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चतरा का मां कौलेश्वरी धाम वर्षों से बदहाल:जर्जर यज्ञशाला, टपकते आवास, 65 करोड़ के ड्रीम प्रोजेक्ट का दावा फेल




चतरा जिले के कोलहुआ पहाड़ पर स्थित मां कौलेश्वरी मंदिर हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। देश-विदेश से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय पहचान रखने वाले इस महातीर्थ में पहुंचते ही आस्था पर बदहाली भारी पड़ती है। पहाड़ पर स्थित पवित्र जलकुंड, जहां श्रद्धालु स्नान कर मां को जल अर्पित करते थे, आज गोबर और गंदगी से अटा पड़ा है। कुंड से उठती तेज बदबू के कारण वहां कुछ देर खड़ा होना भी मुश्किल है।
श्रद्धालुओं का कहना है कि जिस स्थल को धार्मिक और पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, वहां बुनियादी सुविधाओं की स्थिति ही सवाल खड़े कर रही है। बदहाली की तस्वीरें देखें… पुजारी बोले-10-15 साल से नहीं हुई सफाई कुंड की बदहाली को लेकर प्रशासन और मंदिर प्रबंधन के दावों में भी बड़ा विरोधाभास सामने आया है। चतरा एसडीओ जहूर आलम का कहना है कि कुंड की सफाई हर साल कराई जाती है। वहीं मंदिर के प्रधान पुजारी ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पिछले 10-15 वर्षों से कुंड की सफाई ही नहीं हुई। लाखों रुपए की लागत से बनाए गए हाईटेक शौचालय भी श्रद्धालुओं के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। इन पर हमेशा ताला लटका रहता है। आरोप है कि इन्हें सिर्फ वीआईपी अधिकारियों के लिए खोला जाता है। शुद्ध पेयजल के लिए लगाई गई नल-जल योजना भी बेअसर पड़ी है। जर्जर यज्ञशाला, टपक रहे हैं आवास मंदिर परिसर की यज्ञशाला और विवाह मंडप की छतें जर्जर हो चुकी हैं। स्थिति यह है कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। पुजारियों के आवास भी बारिश में टपकते हैं। रात में स्ट्रीट लाइटें नहीं जलने से पूरे परिसर में अंधेरा छा जाता है। जंगली जानवरों का डर बना रहता है। सुरक्षा व्यवस्था की पोल हाल में हुई एक घटना ने खोल दी। कुंड में पलामू के एक युवक की डूबने से मौत हो गई, लेकिन यहां कोई बचाव दल तैनात नहीं है। डूबते लोगों को स्थानीय दुकानदार अपनी जान जोखिम में डालकर बचाने को मजबूर हैं। इसके बावजूद एसडीओ ने सुरक्षा की जिम्मेदारी श्रद्धालुओं की लापरवाही पर डाल दी। 65 करोड़ के ड्रीम प्रोजेक्ट का दावा फेल सबसे बड़ा सवाल मंदिर की दान पेटी और विकास के बीच का है। जानकारी के अनुसार दान पेटी की राशि का 60 प्रतिशत हिस्सा, सालाना करीब 75 लाख रुपए, सीधे जिला प्रशासन को जाता है। वहीं प्रबंधन समिति के खाते में करोड़ों रुपए जमा हैं। इसके बावजूद धरातल पर विकास नगण्य नजर आ रहा है। हालांकि पर्यटन सह खेल पदाधिकारी कैलाश कुमार के अनुसार सरकार यहां 65 करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी विकास योजना ला रही है। मंदिर के विकास और रोपवे के लिए मिट्टी की टेस्टिंग पूरी हो चुकी है। आदेश मिलते ही काम शुरू होने की बात कही गई है। लेकिन सवाल यही है कि जब मौजूदा कुंड गंदगी से भरा, शौचालय बंद, छतें जर्जर और सुरक्षा व्यवस्था नदारद है, तो 65 करोड़ का सपना कब जमीन पर उतर सकेगा।



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