Shekhar Gupta Column | Congress Revival Prospect & BJP Political Strategy


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2 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

हाल ही में मैंने अपने एक कॉलम में लिखा था कि लोकसभा में अल्पमत में होने के बावजूद भाजपा देश को एकदलीय व्यवस्था की ओर ले जा रही है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। यह दूसरे दल के उभार की संभावना का रास्ता भी बना सकता है, बशर्ते यह दल उन क्षेत्रीय दलों का बचा-खुचा वोट-बैंक अपने पाले में ले आए, जिन्हें भाजपा हासिल करने की कोशिश में जुटी है।

विडम्बना यह है कि भाजपा की कामयाबी कांग्रेस को उसके लिए एकमात्र अखिल भारतीय चुनौती के रूप में उभरने का अपना जज्बा मजबूत करने का मौका दे सकती है। मुझे मालूम है इस मान्यता पर काफी संदेह किया जाएगा, बल्कि कांग्रेस से हताश हो चुके लोग इसका मखौल भी उड़ा सकते हैं। लेकिन भाजपा को मालूम है कि उसके खिलाफ एकमात्र बड़ी चुनौती कांग्रेस ही है।

पार्टी के चुनावी भाषणों में सबसे ज्यादा हमला कांग्रेस और गांधी परिवार पर ही किया जाता है। यह सिलसिला उन राज्यों में भी जारी रहा है, जिनमें कांग्रेस शून्य है। मसलन, आंध्र प्रदेश में बार-बार कहा गया कि कांग्रेस ने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन का बहिष्कार किया था, जबकि 2024 में वहां कांग्रेस को मात्र 2.74 प्रतिशत वोट ही मिले थे।

ओ​डिशा में सवाल किया गया कि क्या ‘शहजादे’ 2014 वाली कहानी दोहराने जा रहे हैं? झारखंड में एक कांग्रेस मंत्री के घरेलू नौकर के घर से बरामद नकदी का हवाला देते हुए सवाल पूछे गए। बिहार में भी कांग्रेस की “तुष्टीकरण’ की राजनीति पर बार-बार हमले किए गए। बंगाल में कांग्रेस को तृणमूल का सहयोगी घोषित करते हुए कहा गया कि ये दोनों पार्टियां महिलाओं को 33% आरक्षण के रास्ते में रोड़ा अटका रही हैं। कहीं नगरपालिका का चुनाव भी हो रहा हो और कांग्रेस का वहां कोई नामो-निशान भी न हो, फिर भी आप भाजपा को कांग्रेस पर हमला करते पाएंगे।

संसद के मानसून सत्र में इस मान्यता की सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि भाजपा दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में सफल होती है या नहीं; और संसद का आकार बढ़ाने तथा चुनाव क्षेत्रों का नया परिसीमन करने के लिए संविधान संशोधन करवाने, महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाने में सफल होती है या नहीं। 240 सीटों से शुरू करके दो-तिहाई बहुमत के लिए 362 या उससे ऊपर का आंकड़ा जुटा लेना सियासी चमत्कार ही होगा।

अगले साल के शुरू में उत्तर प्रदेश और पंजाब में और अंत में गुजरात में चुनाव होने हैं। उसके अगले साल कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे। मैं केवल उन राज्यों को गिना रहा हूं, जिनके लोकसभा में 10 से ज्यादा सांसद हैं। इनमें से अधिकतर राज्यों में कांग्रेस ही भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी।

इसलिए उम्मीद यही है कि भाजपा का कांग्रेस विरोधी शोर और तेज होगा। लेकिन भाजपा 2029 और उससे आगे की भी सोच रही है। और वह किसे अपने भावी प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रही है? जिन क्षेत्रीय दलों ने उसे 240 पर सिमटा दिया था, उनमें से सपा को छोड़ अधिकतर का सफाया कर दिया गया है। डीएमके अपनी विचारधारा को बचाए हुए है, लेकिन तमिलनाडु में भाजपा की कोई ताकत नहीं है। आंध्र में टीडीपी ने ठोस गठबंधन बना लिया है। उनके प्रतिद्वंद्वी वाईएस जगन मोहन रेड्डी की पार्टी भाजपा से मुकाबला नहीं करने वाली। इंडिया खेमे के इतने सारे घटक जब घायल हो चुके हैं, तब कांग्रेस के लिए भविष्य नई चुनौती भी है और नया मौका भी। क्या वह भाजपा की एकमात्र या लगभग एकमात्र प्रतिद्वंद्वी के रूप में साहसिक छलांग लगा सकती है? कांग्रेस के 21 फीसदी वोट तो पक्के दिखते हैं। भाजपा को 2024 में करीब 37 फीसदी वोट मिले।

कांग्रेस अगर 21 फीसदी से 5 फीसदी ज्यादा वोट भी ला सके तो भाजपा के लिए खेल बिगाड़ सकती है। आप यह मानकर चल सकते हैं कि इन अतिरिक्त वोट में से ज्यादातर भाजपा से टूटकर आएंगे। कांग्रेस ने अगर 30-32 फीसदी वोट हासिल कर लिए तो भाजपा 200 सीटों के आंकड़े में सिमट जाएगी। तब उसके नेतृत्व वाले एनडीए का रूप बदल जाएगा। बेशक ये सब केवल सैद्धांतिक बातें हैं, लेकिन भाजपा को भी इनका इल्म है।

चूंकि हम सैद्धांतिक बातें कर रहे हैं, तो अकादमिक सूत्रों का हवाला देना उपयुक्त होगा। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी’ के जुलाई 2026 में प्रकाशित एडगर सार और पेलिन अयान मुसील के रिसर्च को देखें। इसका शीर्षक भारत में प्रचलित इस धारणा के उलट है कि सत्ता में बैठे दल को पराजित करने का एकमात्र रास्ता गठबंधन ही है।

रिसर्च पेपर के लेखकों का कहना है कि विद्वानों और रणनीतिकारों के बीच बनी इस सहमति भ्रामक है कि प्रबल सत्ताधारी दलों को चुनाव-पूर्व बनाए गए गठबंधन ही गद्दी से हटा सकते हैं। इसके प्रमाण हैं दो आश्चर्यजनक सत्ता परिवर्तन- एक, हंगरी में, जिसमें एक ही दल ‘टिस्जा पार्टी’ ने विक्टर ओर्बान की फिदेस्ज पार्टी को सत्ता से बेदखल कर दिया था; दूसरे, 2024 में तुर्किये में रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) की भारी जीत।

हंगरी में पीटर माग्यार ने नई पार्टी खड़ी की और ओर्बन को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा। माग्यार भी ओर्बन जितने घोर दक्षिणपंथी हैं। तुर्किये में सीएचपी ने खुद को नए रूप में ढाला और व्यापक विपक्षी मतदाताओं को अपने पक्ष में समेट लिया। यह व्यापक विपक्षी मतदाता हर लोकतंत्र में मौजूद होता है, भारत में भी है। विपक्ष इस वोट को एकजुट करने के लिए बहुदलीय गठबंधनों का गठन करता रहा है। क्या कांग्रेस इसकी कोशिश अकेले अपने बूते करने की हिम्मत कर सकती है?

हम श्रीलंका और नेपाल में देख चुके हैं कि ताकतवर दल को भी किस तरह सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। क्या कांग्रेस खुद को नए अवतार के रूप में उभार सकती है? वाम-दक्षिण वाला द्वंद्व कारगर नहीं होगा, क्योंकि जनकल्याण, वितरणवादी अर्थनीति, सार्वजनिक क्षेत्र, सब्सिडी आदि के मुद्दों पर भाजपा कांग्रेस से ज्यादा वामपंथी झुकाव प्रदर्शित करती है।

कांग्रेस को नया विचार और एजेंडा लाना पड़ेगा। कांग्रेस तमाम मसलों से कैसे निबटेगी? बदली हुई दुनिया के मद्देनजर कांग्रेस की विदेश नीति, रणनीति और अर्थनीति क्या होगी? वह कहती है कि मोदी आर्थिक वृद्धि के जो आंकड़े दे रहे हैं, वे फर्जी हैं। तो कांग्रेस भारत की आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़े को 8 फीसदी पर कैसे पहुंचाएगी?

आगामी विधानसभा चुनावों में भी सीधा मुकाबला है… अगले साल यूपी, पंजाब और गुजरात में चुनाव होने हैं। उसके अगले साल कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे। इनमें से अधिकतर राज्यों में कांग्रेस ही भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी। इसलिए भाजपा का कांग्रेस विरोधी शोर और तेज ही होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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