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Yash Chopra Filmmaking Lessons | Bollywood Director Memories & Legacy


रूमी जाफरी50 मिनट पहले

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अपने बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा के साथ यश चोपड़ा (बाएं)। - Dainik Bhaskar

अपने बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा के साथ यश चोपड़ा (बाएं)।

बी. आर. चोपड़ा पर लिखे मेरे कॉलम को पढ़ने के बाद कई लोगों ने यश चोपड़ा पर भी लिखने की सलाह दी थी। तो उसी सलाह पर आज बात यश चोपड़ा जी की।

बी. आर. चोपड़ा कहां के रहने वाले थे, इसके बारे में मैंने बताया था। अब मैं शुरुआत वहां से करता हूं जब वे मुंबई आए। साल 1951 में घरवालों ने तय किया कि यश जी को इंजीनियर बनाने के लिए लंदन भेजना चाहिए। इसलिए एडमिशन की तैयारी वगैरह के लिए उन्हें बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा के पास बंबई भेज दिया गया। मगर यश जी ने बताया था, मुझे इंजीनियर बनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। बड़े भाई साहब को देखता तो मेरे मन में भी आता था कि मैं भी उनकी तरह डायरेक्टर बनूं। मैंने अपने दिल की बात बड़े भाई साहब से कही तो वो बोले, ‘डायरेक्टर बनोगे? तुम्हें डायरेक्शन के बारे में कुछ पता भी है? कुछ आता भी है?’

बकौल यश जी, मैंने कहा, ‘माफी चाहता हूं भाई साहब, आपको भी नहीं आता था। मैं भी आपका ही भाई हूं। आपने कर लिया, मैं भी कर लूंगा। आपके साथ रहकर सीख जाऊंगा।’ उन्होंने कहा, ‘नहीं, तुम मेरे भाई हो। मेरे पास रहकर नहीं सीख सकते। मैं तुम्हें मेहबूब साहब या राज कपूर साहब के पास असिस्टेंट लगा देता हूं। वहां तुम अच्छे से सीख पाओगे।’ मैंने कहा, ‘नहीं, मैं तो आपसे ही सीखना चाहता हूं। आपके साथ ही काम करना चाहता हूं।’ तो उन्होंने कहा, ‘ठीक है। अभी आई. एस. जोहर साहब की शूटिंग चल रही है फिल्मीस्तान में। कुछ दिन जाकर शूटिंग देखो, उनके साथ काम करो। फिर डिसाइड करेंगे।’

जैसा कि मैंने अपने एक कॉलम में बताया था कि आई. एस. जोहर साहब वही हैं, जिन्होंने बी. आर. चोपड़ा साहब को अपनी पहली कहानी दी थी और जिस पर उन्होंने फिल्म बनाई थी। वे बी. आर. चोपड़ा के दोस्त और बहुत काबिल आदमी थे। उन दिनों फिल्मीस्तान में उनकी फिल्म ‘नास्तिक’ की शूटिंग चल रही थी।

तो यश जी ट्रेन पकड़कर फिल्मीस्तान पहुंच गए। वहां जोहर साहब ने उन्हें सेट पर बड़े प्यार से बिठाया। यश जी चुपचाप शूटिंग देखते रहे। तभी एक साहब आए। उनके आते ही लगा कि वे कोई बहुत बड़ी शख्सियत हैं। उन्होंने आई. एस. जोहर से पूछा, ‘कितनी देर में खत्म हो जाएगा सीन?’ जोहर साहब बोले, ‘ये कल शाम तक खत्म होगा। एक दिन और लगेगा।’ उन्होंने कहा, ‘नहीं, आज ही खत्म करो।’

बकौल यश जी, मैंने पास खड़े एक लड़के से पूछा, ‘ये कौन साहब हैं?’ उसने बताया कि ये प्रोड्यूसर एस. मुखर्जी हैं। मुखर्जी साहब चले गए। जोहर साहब ने उसी वक्त सबको बुलाया और कहा, ‘जाओ, एक्टर्स को सीन याद कराओ।’ फिर कैमरामैन से कहा, ‘बड़े शॉट लगाओ, ट्रॉली लगाओ, ताकि ये सीन दो घंटे में खत्म हो पाए।’ यश जी के मुताबिक, ‘ये देखकर मैं थोड़ा टेंशन में आ गया। मैं सीधे बड़े भाई साहब के दोस्त मनमोहन कृष्ण के पास गया। उनसे कहा, ‘आप भाई साहब के इतने करीबी दोस्त हैं। उनसे बोलिए कि मुझे असिस्टेंट रख लें। मैं उनके साथ काम करना चाहता हूं, उनसे सीखना चाहता हूं। क्योंकि मैं उनके साथ जो सीखूंगा, वो कहीं और नहीं सीख सकता।’ उस जमाने में बड़े भाई का इतना अदब हुआ करता था कि उनसे सीधे बात करने की हिम्मत नहीं होती थी।

मनमोहन कृष्ण ने भाई साहब से बात की। उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा, ‘जोहर के यहां क्या प्रॉब्लम है?’ मैंने कहा, ‘कल का काम आज ही खत्म कर दिया। वहां मैं क्या सीखूंगा? मुझे तो आप अपने साथ ही रख लीजिए।’ और भाई साहब ने रख लिया। उस वक्त मैं 19-20 साल का था। मगर ऊपर वाले ने मुझे यह समझ दी थी कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। मेरे अंदर अच्छा काम करने की ख्वाहिश थी। मुझे लगता था कि मैं ऐसा काम करूं, जिसे लोग हमेशा याद रखें।

इसी बात पर अल्लामा इक़बाल का एक शेर याद आ रहा है :

मंज़िल से आगे बढ़कर मंज़िल तलाश कर

मिल जाए तुझको दरिया तो समंदर तलाश कर

यश जी बताते थे, हमारे घर में पिता के निधन के बाद कोई ऐसा नहीं था, जो मुझे हुकुम दे सके। सभी भाई मुझे बहुत चाहते थे, लेकिन इंजीनियरिंग की जगह फिल्म लाइन चुनने से खुश नहीं थे, जबकि सभी फिल्म इंडस्ट्री में थे। एक भाई डिस्ट्रीब्यूटर थे, एक भाई कैमरामैन थे और बड़े भाई साहब डायरेक्टर थे। बड़े भाई साहब ने मेरे जुनून को समझा और मुझे अपने साथ रख लिया। असिस्टेंट की जगह खाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने मुझे अप्रेंटिस रख लिया, यानी बिना तनख्वाह का एक सहायक। अलग-अलग असिस्टेंट का अलग-अलग काम बंटा हुआ होता है। लेकिन चूंकि मैं असिस्टेंट नहीं था, इसलिए मेरे हिस्से में कोई तय काम नहीं था। जिसका जो जी चाहता, मुझे ऑर्डर दे देता, जाओ कपड़े लाओ, जाओ कपड़े पहुंचा दो, जाओ जूते दे आओ, जाओ सीन दे आओ, सेट पर ये चीज उठाकर वहां रख दो, उधर सफाई कर दो। मगर मैं चुपचाप सीखता रहा।

यश जी ने सीखने में कोई कमी नहीं छोड़ी। और देखिए, उन्होंने ऐसा सीखा कि उनकी फिल्मों से पूरी फिल्म इंडस्ट्री और आने वाली कई जनरेशन के फिल्ममेकर सीखते रहेंगे। बाकी बातें अगले कॉलम में। आज यश जी की याद में उनकी किसी भी फिल्म का अपना पसंदीदा गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए।



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