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एन. रघुरामन का कॉलम:चीजों को फेंकने से पहले खुद से पूछें कि वे क्या कहानी संजोए हैं




जुलाई 1969 में जब इंसान ने पहली बार चांद पर कदम रखा तो पूरी दुनिया ने हैरत के साथ यह पल देखा था। नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन चांद की सतह पर उतरे। लेकिन इतिहास जहां इस मूनवॉक को सेलिब्रेट करता है, वहीं बहुत कम लोग इसके बाद आए जीवन-मरण के एक संकट के बारे में जानते हैं। जब दोनों अंतरिक्ष यात्री लूनर मॉड्यूल में लौटे और कुछ देर सोने की सोच रहे थे तो एल्ड्रिन ने कुछ ऐसा देखा, जिसने दोनों की नींद उड़ा दी। केबिन के फर्श पर एक छोटा-सा काला सर्किट-ब्रेकर स्विच पड़ा था। दोनों में से किसी को नहीं पता था कि वह किसकी गलती से टूटा। वही छोटा-सा स्विच इंजन को नियंत्रित करता था, जो लूनर मॉड्यूल को चांद से उड़ा सकता था। उसके बिना पृथ्वी पर नहीं लौट सकते थे। इसमें समय गंवाने के बजाय कि गलती किससे हुई, उन्होंने तुरंत ह्यूस्टन स्थित मिशन कंट्रोल को सूचना दी और मदद मांगी। इस बेहद तनाव भरी रात में सोना नामुमकिन था। दोनों लगातार समाधान ढूंढ रहे थे। अगली सुबह मिशन कंट्रोल ने दो-टूक कह दिया कि वे मदद नहीं कर सकते। तब एल्ड्रिन ने लूनर मॉड्यूल में ऐसी किसी चीज की तलाश शुरू की, जो टूटे सर्किट-ब्रेकर के पीछे लगे पॉइंटर की सही जगह पर लग सके, और इलेक्ट्रिक करंट पास हो सके। चूंकि यह एक इलेक्ट्रिक सर्किट था, इसलिए उन्होंने उंगली या धातु की नोक वाली कोई चीज इस्तेमाल करने की जुर्रत नहीं की। तभी एल्ड्रिन को एक फेल्ट-टिप पेन याद आया, जिसे उन्होंने अपने ‘पर्सनल प्रेफरेंस किट’ में रखा था। हर अंतरिक्ष यात्री निजी वस्तुओं का यह छोटा-सा कलेक्शन ले जा सकता था। उन्होंने बहुत सावधानी से पेन की प्लास्टिक की नोक को उस सर्किट-ब्रेकर के टूटे स्विच के पीछे पॉइंटर पर दबाया। बाद में अपनी ऑटोबायोग्राफी में एल्ड्रिन ने लिखा, ‘मैंने बेहद सावधानी से पेन को इंजन-आर्म सर्किट-ब्रेकर पर दबाया। धीरे-धीरे हाथ का दबाव कम किया और पेन की नोक हटाई। आखिरकार पेन ने काम कर दिया।’ सर्किट-ब्रेकर अपनी जगह पर रुक गया था। इंजन चालू हो गया। अपोलो-11 उड़ान भर कर अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित पृथ्वी पर ले आया। मैं आज 1969 की इस घटना को क्यों याद कर रहा हूं? क्योंकि इसी सप्ताह न्यूयॉर्क में उस पेन की नीलामी 8.50 लाख डॉलर यानी 8.18 करोड़ रुपए से अधिक कीमत पर हुई। वह पेन उसकी स्याही के कारण कीमती नहीं था। वह इसलिए अनमोल बन गया क्योंकि एक बेहद महत्वपूर्ण क्षण में उसने वह कर दिखाया, जिसकी उससे उम्मीद नहीं थी। इस सप्ताह जब मैं अपना पुराना सूटकेस साफ कर रहा था तो मुझे यह कहानी याद आई। फीके पड़ चुके कागजों और भूली-बिसरी चीजों के नीचे दर्जनों साधारण वस्तुएं मिलीं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी असाधारण यादें थीं। उनमें से कोई भी नीलामी में बड़ी कीमत नहीं पा सकती, लेकिन हर चीज मुझे किसी व्यक्ति, संघर्ष, सेलिब्रेशन या जीवन के टर्निंग पॉइंट की याद दिला रही थी। मुझे महसूस हुआ कि हर परिवार की अपनी एक ‘फेल्ट-टिप पेन’ स्टोरी होती है। वह ग्रैंडफादर की पुरानी छड़ी हो सकती है, जिसकी मदद से उन्होंने गिरती सेहत के बावजूद रोजमर्रा की चहलकदमी जारी रखी। परिवार के पहले इंजीनियर की नोटबुक हो सकती है। सिलाई मशीन हो सकती है, जिसकी सहायता से तीन पीढ़ियां पढ़ पाईं। जंग लगा टूलबॉक्स हो सकता है, जिसने किसी की आजीविका बनाई। या कोई प्रेशर कुकर, जिसने तंगी के वर्षों में परिवार का पेट भरा। इन चीजों की बाजार-कीमत भले ही बहुत कम हो, लेकिन भावनात्मक मूल्य अनमोल होता है। ये दृढ़ता, त्याग, सूझबूझ और उम्मीद की मौन गवाह होती हैं। हमारे बच्चे शायद हमारे घर, निवेश और ज्वेलरी विरासत में पाएंगे, लेकिन परिवार की पहचान बनाने वाली चीजें अकसर यही साधारण वस्तुएं होती हैं। इनकी असली कीमत उनकी निर्माण सामग्री से नहीं, बल्कि उन कहानियों से होती है जिन्हें वे सहेजकर रखती हैं। ये साधारण-सी यादगार चीजें भावी पीढ़ियों को याद दिला सकती हैं कि सामान्य टूल्स, असाधारण समझ और हार न मानने के जज्बे से भी बड़ी चुनौतियों पर जीत हासिल की जा सकती है। फंडा यह है कि डी-क्लटरिंग के नाम पर साधारण चीजों को फेंकने से पहले ठहरकर खुद से पूछें कि ‘यह चीज कौन-सी कहानी संजोए है?’ हो सकता है कि आपके हाथ में कोई ऐसी पारिवारिक धरोहर हो, जिसकी असाधारण कीमत उसका बाजार मूल्य नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली प्रेरणा हो।



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