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- Syed Ata Hasnain Column | Siliguri Corridor Security Threats Analysis
1 घंटे पहले
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सैयद अता हसनैन बिहार के राज्यपाल और कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
दशकों से सिलीगुड़ी कॉरिडोर के ‘चिकन नेक’ को लेकर भारत की सुरक्षा संबंधी बहस अंदेशों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन खतरों की प्रकृति भी अब बदल गई है। हाइब्रिड संघर्षों के दौर में हमारे किसी प्रतिद्वंद्वी के लिए अब इस कॉरिडोर पर कब्जा करना या उसे सीधे क्षति पहुंचाना जरूरी नहीं रह गया है। केवल व्यवधान पैदा करना ही रणनीतिक असर पैदा कर सकता है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर के सबसे संकरे हिस्से में नेपाल और बांग्लादेश के बीच की दूरी महज 20-22 किलोमीटर है। इसके उत्तर-पूर्व में भूटान है। उससे आगे उत्तर में सिक्किम, चुम्बी घाटी, डोकलाम हैं। भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर से जोड़ने वाली सड़कें, रेलवे, पाइप लाइन, दूरसंचार नेटवर्क, सैन्य रसद इसी सीमित भूगोल में आकर सिमट जाते हैं। यही वजह है कि यह कॉरिडोर इतना संवेदनशील है।
2020 के बाद रिश्तों में सुधार के बावजूद चीन अब भी हमारे लिए चुनौती बना हुआ है। 2017 में डोकलाम में हुआ टकराव इस बात को दिखा चुका है कि चुम्बी घाटी और भूटान से जुड़े घटनाक्रम भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, नक्शे इस संवेदनशीलता को वास्तविकता से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखा सकते हैं।
उस क्षेत्र में किसी भी सैन्य आक्रामकता को कठिन भूभाग, भारतीय सेना की मजबूत तैनाती और संकरी चुम्बी घाटी का सामना करना पड़ेगा। भारत ने कॉरिडोर और उसके दोनों छोरों के आसपास भी अपनी सैन्य क्षमता मजबूत की है। यह कॉरिडोर संवेदनशील जरूर है, लेकिन निश्चित रूप से असुरक्षित नहीं है।
सबसे तात्कालिक चुनौती खतरों के लगातार बढ़ते दायरे की है। किसी बड़े टकराव के दौरान रेलवे का कोई पुल निष्क्रिय हो जाना, दूरसंचार सेवाओं में बाधा आना, ईंधन की आवाजाही प्रभावित होना, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल या कई जगहों पर एक साथ की गई सुनियोजित तोड़फोड़- इनमें से किसी का भी असर तात्कालिक क्षति से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है। साइबर हमले सेवाओं को बाधित कर सकते हैं, गलत सूचनाएं फैला सकते हैं और लोगों में चिंता पैदा कर सकते हैं।
भारत के पूर्व में बदले राजनीतिक माहौल (विशेषकर बांग्लादेश में) ने एक और पहलू जोड़ दिया है, लेकिन इसे सावधानी से समझने की जरूरत है। किसी देश में राजनीतिक बदलाव या द्विपक्षीय संबंधों में गिरावट का यह मतलब नहीं होता कि पड़ोसी देश भारत का विरोधी बन गया है।
चिंता पारंपरिक सैन्य कार्रवाई की तुलना में इस संभावना को लेकर अधिक है कि शत्रुतापूर्ण ताकतें अलग-अलग स्तर पर स्थानीय सहयोग या मिलीभगत के साथ किसी देश के भूभाग, नेटवर्क या स्थानीय कमजोरियों का फायदा उठा सकती हैं।
इसलिए सीमाओं पर पाबंदी का मतलब केवल अवैध तरीके से सीमा पार करने वालों को रोकना नहीं है। नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के साथ भारत की सीमाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। वैध आवाजाही, आर्थिक कारणों से होने वाला माइग्रेशन, अवैध इमिग्रेशन और शत्रुतापूर्ण घुसपैठ- इन सभी को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में लोगों की बेरोकटोक आवाजाही तब चिंता का विषय बन जाती है, जब जाली दस्तावेजों, आपराधिक नेटवर्कों या शत्रुतापूर्ण खुफिया एजेंसियों द्वारा उसका फायदा उठाया जाए।
यह बिहार के लिए भी मायने रखता है। किशनगंज, अररिया और पूर्णिया इस कॉरिडोर से सटे तत्काल प्रभाव वाले इलाके और व्यापक आवागमन क्षेत्र का हिस्सा हैं। इसलिए इन जिलों में पुलिस व्यवस्था, खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय, अवैध नेटवर्कों पर निगरानी और विकास से जुड़े कदमों का असर बिहार की सीमाओं से कहीं आगे तक पड़ता है। इसका यही मतलब है कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर की रणनीतिक गहराई उससे सटे बिहार के इलाकों तक फैली हुई है।
नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी इस चुनौती में एक और आयाम जोड़ती है। तस्करी के नेटवर्क परिवहन के साधन, सुरक्षित ठिकाने, वित्तीय चैनल, जाली दस्तावेज और सीमा निगरानी से जुड़ी जानकारी जुटा लेते हैं। सामान्य परिस्थितियों में ये कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं हैं।
लेकिन संकट की स्थिति में यही ढांचा हथियारों, विस्फोटकों, शत्रुतापूर्ण तत्वों या खुफिया सामग्री को एक से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सैन्य प्रकृति के खतरे अकसर गैर-सैन्य नेटवर्कों के सहारे आगे बढ़ते हैं। यही वजह है कि ऐसे इलाके में पुलिस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। खुफिया सूचनाओं को एक-दूसरे से जोड़ना भी इतना ही जरूरी है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर को सुरक्षित रखने का मतलब केवल इतना नहीं है कि दुश्मन को ‘चिकन नेक’ तक पहुंचने से रोका जाए। असली कसौटी है पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़े रखना। कॉरिडोर तभी सुरक्षित होगा, जब उसका भूगोल उसकी कमजोरी में न बदला जा सके। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

