसरा: संगठन संभालने का अनुभव

पूनिया राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष (सितंबर 2019 से मार्च 2023 तक) रहे हैं। हरियाणा में प्रभारी रहते हुए चुनाव जिताकर अपना संगठनात्मक कौशल साबित कर चुके हैं। उनकी पहचान ऐसे नेता की रही है, जो कैडर, ढांचे और चुनावी तैयारी पर काम करते हैं।

पायलट के पास बतौर पार्टी प्रदेशाध्यक्ष 6 साल (2014 से 2020) से ज्यादा प्रदेश संगठन चलाने का अनुभव है। राजस्थान विधानसभा चुनाव-2018 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी से पहले संगठन को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देने में उनका अहम योगदान था।

दोनों नेताओं के पास सिर्फ जनाधार ही नहीं, बल्कि कमजोर या बिखरे संगठन में फिर से जोश-ऊर्जा भरने का अच्छा-खासा अनुभव भी है।

तीसरा: पार्टी की जरूरत के अनुसार दोनों नेता फिट

भाजपा की चुनौती पंजाब में पार्टी विस्तार की है। अकाली दल से अलग होने के बाद उसे अपने दम पर 117 सीटों पर लड़ने लायक संगठन, स्थानीय चेहरे और सामाजिक पहुंच बनानी है। यहां पूनिया की उपयोगिता एक संगठन खड़ा करने वाले नेता की है। उनसे उम्मीद यह नहीं है कि वे अचानक करिश्माई लहर बना देंगे, बल्कि यह है कि वे बूथ से जिला लेवल तक पदाधिकारी और नए स्थानीय चेहरों को जोड़कर भाजपा को ‘अकेले लड़ने लायक’ ढांचे में बदलें।

कांग्रेस की चुनौती अलग है। उसके पास पंजाब में भाजपा से ज्यादा राजनीतिक जमीन तो है, लेकिन फिलहाल अंदरूनी खींचतान ज्यादा है। वडिंग, चन्नी, रंधावा और बाजवा जैसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच तालमेल बनाना सबसे मुश्किल काम है। यहां पायलट की उपयोगिता एक संवादकारी और संतुलन बनाने वाले नेता की है। राजस्थान की राजनीति में लंबे समय तक अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच काम करने का अनुभव उन्हें पंजाब में उपयोगी बना सकता है।

जालंधर में पंजाब भाजपा की संगठनात्मक बैठक को संबोधित करते प्रभारी सतीश पूनिया।

जालंधर में पंजाब भाजपा की संगठनात्मक बैठक को संबोधित करते प्रभारी सतीश पूनिया।

सवाल 2: सतीश पूनिया के सामने असली चुनौती क्या है और वे किस रणनीति से काम कर रहे हैं?

जवाब: भाजपा ने ऐलान किया है कि वह 2027 में पंजाब की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। लंबे समय तक पंजाब में भाजपा की राजनीति शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन पर टिकी रही। 2020 में किसान कानूनों के मुद्दे पर यह गठबंधन टूट गया।

इसके बाद भाजपा को पंजाब में अपना अलग आधार खड़ा करना पड़ा। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 73 सीटों पर चुनाव लड़ा, सिर्फ 2 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 6.6% रहा। लोकसभा चुनाव-2024 में वोट प्रतिशत बढ़कर 18.6% हुआ, लेकिन एक भी सीट नहीं मिल पाई।

यहीं से पूनिया की असली परीक्षा शुरू होती है। 117 सीटों पर उम्मीदवार उतारने से पहले वहां बूथ स्तर तक काम करने वाला संगठन खड़ा करना है। संगठन की ताकत और कमजोरी समझने के लिए पूनिया ने पंजाब पहुंचते ही पदाधिकारियों, जिला अध्यक्षों और जिला प्रभारियों के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं।

गठबंधन के दौरान भाजपा का आधार मुख्य रूप से शहरी और हिंदू बहुल सीटों पर था, जबकि अकाली दल के पास ग्रामीण और सिख वोट का नेटवर्क था। 2022 में भाजपा का वोट शेयर 6.6% और अकाली दल का 18.38% था। इसका मतलब है कि भाजपा को अब उस ग्रामीण और सिख स्पेस में भी घुसना होगा, जहां वह पहले कमजोर रही है।

इसी दिशा में 2 अगस्त 2026 को नई राज्य टीम बनाई गई। इसमें 12 उपाध्यक्षों में से कुछ नेता ऐसे शामिल किए गए, जो कांग्रेस, अकाली दल या अन्य पार्टियों से भाजपा में आए थे। यानी पूनिया का मिशन सिर्फ पुराने कैडर को सक्रिय करना नहीं, बल्कि नए स्थानीय चेहरों के जरिए नई सामाजिक-राजनीतिक जमीन भी तैयार करना है।

सवाल 3: सचिन पायलट के लिए बड़ी परीक्षा क्या है?

जवाब: पायलट के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस को अंदरूनी तौर से संभालने की है।

पंजाब कांग्रेस में इस समय कई पावर सेंटर हैं। एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग हैं। दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में असंतुष्ट खेमा है, जो वडिंग को हटाने की मांग करता रहा है। इसके अलावा सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और विधायक परगट सिंह जैसे नेता भी सक्रिय हैं।

जुलाई में चन्नी और रंधावा की बैठक के बाद इस खेमे ने हाईकमान तक यह संदेश पहुंचाया कि वडिंग के नेतृत्व में 2027 का चुनाव जीतना मुश्किल होगा। इसके बावजूद कांग्रेस ने जुलाई में वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा। साथ ही चन्नी को कैंपेन कमेटी का चेयरमैन, रंधावा को कोर कमेटी का चेयरमैन और प्रताप सिंह बाजवा को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए रखा।

यानी हाईकमान ने किसी एक नेता को पूरी कमान देने के बजाय अलग-अलग नेताओं में जिम्मेदारियां बांटकर संतुलन बनाने की कोशिश की। लेकिन यही मॉडल नई समस्या बन गया। संगठन वडिंग के पास, चुनावी अभियान चन्नी के पास और विधानसभा में नेतृत्व बाजवा के पास है। ऐसे में अलग-अलग पावर सेंटर के बीच तालमेल चुनौती बना हुआ है।

जुलाई-अगस्त में चन्नी और वडिंग समर्थकों के बीच कई कार्यक्रमों में नारेबाजी और टकराव की खबरें भी सामने आईं।

पंजाब कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात के बाद सचिन पायलट ने अगले ही दिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से मिले।

पंजाब कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात के बाद सचिन पायलट ने अगले ही दिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से मिले।

सवाल-4: पायलट को भूपेश बघेल की जगह क्यों भेजा गया?

जवाब: क्योंकि कांग्रेस का पिछला मैनेजमेंट मॉडल पंजाब में काम नहीं कर पाया।

भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाकर गुटों के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश की गई थी। लेकिन चन्नी-रंधावा खेमे ने उन पर वडिंग के पक्ष में झुकाव का आरोप लगाया। कुछ कार्यक्रमों में बघेल के खिलाफ पोस्टर और नारे भी लगे।

इसके बाद 5 सितंबर को कांग्रेस ने बघेल को पंजाब से हटाकर असम भेज दिया और उनकी जगह पायलट को नया प्रभारी बना दिया।

नियुक्ति के अगले ही दिन चन्नी, रंधावा और वडिंग तीनों ने पायलट का सार्वजनिक तौर पर स्वागत किया और सहयोग का भरोसा दिया। लेकिन इससे विवाद खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। उन्हें किसी एक गुट का नहीं, बल्कि ऐसा मध्यस्थ बनना है, जिस पर सभी पक्ष भरोसा कर सकें।

सवाल 5: दोनों की परीक्षा में सबसे बड़ा फर्क क्या है?

जवाब: पूनिया के सामने सवाल है- भाजपा की जमीन कितनी बढ़ेगी?

पायलट के सामने सवाल है- कांग्रेस की जमीन कितनी बचाई और जोड़ी जा सकेगी?

भाजपा 2022 में सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी। 2024 लोकसभा में वोट बढ़े, लेकिन सीट नहीं मिली। इसलिए पूनिया के लिए सफलता का पैमाना संगठन विस्तार और वोट को सीट में बदलना होगा।

पंजाब विधानसभा चुनाव-2022 में कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई थी, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में 13 में 7 सीटें जीतकर वापसी के संकेत दे चुकी है। पायलट के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस बढ़त को विधानसभा चुनाव में जीत में बदलना और उससे पहले अंदरूनी लड़ाई को रोकना है।

सवाल 6: पंजाब के नतीजों का दोनों नेताओं की सियासी पारी पर क्या असर होगा?

जवाब: अगर सचिन पायलट पंजाब में कांग्रेस के धड़ों को साथ रखकर बेहतर प्रदर्शन कराते हैं, तो इससे उनका राष्ट्रीय संगठनात्मक कद बढ़ेगा। अगर पूनिया भाजपा को अकाली दल के साए से बाहर निकालकर पंजाब में सीट और वोट शेयर दोनों स्तर पर विस्तार दिला पाते हैं, तो यह बढ़त उनकी संगठनात्मक क्षमता के खाते में जाएगी।

यानी पंजाब के नतीजों का असर सिर्फ चंडीगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा। जयपुर में भी यह देखा जाएगा कि राजस्थान के इन दोनों नेताओं ने दूसरे राज्य में मिली बड़ी राजनीतिक परीक्षा को कैसे संभाला।



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