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कसौली की गलियों में आज भी 160 साल पुराना डाक इतिहास छिपा है। यहां ब्रिटिशकालीन कास्ट-आयरन पिलर लेटर बॉक्स मौजूद हैं, जिनके ऊपर बना शाही क्राउन उन्हें खास पहचान देता है। ये लेटर बॉक्स सुट्टी एंड कंपनी, ग्रीनॉक ने 1856-57 के दौरान बनाए थे। इनका खास डिजाइन ऊपर बने कास्ट-आयरन क्राउन की वजह से है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कसौली की ऐसी ऐतिहासिक निशानियों का संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि अपनी आंखों से भी कसौली के पुराने डाक इतिहास को देख सकें। डाक बॉक्स चिट्ठियों के दौर की कहानी सुनाते हैं
ऐसे कुछ बॉक्स आज भी भारत और पाकिस्तान में देखे जा सकते हैं। कसौली के ये लाल रंग के भारी-भरकम डाक बॉक्स चिट्ठियों के दौर की कहानी सुनाते हैं। ये बताते हैं कि कैसे एक चिट्ठी किसी परिवार के लिए खबर या सैनिक के लिए घर का संदेश होती थी। ये कसौली की औपनिवेशिक विरासत का अहम हिस्सा हैं। अपने समय के शुरुआती डिजाइनों में से थे
डाक इतिहास के जानकारों के मुताबिक ये पिलर बॉक्स अपने समय के शुरुआती डिजाइनों में से थे। इनका ‘स्टोव’ जैसा आकार और शाही क्राउन इन्हें खास बनाता है। शिमला में भी 1856 का ऐसा ही एक ब्रिटिशकालीन लेटर बॉक्स संरक्षित है। ये उस दौर के जीवंत दस्तावेज हैं, जब संदेश पहुंचने में कई दिन लगते थे। व्हाट्सऐप और ई-मेल के दौर में भी कायम है आकर्षण
आज मोबाइल फोन, व्हाट्सऐप और ई-मेल ने संदेश भेजने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। एक सेकेंड में दुनिया के किसी भी कोने में संदेश पहुंच जाता है। हालांकि कसौली के ये पुराने लेटर बॉक्स उस दौर की याद दिलाते हैं, जब डाकिए का इंतजार भी कहानी का हिस्सा होता था और हाथ से लिखी चिट्ठी अपने साथ भावनाएं लेकर आती थी।
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कसौली में आज भी मौजूद है क्राउन वाले लेटर बॉक्स:160 साल पुराना है इतिहास, लोग बोले- ऐतिहासिक निशानियों का संरक्षण हो
