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Rashmi Bansal Column | Jaigaon Bhutan Border Travel Experience


3 घंटे पहले

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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर - Dainik Bhaskar

रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

पश्चिम बंगाल का जयगांव देश का एक आम शहर है। बाजार में लाउडस्पीकर बज रहा है, पंडाल सज रहे हैं। लोग बातें कर रहे हैं, रेहड़ी पर खा रहे हैं। और इस हुड़दंग के बीच एक छोटा-सा द्वार है। पासपोर्ट पेश कीजिए और खुल जा सिम-सिम : बिना कुछ कहे आप पहुंच जाते हैं एक नई दुनिया में।

भूटान! पर्वतों की गोद में सिमटा एक नन्हा-सा देश, जो अपनी ही धुन पर थिरकता है। बॉर्डर पार करते ही आपको महसूस होता है सुकून। व्यवस्थित, साफ-सुथरा, कोई शोर-शराबा नहीं। लोग स्वस्थ दिखते हैं, और खुश भी। हवा वही, लेकिन आब-ओ-हवा नई।

खैर, जैसे हम थिम्फू की तरफ बढ़ते गए, हवा भी बदल गई। पेड़ों से ढके हुए पर्वतों ने आंखों से कहा, देखो, यह होती है प्रकृति। इसे हम अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं करते। जी हां, भूटान में पेड़ काटना सख्त मना है और वहां के लोग इस बात को सीरियसली लेते हैं।

असल में कुछ पचास साल पहले भूटान के शासक ने तय किया कि उनका देश धन-दौलत के फेर में नहीं पड़ेगा। क्योंकि सिर्फ भौतिक सुख सच्चा सुख नहीं। जीडीपी बढ़ाने के लिए प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्री लगानी पड़े, नदियों में कचरा बहाना पड़े, तो ऐसा विकास हमें मंजूर नहीं।

तो भूटान ने अपनाया एक नया विचार : ग्रॉस डोमेस्टिक हैप्पीनेस, यानी सकल राष्ट्रीय खुशी। प्रगति होगी, विकास होगा, लेकिन उसका माप-तोल सिर्फ पैसों से नहीं होगा। यह कॉन्सेप्ट दुनिया भर में लोगों को पसंद आया, लेकिन और किसी देश ने इसे अपनाया नहीं। क्यों? आखिर हर इंसान खुशी ही तो चाहता है।

लेकिन मुद्दा यह है कि ‘खुशी’ का अर्थ क्या है, इस पर हम सहमत नहीं। अगर आपसे कहा जाए कि रोज आप दफ्तर में, स्कूल-कॉलेज में सिर्फ अपनी नेशनल ड्रेस ही पहन सकते हैं, तो क्या आप मानेंगे? लेकिन भूटान में यही नियम है। इसी तरह सबके घर बाहर से एक जैसे दिखते हैं, एक ही स्टाइल में बनते हैं।

हमने जब गाइड से कहा, रॉयल फैमिली का पैलेस दिखा दीजिए। वो बोले, उधर कुछ खास नहीं। राजा-रानी भी प्रजा की तरह ही रहते हैं। हां, उनका घर थोड़ा बड़ा होगा, लेकिन कोई आलीशान महल नहीं। और हमारे यहां? एक तरफ आसमान चूमती इमारतें, और वहां से नजारा झुग्गी-झोपड़ियों का।

बाहर वाले को साफ दिखता है कि भूटान में लोगों के बीच सामाजिक ऊंच-नीच कम है, और घपले-घोटाले का नामोनिशान नहीं। कहते हैं न, यथा राजा तथा प्रजा। भूटान के राजा देशवासियों की सेवा को अपना फर्ज मानते हैं। दूसरी ओर भारत में प्रजा के सदस्य ही राज करते हैं और उनकी नीयत साफ दिखती है। जहां से पैसे बना सको, बना लो, चाहे जनता का नुकसान हो या पर्यावरण का।

यह जरूर है कि भूटान की जनसंख्या बहुत कम है- शायद मुंबई के अंधेरी या दिल्ली के लाजपतनगर जितनी। लेकिन आप अपने मोहल्ले को ही देख लीजिए, जहां 100-200 परिवार ही रहते हैं। वहां कितने लोग अनुशासन का पालन करते हैं? ट्रैफिक हो या घर का फ्लोर प्लान, नियम तोड़ने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं।

फिर हमारी सड़कों पर, हमारे शहरों में और हमारी संसद में भी झगड़े चलते ही रहते हैं। असहमति बुरी बात नहीं; नीतियों पर सवाल उठना भी जरूरी है। लेकिन जब हर मतभेद में अपना स्वार्थ घुला हो, तो पिसता है देश और उसकी आम जनता।

अब सबसे अहम सवाल- भूटान की जनता क्या दुनिया में सबसे ज्यादा खुश है? मैंने कई लोगों से पूछा। अलग-अलग जवाब मिले। मुझे लगा कि वहां ज्यादातर लोग एक अच्छी जिंदगी गुजार रहे हैं, उन्हें संतोष है। लेकिन नौजवान थोड़े मायूस भी हैं। इंटरनेट के जरिए वो बाहरी दुनिया की चकाचौंध की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। शायद जवानी ऐसी ही होती है- आप स्वर्ग में भी जन्मे हों, तो नरक की सैर करने के बाद ही उसकी वैल्यू महसूस होगी!

खैर, भूटान की यादें अपने दिल में जोड़कर हम बॉर्डर पहुंचे, पासपोर्ट दिखाया और इंडिया में प्रवेश किया। फिर एक अलग दुनिया में कदम रखा। धूम-धड़ाका, धूल-पसीना। विविधता में भी खुलकर जीना। है कुछ ऊर्जा, है कुछ बात। नमस्ते इंडिया, सुप्रभात!

‘खुशी’ क्या है? अगर आपसे कहा जाए कि रोज आप अपनी नेशनल ड्रेस ही पहन सकते हैं, तो क्या इसे खुशी से मानेंगे? लेकिन भूटान में यही नियम है। इसी तरह सबके घर बाहर से एक जैसे दिखते हैं, एक ही स्टाइल में बनते हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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