Headlines

Singrauli NCL Coal Mine Expansion


‘मकान गिरवाने के लिए उचित रेट संपर्क करें।’

.

इस तरह के विज्ञापन की लाइनें इन दिनों मध्य प्रदेश के सिंगरौली में मकानों की दीवारों पर लिखी हैं। कभी आबादी से गुलजार रहने वाली बस्तियां अब वीरान नजर आ रही हैं।

कई लोग खुद ही अपने मकान तोड़ रहे, तो कुछ मजदूरों के जरिए गिरवा रहे हैं। वजह है नॉर्दर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड (NCL) की जयंत कोयला खदान का विस्तार।

इसके लिए नगर निगम क्षेत्र मोरवा में सात वार्डों की 927.6 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण होना है। करीब 22 हजार मकान हटाए जाने हैं।

करीब 30 हजार परिवारों में यहां रहने वाले करीब 50 हजार लोगों के विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है। इससे यहां के लोगों में आक्रोश है।

इस बीच, दैनिक भास्कर की टीम ने वार्डों में जाकर यहां रहने वाले लोगों से बात की। पढ़िए रिपोर्ट…

कुछ दिन पहले एनसीएल खदान में ब्लास्टिंग से मकान गिरने का वीडियो सामने आया था।

कुछ दिन पहले एनसीएल खदान में ब्लास्टिंग से मकान गिरने का वीडियो सामने आया था।

एक तरफ घर टूट रहे, दूसरी तरफ लोग रहने को मजबूर

सिंगरौली नगर निगम में 45 वार्ड हैं। इनमें से इन दिनों वार्ड 3, 4, 5, 7, 8, 9 और 10 वार्ड का नजारा बदला हुआ है। मोरवा में जयंत खदान से सिर्फ 50 मीटर की दूरी पर वार्ड 10 और 9 स्थित है।

इस कारण जमीन अधिग्रहण की शुरुआत यहीं से हो रही है। अगले साल यानी मार्च 2027 तक सभी सात वार्डों की जमीन अधिग्रहित करने का लक्ष्य है।

जिन इलाकों में खदान का विस्तार होना है, वहां विस्थापन की तस्वीर साफ दिखाई देती है। कहीं घर खाली हो चुके हैं, कहीं सामान समेटा जा रहा है, तो कहीं परिवार मुआवजे और जमीन के भुगतान का इंतजार कर रहे हैं।

कई जगह मकान तोड़ने के लिए मजदूरों के संपर्क नंबर लिखे हैं। यानी लोग अपने हाथों से ही उन घरों को गिरवा रहे हैं, जिनमें वे वर्षों से रह रहे थे।

कई लोग मुआवजा लेकर घरों को छोड़कर जा चुके हैं। यहां कभी बस्ती नजर आती थी। अब सुनसान है। कुछ घरों में लोग रहते मिले। कई मकानों में ब्लास्टिंग के कारण दरारें आ गई हैं।

लोगों की आंखों में आंसू और गुस्सा दोनों हैं। रहवासियों का कहना है कि ब्लास्टिंग के दौरान घर हिलते हैं। पहले पत्थर भी उछलकर घरों तक पहुंचते थे।

50 मीटर दूर खदान, घर में दरारें

मेढोली इलाके में रामसेवक पनिका का करीब पांच डिसमिल में पक्का और कच्चा मकान है। परिवार में तीन बेटे, दो बेटियां हैं। NCL की ओर से 8 लाख 59 हजार रुपए का मुआवजा दिया गया है। घर खाली करने का निर्देश जारी किए गए हैं।

रामसेवक बताते हैं कि मेढोली के इस हिस्से में पहले करीब 100 घरों की बस्ती थी। अब यहां सिर्फ 5-6 घर बचे हैं।

घर के अलावा पेड़, कुआं और अन्य कमरों का भी मुआवजा नहीं मिला। रामसेवक के मुताबिक, वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं है, इसलिए कंपनी के अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने में भी परेशानी होती है।

उनके अनुसार, पहले ब्लास्टिंग के दौरान पत्थर घरों तक उछलकर आते थे। अब ब्लास्टिंग नीचे होने के कारण पत्थर तो नहीं आते, लेकिन पूरा घर हिलता है। कुएं को लेकर भी परिवार को चिंता है। पानी के लिए दूर तक जाना पड़ता है।

रामसेवक की पत्नी शशि देवी बताती हैं कि जमीन चली गई। ब्लास्टिंग की वजह से घर की दीवारों में दरारें आ गई हैं। ब्लास्टिंग के समय परिवार को घर से बाहर निकलना पड़ता है।

पति नौकरी की मांग लेकर जाते हैं, लेकिन उन्हें वापस भेज दिया जाता है। परिवार अब डर के बीच रह रहा है कि पता नहीं कब घर गिर जाए।

तीन तस्वीरें देखिए…

वार्ड 10 में लोगों ने अपने मकान तुड़वाना शुरू कर दिया है।

वार्ड 10 में लोगों ने अपने मकान तुड़वाना शुरू कर दिया है।

वार्ड में कुछ लोग मकान तोड़ चुके हैं, कुछ लोग घर खाली कर जा चुके हैं।

वार्ड में कुछ लोग मकान तोड़ चुके हैं, कुछ लोग घर खाली कर जा चुके हैं।

वार्ड 10 में रहवासी एरिया से खदान करीब 50 मीटर दूर है।

वार्ड 10 में रहवासी एरिया से खदान करीब 50 मीटर दूर है।

मुआवजा नहीं मिला, इसलिए घर नहीं छोड़ रहे

इसी इलाके में रहने वाले राजमान कोल का कहना है कि जमीन का भुगतान नहीं मिला है। यही वजह है कि परिवार अभी भी अपना घर छोड़कर नहीं गया है।

उनका कहना है कि खदान बेहद नजदीक आ चुकी है। जब तक जमीन का भुगतान नहीं मिलता, तब तक परिवार के सामने रहने के अलावा विकल्प नहीं है।

वार्ड 9 में रहने वाले शिवम दुबे कहते हैं कि घर छोड़ने की तकलीफ तो बहुत हो रही है, क्योंकि इसी घर में बचपन बीता है। इसी घर में रहे हैं। आसपास इलाकों में पले और बड़े हुए। अब इसे ही तोड़ना पड़ रहा है।

भविष्य में हम कहीं काम करेंगे या कुछ चीजें होंगी, तो वापस इलाका देखने को नहीं मिलेगा। यह खदान में बदल चुका होगा, बड़े-बड़े गड्ढे होंगे, पहाड़ बन चुके होंगे।

इससे तकलीफ तो हो रही है। यह बात अलग है कि मुआवजा मिल रहा है, दूसरी जगह मकान बना लेंगे, लेकिन यादें छूट रही हैं। आसपास ऐसे पड़ोसी नहीं मिलेंगे, व्यवहार नहीं मिलेगा। जिसका धंधा है, वो बहुत ज्यादा प्रभावित है।

12 टेंट में एक ही समुदाय के 37 लोग रह रहे

इसी इलाके से आगे करीब 12 तंबू और झोपड़ियां दिखाई देती हैं। यहां 37 लोग एक ही समुदाय के रह रहे हैं। जगनारायण सिंह गोंड बताते हैं कि परिवार के घर पहले इसी इलाके में थे। जमीन सरकारी थी, लेकिन परिवार कई पीढ़ियों से वहां रह रहा था। वह जगह अब खनन क्षेत्र में आ गई।

जगनारायण कहते हैं कि अब रहने के लिए पक्का ठिकाना नहीं है, इसलिए तिरपाल और टेंट लगाकर बच्चों का पालन-पोषण कर रहे हैं। आरोप है कि नौकरी और दूसरी मदद के लिए कंपनी के पास जाने पर उन्हें गेट से बाहर कर दिया जाता है।

रहवासी एरिया को छोड़कर लोग तिरपाल का घर बनाकर रहने लगे हैं।

रहवासी एरिया को छोड़कर लोग तिरपाल का घर बनाकर रहने लगे हैं।

मुआवजा मिलेगा, लेकिन बसेंगे कहां? यही बड़ा सवाल

विस्थापन में बड़ा सवाल मुआवजे का नहीं, बल्कि पुनर्वास के बाद लोगों की बसाहट का भी है। एनसीएल ने प्रभावितों को 18 लाख रुपए का मुआवजा नहीं लेने की शर्त पर मोरवा से 20 किलोमीटर दूर भल्लूगढ़ में प्लॉट देने का विकल्प भी रखा है, लेकिन लोग इसके लिए तैयार नहीं हैं।

सिंगरौली विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष वीरेंद्र गोयल का कहना है कि हैवी ब्लास्टिंग की वजह से बोरवेल धंस गए हैं। रहवासी नगर निगम की पेयजल सप्लाई के भरोसे हैं। सप्लाई बाधित होती है, तो शहर प्यासा रह जाता है। एनसीएल से बात की गई है, उन्होंने पेयजल व्यवस्था करने का आश्वासन दिया है।

उनका कहना है कि विस्थापन को लेकर कंपनी का रवैया ठीक नहीं है। कंपनी नया मोरवा बसाने के मूड में नहीं है। इनका कहना है कि प्लॉट के बदले विस्थापित को पैसा दे रहे हैं, लेकिन जो मोरवा का मूल निवासी है, वह कहां जाए? शहर का अस्तित्व खत्म ना हो जाए, लेकिन इसके लिए भी एनसीएल को पहल करनी होगी।

गोयल का कहना है कि शहर छोड़कर गांवों में क्यों बसने जाएंगे? दूसरा कारण है कि वहां एनसीएल की ब्लॉक माइंस भी है, कोयला धोने का प्लांट भी है, इससे वहां प्रदूषण ज्यादा है।

कलेक्टर बोले- कॉलोनी बनाने का रास्ता तलाश रहे

कलेक्टर गौरव बैनल ने कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। ऑफ कैमरा बताया कि प्रशासन NCL से संपर्क कर बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहा है।

हाउसिंग बोर्ड के माध्यम से कंपनी से R&R कॉलोनी बनवाकर विस्थापित परिवारों को व्यवस्थित तरीके से बसाने पर विचार किया जा रहा है।

NCL अफसर बोले- वैल्यूएशन के हिसाब से दे रहे मुआवजा

NCL के प्रवक्ता रामविजय सिंह का कहना है कि जयंत खदान का विस्तार साल 2010 में शुरू हुआ था। इसके तहत वार्ड 10 के कुछ भाग का अधिग्रहण शुरू किया गया।

विस्थापन की शुरुआत 2017 में हुई। धारा 7 के प्रकाशन के बाद पहले चरण का ड्रोन सर्वे हुआ। करीब एक साल तक डोर टू डोर सर्वे किया गया। जो संपत्तियां मौके पर पाई गईं, उनका मूल्यांकन कर मुआवजा राशि तैयार की गई। प्रभावितों को करीब 25 हजार करोड़ का मुआवजा बांटा जाएगा।

मकान सरकारी जमीन पर बना हो या निजी जमीन पर, वैल्यूएशन के हिसाब से कंपनी की ओर से भुगतान किया जा रहा है। कंपनी की R&R पॉलिसी के तहत मुआवजा बांटा जा रही है। कई लोगों को मुआवजा दिया जा चुका है।

मुआवजा वितरण के लिए नॉर्दर्न कोल फील्ड लिमिटेड ने पोर्टल डिजाइन किया है, जिसका यूजर और पासवर्ड विस्थापित परिवार के पास है। पोर्टल में परिवार की संपत्तियों की डिटेल जैसे– घर जमीन, कुआं, समर्सिबल पंप, जानवर जैसी चीजें मौजूद हैं।

इसके एवज में एनसीएल कितना मुआवजा दे रहा है, वह भी दर्ज है। अगर किसी को मुआवजे को लेकर शंका है, तो वह पोर्टल पर शिकायत कर सकता है। 7 दिन में समाधान कर दिया जाएगा।

ये खबर भी पढ़ें…

सिंगरौली में NCL ब्लास्टिंग से 2 मंजिला मकान ढहा

सिंगरौली जिले के मोरवा थाना क्षेत्र के वार्ड नंबर 7 के पंजरेह झूमरिया टोला में शुक्रवार को NCL की ब्लास्टिंग के बाद नवीन कुमार गुप्ता का करीब 4 हजार वर्गफीट में बना दो मंजिला मकान अचानक ढह गया। पढ़ें पूरी खबर…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *