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Renuka Shahane Success Story; Casting Couch


7 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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अपनी शर्तों पर फैसले लेकर रेणुका शहाणे ने थिएटर से फिल्मों, टीवी और निर्देशन तक अलग पहचान बनाई। - Dainik Bhaskar

अपनी शर्तों पर फैसले लेकर रेणुका शहाणे ने थिएटर से फिल्मों, टीवी और निर्देशन तक अलग पहचान बनाई।

रेणुका शहाणे का नाम आते ही लोगों के जेहन में ‘हम आपके हैं कौन’ की संस्कारी भाभी पूजा और ‘सुरभि’ का सहज चेहरा उभरता है। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ एक सुपरहिट फिल्म और लोकप्रिय टीवी शो तक सीमित नहीं है। मनोविज्ञान की पढ़ाई से लेकर थिएटर, टीवी, फिल्मों और निर्देशन तक रेणुका ने हर पड़ाव पर अपनी शर्तों पर काम किया।

सफलता के बाद भी उन्होंने लोकप्रियता के बजाय ऐसे किरदार चुने, जिनसे उन्हें कुछ नया सीखने को मिले। इसी सोच के कारण उन्होंने कई फिल्मी ऑफर्स ठुकराए और टीवी को प्राथमिकता दी। लेकिन टीवी पर उन्होंने एक ऐसा किरदार निभाया, जो दर्शकों के लिए चौंकाने वाला था। रेणुका ने साबित किया कि लोकप्रिय छवि के पीछे एक बहुआयामी अभिनेत्री भी मौजूद है। उनके लिए स्टारडम से ज्यादा जरूरी हमेशा अच्छा काम रहा।

आज की सक्सेस स्टोरी में रेणुका शहाणे के करियर और निजी जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें

मनोविज्ञान पढ़ रही थीं, लेकिन एक नाटक ने जिंदगी की दिशा बदल दी

7 अक्टूबर 1966 को मुंबई में जन्मीं रेणुका शहाणे ऐसे परिवार में पली-बढ़ीं, जहां कला और साहित्य का माहौल था। उनके पिता विजय कुमार शहाणे भारतीय नौसेना में अधिकारी थे, जबकि मां शांता गोखले जानी-मानी लेखिका, थिएटर से जुड़ी शख्सियत और फिल्म समीक्षक हैं। रेणुका के भाई गिरिश शहाणे भी लेखक और कला समीक्षक हैं।

रेणुका शहाणे ने सेंट जेवियर्स कॉलेज से मनोविज्ञान की पढ़ाई की। कॉलेज के सेकंड ईयर में ‘अंधेर नगरी’ नाटक का मंचन होना था। नाटक में करीब 14 गाने थे और रेणुका संगीत मंडल का हिस्सा थीं। बैकग्राउंड वोकल्स के सिलसिले में वह नाटक की पूरी प्रक्रिया से जुड़ गईं।

स्क्रिप्ट से स्टेज तक का सफर देखकर उन्हें थिएटर की ताकत महसूस हुई। वह कहती हैं, “उस समय मैंने यह नहीं सोचा था कि मुझे अभिनेत्री बनना है, लेकिन यह जरूर तय किया कि मुझे थिएटर का हिस्सा बनना है।” यहीं से उनके भीतर अभिनय के प्रति नया जुनून पैदा हुआ।

मां के दोस्त सत्यदेव दुबे ने पूछा- अभिनय करोगी? इस बार जवाब ‘हां’ था

रेणुका की मां शांता गोखले के करीबी दोस्त और दिग्गज थिएटर निर्देशक सत्यदेव दुबे अक्सर उनके घर आते थे। वह रेणुका से बार-बार पूछते थे कि क्या वह अभिनय करेंगी। शुरुआत में वह पढ़ाई को प्राथमिकता देते हुए मना कर देती थीं। लेकिन ‘अंधेर नगरी’ के अनुभव के बाद उनका नजरिया बदल चुका था।

अगली बार सत्यदेव दुबे ने वही सवाल पूछा तो रेणुका ने हामी भर दी। इसके बाद उन्होंने उनके साथ वर्कशॉप्स कीं और मराठी थिएटर की संस्था ‘अंतरनाट्य’ के साथ एक्सपेरिमेंटल थिएटर किया। उन्होंने अभिनय के साथ सेट, मेकअप, कॉस्ट्यूम और लाइटिंग जैसे काम भी सीखे। यही उनकी असली ट्रेनिंग बनी।

एक्टिंग करियर नहीं, शौक था; फिर ‘सर्कस’ ने बदल दी सोच

थिएटर करते-करते रेणुका की मुलाकात उस दुनिया से हुई, जिसे वह शुरू में करियर नहीं मानती थीं। उन्होंने टीवी शो ‘पीसी और मौसी’ से स्क्रीन पर शुरुआत की और इसके बाद ‘सर्कस’ में काम किया। शाहरुख खान स्टारर ‘सर्कस’ उनके लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ। निर्देशक अजीज मिर्जा ने उन्हें अभिनय को गंभीरता से लेने की सलाह दी।

उस समय रेणुका क्लिनिकल साइकोलॉजी में एमए कर चुकी थीं और पीएचडी करने के बारे में सोच रही थीं। लेकिन अजीज मिर्जा ने उन्हें समझाया कि अभिनय में हुनर है तो इसे पेशे के रूप में आजमाना चाहिए। रेणुका ने पहली बार महसूस किया कि थिएटर का शौक अब उनका प्रोफेशन बन सकता है।

पीएचडी का सपना छोड़कर चुना अभिनय, फिर ‘सुरभि’ ने घर-घर पहुंचाया

‘सर्कस’ के बाद रेणुका की जिंदगी में ‘सुरभि’ आई। सिद्धार्थ काक के साथ इस कार्यक्रम ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। छोटे बाल, साड़ी और सहज अंदाज में नजर आने वाली रेणुका का व्यक्तित्व दर्शकों को पसंद आया। लेकिन इस मुकाम से पहले उन्होंने करियर की दिशा बदलने का बड़ा फैसला लिया था।

रेणुका कहती हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे अभिनेत्री बनना है। शुरुआत में तो सिर्फ थिएटर का हिस्सा बनना चाहती थी। लेकिन धीरे-धीरे एक्टिंग मेरा पैशन बन गया और फिर यही मेरा प्रोफेशन बन गया।” ‘सुरभि’ की सफलता ने उन्हें सिर्फ अभिनेत्री नहीं, बल्कि दर्शकों से सीधे जुड़ने वाला चेहरा बना दिया।

‘हम आपके हैं कौन’ की पूजा बनने से पहले ही मिल गई थी चेतावनी

1994 में सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ रिलीज हुई और रेणुका शहाणे का किरदार पूजा घर-घर में पहचान बन गया। वह माधुरी दीक्षित की बड़ी बहन और सलमान खान की भाभी बनी थीं। लेकिन रोल स्वीकार करने से पहले उन्हें एक अहम चेतावनी दी गई थी।

राजकुमार बड़जात्या ने उन्हें बताया था कि भाभी का किरदार करने के बाद इंडस्ट्री उन्हें इसी तरह के रोल में देखने लग सकती है। फिर भी रेणुका ने फिल्म की। उनकी प्राथमिकता हीरोइन बनना नहीं, बल्कि अच्छा किरदार निभाना था। फिल्म की जबरदस्त सफलता के बाद यही चेतावनी सच साबित हुई और उनके सामने नई चुनौती खड़ी हो गई।

फिल्म हिट हुई तो ऑफर्स बढ़े, लेकिन किरदार वही रहे

‘हम आपके हैं कौन’ के बाद रेणुका के पास फिल्मों के ऑफर्स की कमी नहीं थी। परेशानी यह थी कि ज्यादातर ऑफर्स में किरदार नहीं बदल रहे थे। उन्हें बार-बार हीरो की बहन, भाभी या ‘अच्छी भारतीय लड़की’ के रोल दिए जा रहे थे। रेणुका ने महसूस किया कि फिल्मों में उनकी पहचान एक ही तरह के किरदार में सीमित की जा रही है।

दूसरी तरफ टेलीविजन पर उन्हें ज्यादा मजबूत और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं मिल रही थीं। इसलिए उन्होंने फिल्मों से दूरी बनाकर टीवी को प्राथमिकता दी। उनके लिए सिर्फ फिल्म में काम करना उपलब्धि नहीं था। वह ऐसा काम करना चाहती थीं, जिसमें अभिनेत्री के तौर पर खुद को साबित करने की गुंजाइश हो।

‘फिल्म नहीं, अच्छा किरदार चाहिए’- यही सोच उन्हें बाकी कलाकारों से अलग करती रही

फिल्मों को मना करने के फैसले के पीछे रेणुका की महत्वाकांक्षा का अलग नजरिया था। वह किसी खास मुकाम तक पहुंचने की दौड़ में शामिल नहीं थीं। उन्होंने कहा, “मेरी महत्वाकांक्षा यह नहीं थी कि मुझे किसी खास मुकाम तक पहुंचना है। इसलिए मुझे जो भी मिल रहा था, वह मेरे लिए एक अतिरिक्त खुशी थी।”

थिएटर की ट्रेनिंग ने उन्हें सिखाया था कि काम की गुणवत्ता लोकप्रियता से ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह बताती हैं कि थिएटर में सामने पांच दर्शक हों या सौ, कलाकार उतनी ही शिद्दत से काम करता था। यही अनुशासन उन्होंने फिल्मों और टीवी में भी अपनाया। इसलिए सफलता के बावजूद उन्होंने सिर्फ नाम के लिए काम स्वीकार नहीं किया।

टीवी पर किया ऐसा रोल, जिसे देखकर दर्शकों ने कहा- ‘आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी’

‘सुरभि’ के बाद रेणुका ने ‘सैलाब’, ‘जुनून’, ‘घुटन’, ‘9 मालाबार हिल’ और ‘कोरा कागज’ जैसे कई टीवी प्रोजेक्ट्स किए। यहां उन्हें अपनी ‘भाभी’ वाली छवि से बिल्कुल अलग किरदार निभाने का मौका मिला। ‘सैलाब’ में उन्होंने ऐसी महिला का किरदार निभाया था, जिसका एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर था।

दर्शकों के लिए यह भूमिका चौंकाने वाली थी, क्योंकि उनके मन में रेणुका की छवि संस्कारी और सहज महिला की बन चुकी थी। खुद रेणुका ने बताया कि लोग उनसे कहते थे, “आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।” इस दौर में उन्होंने साबित किया कि लोकप्रिय छवि के पीछे एक बहुआयामी अभिनेत्री भी मौजूद है।

करियर में स्ट्रगल? रेणुका का जवाब सुनकर कहानी का पूरा नजरिया बदल जाता है

रेणुका की कहानी में स्ट्रगल का सवाल भी दिलचस्प है। वह मानती हैं कि उन्हें बहुत ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा। इसकी एक वजह उनका मुंबई में जन्म और परिवार का मजबूत सपोर्ट था। ऑडिशन में काम नहीं मिलता था तो भी उनके पास घर और परिवार था।

वह कहती हैं, “जब भी मुझे कोई किरदार नहीं मिलता था या मैं ऑडिशन देकर आती थी, तो मेरे पास अपना घर और परिवार था। सिर पर छत थी और खाने-पीने की कोई परेशानी नहीं थी।” वह मानती हैं कि आर्थिक सुरक्षा ने उन्हें अपने मन का काम चुनने की आजादी दी। इसलिए वह खुद को संघर्ष से ज्यादा ‘ब्लेस्ड’ मानती हैं।

पहली शादी टूटी, लेकिन रेणुका ने रिश्तों से उम्मीद नहीं छोड़ी

रेणुका की निजी जिंदगी भी हमेशा आसान नहीं रही। उनकी पहली शादी मराठी थिएटर लेखक और निर्देशक विजय केंकरे से हुई थी, लेकिन रिश्ता ज्यादा लंबा नहीं चला और दोनों का तलाक हो गया। इस अनुभव का असर इसलिए भी गहरा था क्योंकि बचपन में उन्होंने अपने माता-पिता का अलगाव भी देखा था।

रेणुका ने बताया था कि जब उनके माता-पिता अलग हुए, तब वह सिर्फ आठ साल की थीं। कुछ लोग अपने बच्चों को उनसे खेलने से रोकते थे और कहते थे कि वह ‘टूटे हुए परिवार’ से आती हैं। आगे चलकर परिवार और रिश्तों की जटिलताएं उनकी रचनात्मक सोच का हिस्सा बनीं।

34-35 की उम्र में फिर प्यार हुआ, आशुतोष राणा के साथ शुरू हुई नई कहानी

पहली शादी टूटने के बाद रेणुका ने दोबारा शादी को लेकर जल्दबाजी नहीं की। फिर उनकी जिंदगी में अभिनेता आशुतोष राणा आए। दोनों ने करीब तीन साल डेट करने के बाद 25 मई 2001 को शादी की। यह रिश्ता खास था, क्योंकि रेणुका लोकप्रिय अभिनेत्री थीं, जबकि आशुतोष राणा अपने दमदार विलेन किरदारों के लिए पहचाने जाते थे।

पहली शादी के अनुभव के बाद रेणुका का रिश्ते और शादी को लेकर नजरिया ज्यादा परिपक्व हो चुका था। दोनों के दो बेटे हैं- शौर्यमान और सत्येंद्र। लंबे वैवाहिक जीवन के बावजूद दोनों ने पर्दे पर साथ बहुत कम काम किया।

कास्टिंग काउच का ऑफर आया तो रेणुका ने काम से ज्यादा अपनी शर्तों को चुना

रेणुका के करियर का एक कड़वा अनुभव भी रहा, जिसके बारे में उन्होंने काफी समय बाद खुलकर बात की। 2025 में उन्होंने जूम चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआती दिनों में एक शादीशुदा निर्माता उनके घर आया था। उसने साड़ी कंपनी का ब्रांड एंबेसडर बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन साथ में ऐसा निजी प्रस्ताव रखा जिसे रेणुका ने स्वीकार नहीं किया।

निर्माता ने उनके साथ रहने के बदले हर महीने स्टाइपेंड देने की बात कही थी। रेणुका और उनकी मां इस प्रस्ताव से हैरान रह गईं। उन्होंने साफ इनकार कर दिया। यह घटना उनके लिए सिर्फ एक गलत प्रस्ताव नहीं थी, बल्कि उस माहौल की हकीकत भी थी, जहां गलत लोगों को मना करने की कीमत करियर में चुकानी पड़ सकती थी।

‘ना’ कहने की कीमत पता थी, फिर भी समझौता नहीं किया

कास्टिंग काउच के अनुभव को बताते हुए रेणुका ने कहा कि इंडस्ट्री में किसी प्रभावशाली व्यक्ति के गलत प्रस्ताव को ठुकराने के बाद बदले की कार्रवाई का खतरा रहता है। किसी प्रोजेक्ट से निकालना या काम से दूर रखना जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। लेकिन उन्होंने करियर की कीमत पर भी अपनी सीमाओं से समझौता नहीं किया।

यही बात उनकी पूरी यात्रा में दिखाई देती है। चाहे ‘हम आपके हैं कौन’ में भाभी का रोल स्वीकार करना हो, उसके बाद उसी तरह के रोल से दूरी बनानी हो या गलत प्रस्ताव ठुकराना- रेणुका ने हर बार वही चुना, जो उन्हें सही लगा।

अभिनेत्री से निर्देशक बनीं, मां की कहानी को पर्दे पर उतारा

अभिनय के साथ रेणुका के भीतर निर्देशन की इच्छा भी लंबे समय से थी। ‘लाइफलाइन’ में उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया था। बाद में उन्होंने मराठी फिल्म ‘रीटा’ से निर्देशन की शुरुआत की। यह फिल्म उनकी मां शांता गोखले के उपन्यास ‘रीटा वेलिंगकर’ पर आधारित थी।

इसके बाद 2021 में उन्होंने हिंदी फिल्म ‘त्रिभंगा’ का निर्देशन किया, जिसमें काजोल, तन्वी आजमी और मिथिला पालकर नजर आईं। फिल्म में मां-बेटी के रिश्ते, परिवार, महत्वाकांक्षा और अलगाव की जटिलताओं को दिखाया गया। जिस निजी अनुभव को उन्होंने बचपन में महसूस किया था, वही आगे चलकर उनकी रचनात्मक दुनिया का हिस्सा बना।

हाल ही में रेणुका ने ‘तर्पण’ नाम की शॉर्ट फिल्म बनाई है, जिसमें पहली बार अपने पति आशुतोष राणा को डायरेक्ट किया।

आज पीछे मुड़कर देखती हैं तो कोई मलाल नहीं, कहती हैं- ‘मुझे बहुत कुछ मिला है’

रेणुका शहाणे से जब पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि जिंदगी में कुछ छोटा रह गया या कुछ और हासिल करना बाकी था, तो उनका जवाब उनकी पूरी यात्रा का सार है। वह कहती हैं, “नहीं, मैं ऐसा नहीं सोचती। क्योंकि जो मुझे मिला है, वह बहुत मिला है। मैंने तो कभी इसकी मांग भी नहीं की थी।”

वह मानती हैं कि किसी अभिनेत्री के लिए अच्छी भूमिका मिलना ही बड़ी बात है और उन्हें एक नहीं, बल्कि कई ऐसी भूमिकाएं मिलीं, जिन्होंने इतिहास रचा। वह इसे उपलब्धि से ज्यादा ‘कृपा और ब्लेसिंग’ मानती हैं। यही वजह है कि सफलता के इतने साल बाद भी उनमें अधूरेपन का भाव नहीं है।

‘मैंने कभी अवॉर्ड लेकर स्पीच की प्रैक्टिस नहीं की’- रेणुका की सफलता का असली मंत्र

रेणुका की सफलता की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि उन्होंने कभी सफलता को लक्ष्य बनाकर काम नहीं किया। वह कहती हैं, “मैंने कभी आईने के सामने खड़े होकर कोई अवॉर्ड हाथ में लेकर स्पीच की प्रैक्टिस नहीं की।” वह थिएटर में शौक और पैशन के तौर पर आई थीं।

उन्हें पता ही नहीं चला कि कब थिएटर उनका व्यवसाय और अभिनय उनका प्रोफेशन बन गया। हर काम से उन्होंने कुछ नया सीखा और लोकप्रियता को उपलब्धि के बजाय अतिरिक्त खुशी की तरह लिया। यही सोच उन्हें उस अभिनेत्री से अलग बनाती है, जिसने सफलता के बाद भी अपनी शर्तों पर काम करना नहीं छोड़ा।

रेणुका की कहानी में सबसे बड़ी जीत स्टारडम नहीं, अपने फैसलों पर कायम रहना है

रेणुका शहाणे की कहानी को सिर्फ ‘सुरभि’ या ‘हम आपके हैं कौन’ की सफलता से समझना अधूरा होगा। उनकी असली कहानी उन फैसलों में छिपी है, जो उन्होंने लोकप्रियता के बावजूद लिए। फिल्मों में एक जैसी भूमिकाएं मिलीं तो टीवी चुना, निजी जिंदगी में रिश्ते टूटे तो खुद को संभाला, गलत प्रस्ताव आया तो मना किया और अभिनय के बाद निर्देशन में भी कदम रखा।

वह खुद कहती हैं, “मुझे बहुत कुछ मिला है।” शायद यही उनकी सफलता का सबसे सच्चा पैमाना है- उन्होंने कभी यह तय नहीं किया कि उन्हें कितना बड़ा बनना है, लेकिन जो काम मिला, उसे ईमानदारी से किया। इसी सफर ने उन्हें दर्शकों की यादों में हमेशा के लिए जगह दे दी।

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