Headlines

'कनपट्टी पर बंदूक रख आंख बांधे, एनकाउंटर की धमकी दी':सबा से बोली पुलिस- कहां से ली जिहाद की ट्रेनिंग, जेल में बंद छात्रों की आपबीती




‘मेरे नाम, पहचान के चलते पुलिसवालों ने मुझसे अलग बर्ताव किया। पुलिस ने पूछा- फंडिंग कहां से होती है। जिहाद की ट्रेनिंग कहां से ली। बाकी लोग तो आंदोलन करते हैं, तुम तो लोगों का सिर काटती होगी।’ पटना यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट सबा आफरीन 24 जुलाई (जब पुलिस ने हिरासत में लिया) की घटना एक सांस में सुना डालती हैं। जेल में बीते 6 दिन को याद करते हुए कहती हैं, ‘मुझे महिला वार्ड से बाहर नहीं निकलने दिया गया। कहा गया कि लड़की हो बाहर जाओगी, कोई कुछ कर देगा तो बचा नहीं पाएंगे। यहां इतने गार्ड नहीं कि बाहर महिलाओं को सुरक्षा दे सकें।’ सबा आफरीन पटना के बेऊर जेल में बंद थी। गुरुवार की शाम उन्हें और उनके साथियों को छोड़ा गया। रिहा हुए आंदोलनकारी छात्रों ने बताया कि उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया। पुलिस वालों ने गालियां दी, करियर खत्म करने की धमकी दी। जेल से बाहर आकर आंदोलनकारी छात्रों ने क्या कहा, पढ़िए रिपोर्ट… सबा आफरीन ने कहा कि हम छात्रों के हक के लिए आंदोलन की तैयारी के लिए जा रहे थे। अचानक सादे लिबास में पुलिस ने रोका और अपनी गाड़ी में बैठा लिया। मुझे कहा गया कि जो छात्र आंदोलन करते हैं, उन्हें अज्ञात बताकर एनकाउंटर कर देनी चाहिए। बेऊर जेल में महिलाओं की सुरक्षा नहीं सबा बोलीं, ‘पुलिस ने करीब 3 घंटे मुझे घुमाया। शाहपुर थाने में रखा। कहा गया कि तीन-चार दिन डिटेन रखेंगे, जब तक सारे आंदोलन शांत नहीं हो जाते। शाम में फिर मुझे गांधी मैदान थाने ले जाया गया और वहां FIR पर साइन करवाया गया। फिर सीधे बेऊर जेल भेज दिया गया।’ जेल में बीते दिनों को याद करते हुए सबा ने कहा, ‘बेउर जेल में मुझे महिला वार्ड में रखा गया। मुझे कहा गया कि दिन में बाहर कैंपस में घूम सकती हूं। लाइब्रेरी में पढ़ने की भी सुविधा रहेगी। मगर जब मैंने सुबह लाइब्रेरी जाने की बात की तो मुझे सीधे मना कर दिया गया। मैंने कागज और कलम मांगा तो वह भी नहीं दिया गया। पुलिस की ओर से कहा गया- यहां महिलाओं के लिए कोई सुविधा नहीं है। अगर मैं बाहर गई और कुछ भी हो जाता है। आपकी सुरक्षा के लिए पुलिस नहीं है।’ पुलिस ने करियर खत्म करने की धमकी दी सबा ने कहा, ‘पुलिस ने करियर खत्म करने की धमकी दी। जेल में जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग ट्रीटमेंट दिए जा रहे थे। जेल में महिलाएं थीं, जिनसे पानी गिर जाते तो उन्हें पीटा जाता था। महिलाओं को फेस टू फेस किसी ऑफिसर से बात करने की परमिशन नहीं थी। उन्हें बात करने के लिए चिट्ठी भेजना पड़ता था।’ कनपट्टी पर बंदूक रखकर, आंखों में पट्टी बांधी गई पटना यूनिवर्सिटी के छात्र संघ अध्यक्ष शांतनु शेखर को 22 जुलाई की रात में पुलिस ने डिटेन किया गया था। उन्होंने कहा, ‘मैं रात में अपने घर में सो रहा था। अचानक 1 बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया। मेरी मां ने दरवाजा खोला तो सामने 150 पुलिसकर्मी खड़े थे। वे मेरे घर में घुसे, मेरे कनपट्टी पर बंदूक रखकर आंखों पर पट्टी बांध दी। कहा-साथ चलना होगा। मेरा परिवार रात भर मुझे पटना के थानों में ढूंढता रहा शांतनु बोले, ‘मुझे करीब तीन-चार घंटे तक गाड़ी में घुमाया गया। जब मेरी आंखों की पट्टी खुली, तब मैं खगौल थाने में था। मुझे डिटेन करने के बाद मेरे परिवार वालों को मेरे बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। मेरा पूरा परिवार रात भर पटना के थानों में मुझे ढूंढ रहा था। मेरी मां का रो-रोकर बुरा हाल था। जब मेरी फैमिली को पता चला कि खगौल थाने में हूं तो मुझे वहां से निकालकर दूसरे थानों में 1 दिन तक घुमाया। फिर मुझे सीजीएम के पास ले जाया गया। इसके बाद फिर मुझे बेउर जेल भेज दिया गया।’ जेल में अपराधियों के साथ रखा गया शांतनु ने कहा, ‘जैसे ही मैं बेऊर जेल पहुंचा तो एक वार्ड में रखा गया। फिर वहां से अलग-अलग वार्ड में भेजा गया। जिस वार्ड में हमें ट्रांसफर किया गया, वहां पहले से सजा काट रहे अपराधी थे। जेल का खाना काफी खराब था। सब्जी, दाल, पानी में कोई अंतर ही नहीं था। इस आंदोलन से हम लोग अपने हक की बात कर रहे थे। मुझे पटना विश्वविद्यालय ने पढ़ाई और लड़ाई दोनों सिखाया है। इसलिए मैं अपने हक के लिए आवाज उठाता रहूंगा।’ STF के लोग बहुत बदतमीजी से विधायक के साथ मुझे गाड़ी में बैठाया ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) के प्रदेश अध्यक्ष धनंजय को भी पुलिस ने बिहार बंद से एक दिन पहले डिटेन किया था। धनंजय ने कहा, ‘24 जुलाई की रात में एमएलए संदीप सौरभ से मिलने आया था। इसी दौरान 10 से 12 काले शीशे वाली गाड़ियां आईं। STF के लोग बहुत बदतमीजी से बात कर रहे थे। उनलोगों ने हमें गाड़ी में बैठाया। मजिस्ट्रेट के पास ले जाकर बेउर जेल भेज दिया।’ सुबह में गुड़ चना और फिर चावल दाल खाने में मिलता था धनंजय ने कहा, ‘जेल में सुबह 6 बजे काउंटिंग होती थी। उस टाइम हमें जगाया जाता था। फिर बाहर फील्ड में हम लोग रहते थे। 12 बजे फिर काउंटिंग होती थी। इसके बाद हम अंदर जाते थे। 2 बजे फिर बाहर आते थे और एक दूसरे से मुलाकात करते थे। शाम 6 बजे तक हम वापस अपने वार्ड में चले जाते थे। हमें तीन टाइम खाना मिलता था। सुबह नाश्ते में गुड़ और चना दिया जाता था। दोपहर में चावल दाल और रात में रोटी सब्जी मिलती थी। जेल का खाना बिल्कुल भी खाने लायक नहीं था।’



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *