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Sant Ishwar Samman 2026 Delhi


नई दिल्ली में डॉ. तारा देवी सेन को सम्मानित करते हुए उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन।

हिमालयी जंगली खाद्य पौधों के संरक्षण, संवर्धन और इनके पारंपरिक ज्ञान को नई पहचान दिलाने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए वीजीसी मंडी के वनस्पति विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. तारा देवी सेन को संत ईश्वर सम्मान 2026 से सम्मानित किया गया। उन्हें

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नई दिल्ली स्थित मावलंकर ऑडिटोरियम, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने डॉ. सेन को सम्मानित किया।

सम्मान के तहत उन्हें प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न और 1 लाख रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई। संत ईश्वर सम्मान फाउंडेशन ऑफ इंडिया की ओर से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए कुल 16 सम्मान प्रदान किए गए। समारोह में सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण उत्थान, जनजातीय संरक्षण, महिला एवं बाल कल्याण तथा विशेष बच्चों के लिए कार्य करने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया।

पारंपरिक वनस्पति ज्ञान को पोषण, स्वास्थ्य और स्वरोजगार से जोड़ने की पहल

डॉ. तारा देवी सेन लंबे समय से हिमालयी जंगली खाद्य पौधों के संरक्षण और उनके पारंपरिक उपयोग से जुड़े ज्ञान को दस्तावेजीकृत करने के साथ-साथ इसे आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का कार्य कर रही हैं। उनका प्रयास जंगली खाद्य पौधों को केवल जंगलों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन के रूप में देखने के बजाय पोषण, स्वास्थ्य, स्वरोजगार और सतत आजीविका के संभावित माध्यम के रूप में विकसित करने पर केंद्रित है।

डॉ. सेन ने अपने कार्यों पर आधारित विशेष प्रदर्शनी भी लगाई

सम्मान समारोह के दौरान डॉ. सेन ने अपने कार्यों पर आधारित विशेष प्रदर्शनी भी लगाई। इसमें उनकी लिखी पुस्तकों, हिमालयी जंगली खाद्य पौधों के फोटोग्राफिक फ्रेम, पाइन-एक्सो/इको-क्राफ्ट तथा प्रकृति आधारित अन्य उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। उन्होंने अश्वगंधा पर तैयार जागरूकता पुस्तिकाएं भी आगंतुकों को वितरित कीं और जंगली खाद्य पौधों के पोषण, औषधीय महत्व, संरक्षण तथा आजीविका की संभावनाओं के बारे में जानकारी साझा की।

नई दिल्ली में उपराष्ट्रपति के साथ सम्मानित महिलाएं।

नई दिल्ली में उपराष्ट्रपति के साथ सम्मानित महिलाएं।

हिमालय की जैव-सांस्कृतिक विरासत को मिली पहचान

डॉ. सेन की यह उपलब्धि व्यक्तिगत सम्मान के साथ हिमालय की जैव-सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक खाद्य ज्ञान को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिलने का अवसर भी है। उनके कार्यों के माध्यम से स्थानीय वनस्पति संसाधनों के संरक्षण के साथ समुदायों के लिए सतत आजीविका के नए अवसर तलाशने पर जोर दिया जा रहा है।



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