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रेवाड़ी के पुलिस लाइन में रहने वाली ग्रामीण क्षेत्र में जन्मी और पली-बढ़ी डॉ. आशा की जिंदगी संघर्ष, साहस और दृढ़ संकल्प की ऐसी कहानी है, जो हर महिला और बेटी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद पर्वतारोहण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने 6 दिन में 2 महाद्वीप की 2 सर्वोच्च चोटियां पर फतह हासिल किया है
डॉ. आशा का जन्म राजस्थान के झुंझुनूं जिले के गांव घरड़ाना खुर्द के साधारण परिवार में हुआ। 19 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हरियाणा के महेंद्रगढ़-नारनौल क्षेत्र के बालाहा खुर्द (नांगलिया) में हुआ। वर्तमान में वह रेवाड़ी पुलिस लाइन में रहती हैं। उनके पति अजय सिंह रेवाड़ी में सब इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। सरकारी नर्सिंग ऑफिसर के रूप में सेवा देने के साथ उन्होंने वर्ष 2017 में माउंट एवरेस्ट फतह किया। डॉ. आशा का जीवन सामान्य परिस्थितियों से शुरू हुआ, लेकिन उनके सपने हमेशा असाधारण रहे। वर्ष 2014 में उन्हें रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगी, जिसके चलते वह करीब पांच से छह महीने तक बिस्तर पर रहीं। इस कठिन समय में उन्हें ऐसे शब्द भी सुनने पड़े, जिन्होंने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें परिवार और समाज पर बोझ समझे जाने तक की बातें कही गईं। लेकिन डॉ. आशा ने परिस्थितियों के आगे झुकने के बजाय अपनी जिंदगी को नई दिशा देने का फैसला किया। अमरनाथ यात्रा में मिला एक वाक्य बना जिंदगी का लक्ष्य वर्ष 2015 में अमरनाथ यात्रा के दौरान एक भारतीय सैनिक ने डॉ. आशा को तेज गति से चलते हुए देखा। उनकी क्षमता और जज्बे को देखकर सैनिक ने कहा कि जिस रफ्तार से वह चल रही हैं, उससे तो वह माउंट एवरेस्ट भी चढ़ सकती हैं। ये कुछ शब्द डॉ. आशा के मन में ऐसे बसे कि धीरे-धीरे एवरेस्ट उनका सपना और फिर जीवन का मिशन बन गया। उन्होंने पर्वतारोहण के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की और कठिन प्रशिक्षण लिया। सरकारी नर्सिंग ऑफिसर की नौकरी, दो बच्चों की जिम्मेदारी और परिवार के बीच उन्होंने अपने लक्ष्य के लिए शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से खुद को तैयार किया। 2017 में एवरेस्ट पर फहराया तिरंगा वर्ष 2017 में डॉ. आशा ने चीन/तिब्बत की ओर से माउंट एवरेस्ट के उत्तरी मार्ग से अभियान शुरू किया। कठिन मौसम, दुर्गम रास्तों और लगातार बदलती परिस्थितियों ने उनकी परीक्षा ली। कई बार परिस्थितियों के कारण उन्हें पीछे लौटना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार 22 मई 2017 को सुबह 4:05 बजे उन्होंने 8,848 मीटर ऊंची माउंट एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा। अपने पहले प्रयास में एवरेस्ट फतह कर उन्होंने वहां भारतीय तिरंगा फहराया और “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” तथा “महिला सशक्तिकरण” का संदेश दिया। उपलब्ध रिकॉर्ड मान्यताओं के अनुसार High Range Book of World Records और India Records में उन्हें एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय स्टाफ नर्स के रूप में मान्यता/पंजीकरण प्राप्त हुआ है। 48 वर्ष की उम्र में फिर रचा नया इतिहास एवरेस्ट के आठ वर्ष बाद भी डॉ. आशा के कदम नहीं रुके। 21 अगस्त 2026 को सुबह 9:07 बजे उन्होंने 5,642 मीटर ऊंची यूरोप की सर्वोच्च चोटी माउंट एल्ब्रुस को फतह किया और तिरंगा फहराया। इसके बाद उन्होंने अफ्रीका की सर्वोच्च पर्वत चोटी माउंट किलिमंजारो का रुख किया और 29 अगस्त 2026 को सुबह 5:31 बजे सफलतापूर्वक शिखर पर पहुंचीं। एल्ब्रुस से किलिमंजारो तक की यह उपलब्धि यात्रा सहित नौ दिन और यात्रा को छोड़कर छह दिन में पूरी की गई। शूटिंग में भी हासिल किए कई पदक पर्वतारोहण के साथ डॉ. आशा ने खेल के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। वर्ष 2025 में मास्टर महिला वर्ग की एयर पिस्टल शूटिंग में उन्होंने GV Mavlankar Shooting Competition, North Zone और State Level पर कांस्य पदक हासिल किए। इसके अलावा State Level और Pre-State प्रतियोगिताओं में 10, 25 और 50 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धाओं में कई स्वर्ण पदक भी जीते। डॉ. आशा की कहानी केवल पर्वतों को फतह करने की कहानी नहीं है। यह उस महिला की कहानी है, जिसने चोट, जिम्मेदारियों और सामाजिक तानों के बावजूद खुद पर विश्वास बनाए रखा।
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गांव से दुनिया की ऊंची चोटियों तक पहुंचीं डॉ. आशा:हौसले और संघर्ष की कहानी, एवरेस्ट से एल्ब्रुस तक लहराया तिरंगा
