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एमपी के पूर्व AIG मिश्रा को रेप केस में उम्रकैद:पीड़िता की बेटी से अश्लील फोटो खिंचवाई, कोर्ट ने कहा- हैसियत का गलत इस्तेमाल किया




मध्यप्रदेश पुलिस के पूर्व एआईजी अनिल मिश्रा को जयपुर की विशेष अदालत ने एक महिला से बार-बार दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराते हुए जीवनपर्यंत कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने उन पर 2 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। जयपुर कोर्ट के विशिष्ट न्यायाधीश कौशल सिंह ने अपने फैसले में कहा कि एमपी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी रहते हुए आरोपी ने अपने पद और हैसियत का दुरुपयोग किया। ऐसे व्यक्ति के प्रति नरमी नहीं बरती जा सकती। दैनिक भास्कर ने पीड़ित महिला से बातचीत की। एफआईआर से लेकर जयपुर कोर्ट के फैसले तक की स्टडी की। इसके बाद जो कहानी सामने आई, वह सिहरन पैदा करने वाली है। अब सिलसिलेवार समझिए पूरा मामला… महिला ने बताया कि 2012 में उसके पति एक मामले में जेल गए थे। पति के कहने पर ही वह तत्कालीन एआईजी अनिल मिश्रा से मिलने पहुंची। उसने पति के केस में मदद का भरोसा देकर उसकी जिंदगी नरक बना दी। महिला ने कहा- मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती कि एक दशक तक मैं कैसे-कैसे तिल-तिल कर मरती रही हूं। कोर्ट के फैसले से मुझे फिर से जिंदगी की उम्मीद बंधी है। पुलिस ऑफिसर्स मेस में पहली बार रेप किया पीड़िता ने 11 जुलाई 2014 को जयपुर के महिला थाना दक्षिण में शिकायत दर्ज कराई। उसने बताया कि उसके पति के खिलाफ कई मामले चल रहे थे। पति ने कहा कि एआईजी अनिल मिश्रा उनकी मदद करेंगे। वह अपने बड़े भाई के साथ मार्च 2012 के पहले सप्ताह में भोपाल पहुंची। मिश्रा ने उसके पति के मामलों में मदद करने का भरोसा दिया। 4 मार्च को वह राजस्थान लौट आई।
इसके बाद मिश्रा के लगातार फोन और मैसेज आने लगे। उसके पति ने ही उसे मिश्रा का नंबर दिया था। कुछ दिन बाद मिश्रा ने कहा कि उसने वकील कर दिया है और उसे भोपाल आना होगा। वह 6 मार्च को दोबारा भोपाल पहुंची। जिस होटल में वह ठहरी थी, वहीं उसकी मुलाकात मिश्रा द्वारा बताए गए वकील से हुई। मिश्रा ने उससे होटल छोड़ने को कहा और बताया कि वहां रुकना सुरक्षित नहीं है। इसके बाद उसे पुलिस ऑफिसर्स मेस में ठहराया गया। मिश्रा ने कहा कि वह जोधपुर में है।
पीड़िता के अनुसार, उसी रात करीब डेढ़ बजे कमरे का दरवाजा खटखटाया गया। वह घबरा गई। तभी फोन आया कि “मैं अनिल मिश्रा हूं।” इसके बाद कई बार दुष्कर्म करता रहा महिला ने बताया कि पुलिस ऑफिसर्स मेस की घटना के बाद मिश्रा तो सो गया, लेकिन वह पूरी रात भगवान की तस्वीर के सामने बैठकर रोती रही। अगले दिन होली थी। इसके बाद भी पति की मदद का भरोसा देकर उसने कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता के अनुसार, 17 अक्टूबर 2012 को जयपुर पुलिस मेस में, अक्टूबर 2013 में एम्स अस्पताल के सामने स्थित एक होटल में और नवंबर 2013 में अन्य स्थानों पर भी उसके साथ ऐसी घटनाएं हुईं। कोर्ट में कहा- कई शहरों में ले जाकर जबरदस्ती की फैसले के अनुसार, पीड़िता ने अदालत में कहा कि आरोपी उसे भोपाल, जयपुर, दिल्ली, इंदौर, मुंबई और महाबलेश्वर सहित कई स्थानों पर ले गया, जहां उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि पीड़िता ने अपने बयानों में अलग-अलग तारीखों और स्थानों का उल्लेख किया था। होटल रिकॉर्ड से भी जोड़ी गई कड़ियां अभियोजन ने अलग-अलग होटलों में ठहरने से जुड़े रिकॉर्ड अदालत में पेश किए। फैसले में जयपुर के एक होटल में 17 से 20 अक्टूबर 2012 के बीच पीड़िता और आरोपी के ठहरने से संबंधित रजिस्टर और बिल का उल्लेख है। इसी तरह अन्य स्थानों के होटल रिकॉर्ड भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए। अदालत ने इन दस्तावेजों के साथ गवाहों के बयानों का भी परीक्षण किया। बेटी की अश्लील फोटो दिखाकर डराने का आरोप पीड़िता ने अदालत में कहा कि आरोपी ने उसके परिवार और बच्चों को लेकर भी उसे डराया। फैसले में दर्ज उसके बयान के अनुसार, आरोपी ने उसकी बेटी की अश्लील फोटो दिखाई और कहा कि अगर उसने बात नहीं मानी तो उसके परिवार को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। ये फोटो भी उसने धमकाकर मेरी बेटी से ही खिंचवाया था। मेरी बेटी काफी डर चुकी थी। उसने हिम्मत करके परिवार को आपबीती बताई। आरोपी पुलिस अधिकारी था, जांच पर भी उठे सवाल अभियोजन ने मामले में कई पुलिस अधिकारियों को गवाह बनाया। फैसले में आरोपी के पुलिस विभाग में विभिन्न पदों पर रहने और एआईजी स्तर के अधिकारी के रूप में कार्य करने से जुड़े दस्तावेजों का भी उल्लेख है। पीड़िता का आरोप था कि आरोपी ने अपने पुलिस पद और प्रभाव का इस्तेमाल उसके पति से जुड़े मामलों और उसके खिलाफ चल रहे मुकदमों में किया। एफआईआर दर्ज होने के पांच साल बाद, 2019 में अनिल मिश्रा की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने उसे बर्खास्त कर दिया। बचाव पक्ष ने कहा- बयानों और दस्तावेजों में विरोधाभास आरोपी की ओर से बचाव में पीड़िता के बयानों, होटल रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेजों और अलग-अलग घटनाओं की तारीखों को लेकर सवाल उठाए गए। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन के साक्ष्यों में विरोधाभास हैं, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने कहा कि ऐसे व्यक्ति के प्रति नरमी नहीं बरती जा सकती। आरोपी पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी था और लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उसी पर थी। उसने अपने पद और हैसियत का दुरुपयोग किया। अदालत ने कहा कि यह फैसला एक उदाहरण होना चाहिए। फैसले पर पीड़िता ने कहा- “मुझे और मेरे पूरे परिवार को उस इंसान ने खून के आंसू रुलाए हैं। उसे उम्रकैद की सजा भी कम है। वह इंसान के रूप में राक्षस है।”



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