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भारतीय टेस्ट और वनडे क्रिकेट टीम के कप्तान शुभमन गिल वेस्टइंडीज के खिलाफ दोहरा शतक लगाकर चर्चा में हैं। उनके उपलब्धियों से भरे सफर की खास बातें, उन्हीं की जुबानी… मेरी जिंदगी में क्रिकेट हमेशा से था। मुझे याद नहीं कि कोई ऐसा खास पल आया हो, जब मैंने बैठकर फैसला किया हो कि मुझे क्रिकेटर ही बनना है। बचपन से ही मुझे पता था कि क्रिकेट मेरी जिंदगी होने वाला है। मेरे पास दूसरा कोई विकल्प था ही नहीं। मुझे बस बल्ला पकड़ना, मैदान पर जाना और खेलना पसंद था। परिवार के साथ बल्लेबाजी करना मेरी सबसे पुरानी यादों में से एक है। तभी से क्रिकेट मेरे लिए सिर्फ एक खेल नहीं, जिंदगी का हिस्सा बन गया था।
जब आठ साल का था, तब अंडर-16 के खिलाड़ियों के साथ खेलता था। मुझसे बड़े खिलाड़ियों के बीच बल्लेबाजी करता था। जब 16 से 18 साल का हुआ, तब मेरे साथ पहले खेल चुके कई खिलाड़ी 27-28 साल के हो चुके थे। वे राज्य की टीम तक नहीं पहुंचे थे और क्रिकेट से दूर हो गए थे। कभी-कभी मेरे मन में भी ख्याल आता था कि मैं पढ़ाई नहीं कर रहा हूं, मेरा पूरा ध्यान क्रिकेट पर है। अगर यहां सफल नहीं हुआ, तो क्या होगा? मैं खुद को समझाता था कि कोई बात नहीं, खेती तो कर ही सकता हूं। मेरे पिता के पास जमीन थी। फिर मैं दोबारा क्रिकेट पर ध्यान लगाने लगता था।
मेरे क्रिकेट को गंभीरता से आगे बढ़ाने में घावरी सर का बहुत बड़ा योगदान रहा। उस समय मैं बहुत छोटा था और मेरे सामने करीब 20 साल के गेंदबाज होते थे। घावरी सर ने मुझे कभी जल्दबाजी में नहीं डाला। वे धैर्य से समझाते थे कि अलग-अलग गेंदबाजों के सामने कैसे खेलना है, खेल को कैसे समझना है और मैदान पर सही फैसले कैसे लेने हैं। मुझे याद है, एक बार उनसे लंबी बातचीत हुई थी। मैंने उनसे कहा था कि मुझे मैच खेलने का मौका न भी मिले, सिर्फ अभ्यास करने का मौका मिले, तब भी मैं खुश ही रहूंगा। मुझे अभ्यास करना बहुत पसंद था। उस बातचीत ने मेरे भीतर कुछ बदल दिया। मुझे महसूस हुआ कि क्रिकेट से प्यार करने का मतलब सिर्फ मैच खेलना या रन बनाना नहीं है। असली खुशी उस मेहनत में भी है, जो आप हर दिन मैदान पर जाकर करते हैं।
समय के साथ मैंने यह भी सीखा कि कामयाबी के साथ आने वाली उम्मीदों को संभालना कितना जरूरी है। कई बार आप अच्छा प्रदर्शन करते हैं, फिर भी मन में संतोष नहीं होता। आप पिछली कुछ पारियों के बारे में सोचते रहते हैं और अगली पारियों में उनसे बेहतर करने का दबाव लेने लगते हैं। धीरे-धीरे ऐसा होने लगता है कि एक अच्छी पारी की खुशी भी महसूस नहीं होती। मुझे समझ आया कि अगर मेरी खुशी सिर्फ रन बनाने पर निर्भर रहेगी, तो मैं कभी सुकून से नहीं जी पाऊंगा।
क्रिकेट एक ऐसा खेल है, जिसमें हर बार शतक या अर्धशतक नहीं बनाया जा सकता। इसलिए मैंने खुद को समझाना शुरू किया कि मेरी खुशी सिर्फ नतीजों से तय नहीं होनी चाहिए। मुझे अपने खेल से प्यार करना सीखना है, अपनी मेहनत पर भरोसा रखना है और असफलता के बाद भी आगे बढ़ते रहना है। जिंदगी में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं, लेकिन हमें अपनी पहचान सिर्फ कामयाबी से नहीं बनानी चाहिए। सफलता यह भी है कि आप अपने काम से हमेशा प्यार करते रहें, मेहनत करने की खुशी न खोएं और मुश्किल वक्त में भी खुद पर भरोसा बनाए रखें। जिंदगी सिर्फ उन दिनों का नाम नहीं है, जब आप जीतते हैं। जिंदगी उन दिनों में आगे बढ़ने का नाम भी है, जब आप बहुत कुछ सीख रहे होते हैं।
शरीर को अपनी की हुई मेहनत याद रखने देना चाहिए
मैं चाहता हूं कि मेरा शरीर मेरे दिमाग को नियंत्रित करे, न कि मेरा दिमाग हर वक्त मुझे शक में डाले। मैंने सालों तक अभ्यास किया है। मैं चाहता हूं कि मुश्किल समय में वही अभ्यास मेरे काम आए। शरीर को अपनी की हुई मेहनत याद रखने देना चाहिए। अपने अनुभव और अभ्यास पर भरोसा करना आपको सीखना होता है।
(तमाम इंटरव्यू में… )
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इंस्पायरिंग:सफलता जरूरी नहीं, मेहनत में है असली खुशी – शुभमन गिल
