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एन. रघुरामन का कॉलम:इतिहास बोझ नहीं, बल्कि एक विरासत है




जब भी मैं मेहमानों को मुंबई के अंधेरी-कुर्ला रोड लेकर जाता हूं तो बताता हूं कि 1940 से 1980 के दशक तक यह इलाका बॉम्बे (अब मुंबई) के सबसे व्यस्त फिल्म निर्माण केंद्रों में से एक हुआ करता था। मोहन स्टूडियो में मुगल-ए-आजम, देवदास और बंदिनी जैसी महान फिल्में शूट हुई थीं। मुगल-ए-आजम के लिए के. आसिफ ने यहां लाहौर किले की तर्ज पर आइकनिक शीश महल का सेट बनवाया था। करीब 150 फीट × 80 फीट × 35 फीट का यह सेट बनाने में दो साल लगे, जिसमें फिरोजाबाद के कारीगरों द्वारा तैयार बेल्जियम ग्लास के हजारों टुकड़े लगाए गए थे। 1950 के दशक के आखिर में बने इस सेट पर 15 लाख रुपए से अधिक खर्च हुए, जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी। लेकिन जब मैं उन्हें यह विडंबना बताता हूं कि उस स्टूडियो में महिलाओं के लिए ढंग का वॉशरूम तक नहीं था, तो वे मेरी ओर संदेह से देखते हुए सोचते हैं कि ऐसा कैसे संभव है। वे हमेशा पूछते हैं कि जो स्टूडियो मैनेजमेंट सेट पर इतना खर्च कर सकता था, वह उन अभिनेत्रियों के लिए टॉयलेट क्यों नहीं बनवा सका, जिनके कारण थिएटरों में भीड़ उमड़ती थी। फिर मैं उनसे कहता हूं कि अभिनेत्री वहीदा रहमान के बारे में सर्च करो, जो बताती थीं कि वे शूटिंग के दौरान पानी पीने से बचती थीं। आशा पारेख ने भी एक बार कहा कि वह भाग्यशाली रहीं, जो लंबे शूटिंग शेड्यूल के दौरान लगातार वॉशरूम जाने को टालती थीं, लेकिन उन्हें कभी किडनी की समस्या नहीं हुई। रेणुका शहाणे ने भी कहा था कि 1990 के दशक में भी फिल्म सेटों पर कई महिलाएं पानी पीने से बचती थीं, क्योंकि वहां वॉशरूम गंदे और इस्तेमाल लायक नहीं होते थे। सिनेमाई भव्यता और अभिनेत्रियों की इन कठिनाइयों के विरोधाभास को सुनने के बाद मेहमान पूछते हैं कि ‘क्या हम वह स्टूडियो देख सकते हैं?’ दुर्भाग्य से मैं उन्हें उस दौर की एक ईंट तक नहीं दिखा सकता। स्टूडियो गायब हो चुका है और उसकी जगह अब रिहायशी इमारतें हैं। मैं बात को यह कह कर खत्म करता हूं कि ‘जब कोई स्टूडियो खत्म होता है तो उसके साथ भारतीय सिनेमा का एक पूरा चैप्टर समाप्त हो जाता है और इतिहास का एक हिस्सा भी भुला दिया जाता है।’ मंगलवार को मेरे साथ वेस्ट शिकागो से आए मेहमान थे। उन्होंने तुरंत कहा, ‘भगवान का शुक्र है कि इलिनॉय में लंबे समय से उपेक्षित पड़े 1913 में बने एक कमरे वाले स्कूल को आखिरकार सुधारा जा रहा है। अब वहां जिले के इंस्ट्रक्शनल कोच बैठेंगे, जो टीचिंग और लर्निंग में स्थानीय स्कूलों की मदद करेंगे।’ यह स्कूल अब एक जीवंत एजुकेशनल रिसोर्स बनेगा, जिससे युवा शिक्षक समझ सकेंगे कि कभी अमेरिका में आम रहे एक कमरे वाले स्कूल वास्तव में कैसे दिखते थे। एक एकड़ से भी कम जमीन पर फैली यह इमारत अब महज इतिहास की किताबों में दर्ज होकर नहीं रह जाएगी, बल्कि भावी शिक्षकों को शिक्षण के विकास के बारे में बताती रहेगी। हाल ही में दिल्ली यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात साउथ एक्सटेंशन के एक स्थानीय इतिहासकार से हुई। उन्होंने एक रोचक किस्सा सुनाया कि उनके इलाके का यह नाम कैसे पड़ा। उनके अनुसार इस कॉलोनी का नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि इसे कनॉट प्लेस के आसपास ब्रिटिशों द्वारा बसाई गई नई दिल्ली के दक्षिणी एक्सटेंशन के तौर पर विकसित किया गया था। हालांकि इसका कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है, लेकिन कई लोगों का मानना है कि इसका नाम उसी भौगोलिक क्षेत्र से आया है, जहां कभी ‘साउथ-एंड रोड’ नामक सड़क हुआ करती थी। चूंकि बाद में उस सड़क का नाम पीलू मोदी रोड कर दिया गया तो इससे एक पेचीदा ऐतिहासिक डिस्कनेक्ट पैदा हो गया। आने वाली पीढ़ियां सोच सकती हैं कि क्यों किसी इलाके का नाम ‘साउथ एक्सटेंशन’ रखा गया होगा, जबकि जहां से इसका विस्तार शुरू हुआ, उसके आसपास मिलते-जुलते नाम की कोई जगह है ही नहीं। ऐसे में इस नाम के पीछे का भौगोलिक तर्क कम स्पष्ट हो जाता है और पुराने नक्शों, ऐतिहासिक रिकॉर्ड या इस विषय पर किताबें लिखने वाले इतिहासकारों के बिना दिल्ली के शहरी विकास को समझ पाना मुश्किल हो जाता है। जब पुरानी इमारतें तोड़ी जाती हैं या ऐतिहासिक नाम गायब हो जाते हैं तो हम केवल ईंटें, सड़कें या लैंडमार्क्स ही नहीं खोते, बल्कि हमारे शहरों, संस्थाओं और पहचान के विकास को समझाने वाली कहानियों को भी मिटा देते हैं। फंडा यह है कि इतिहास कोई बोझ नहीं है, जिसे ढोना पड़े। यह एक विरासत है, जिसे भावी पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखना चाहिए।



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