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चित्तौड़गढ़ नगर परिषद के 60 वार्डों की आरक्षण लॉटरी ने चुनावी माहौल पूरी तरह बदल दिया है। कई नेता पिछले कई महीनों से जिस वार्ड से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, वहां आरक्षण की लॉटरी के बाद पूरी रणनीति बदल गई है। कई नेताओं के लिए यह लॉटरी उम्मीद के मुताबिक रही और उनके समर्थकों ने टिकट की दौड़ तेज कर दी है। अब चुनाव सिर्फ जनता के बीच नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर भी लड़ा जाएगा। किसे टिकट मिलेगा, कौन अपना वार्ड बदलेगा और कौन अपने पुराने क्षेत्र में ही दांव लगाएगा, यही आने वाले दिनों की सबसे बड़ी राजनीतिक चर्चा रहने वाली है। आरक्षण के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों में नए समीकरण बन गए हैं और अब पूरी सियासत टिकट वितरण और गुटों के संतुलन पर टिक गई है। भाजपा के दो बड़े चेहरे भी मैदान में राजनीतिक चर्चा है कि इस बार वे वार्ड-35 से टिकट मांग सकते हैं, जो अनारक्षित पुरुष के लिए आरक्षित हुआ है। बता दे कि सुशील शर्मा 2019 का चुनाव नहीं लड़े थे। सभापति पद की संभावित दौड़ में शामिल कई नेताओं को अब अपने राजनीतिक समीकरण नए सिरे से बनाने होंगे। पोखरना से लेकर सांसद-विधायक के वार्ड तक बदले समीकरण तीन बार भाजपा नगर मंडल अध्यक्ष रहे नरेंद्र पोखरना भी आरक्षण बदलने से प्रभावित नेताओं में शामिल हैं। पिछली बार वे वार्ड-33 से पार्षद बने थे, लेकिन इस बार यह वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हो गया है। ऐसे में माना जा रहा है कि वे अब वार्ड-12, 15 या 47 में से किसी एक वार्ड से टिकट की दावेदारी कर सकते हैं, क्योंकि तीनों वार्ड अनारक्षित पुरुष के लिए आरक्षित हैं। इसी तरह भाजपा सांसद सीपी जोशी और निर्दलीय विधायक चंद्रभान सिंह आक्या जिस वार्ड क्षेत्र में रहते हैं, वहां भी लॉटरी ने पूरा गणित बदल दिया। वार्ड-29 पहले सामान्य महिला के लिए आरक्षित था और इस बार उम्मीद थी कि यह सामान्य वर्ग में रहेगा, लेकिन यह ओबीसी पुरुष के लिए आरक्षित हो गया। इससे वहां चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कई संभावित उम्मीदवारों को बड़ा झटका लगा है। पिछले चुनाव में यहां प्रीति सुखवाल पार्षद थीं। कांग्रेस के बड़े नेताओं के वार्ड खुले, सभापति की दौड़ के चेहरे भी बदलेंगे कांग्रेस जिलाध्यक्ष प्रमोद सिसोदिया का वार्ड-31 और पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह जाड़ावत का वार्ड-14 दोनों ही अनारक्षित पुरुष के लिए आरक्षित हुए हैं। वार्ड-14 से पिछले चुनाव में शांतिलाल पार्षद चुने गए थे। जबकि वार्ड-31 के पार्षद रामचंद्र गुर्जर थे। वहीं नगर परिषद सभापति की संभावित दौड़ में कांग्रेस के रमेश नाथ योगी और भाजपा के शैलेंद्र झंवर के नाम भी चर्चा में हैं। रमेश नाथ योगी पहले वार्ड-8 से पार्षद रह चुके हैं और नगर पालिका अध्यक्ष भी रहे हैं। उनकी मां गीता देवी योगी पहले नगर पालिका अध्यक्ष रहने के साथ नगर परिषद बनने के बाद सभापति भी रह चुकी हैं। लेकिन इस बार वार्ड-8 अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित हो गया है। दूसरी ओर शैलेंद्र झंवर पहले वार्ड-49 से चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन अब यह सीट भी अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित हो गई है। हालांकि वे पिछला चुनाव हार गए थे, लेकिन माना जा रहा है कि इस बार वे वार्ड-25 या वार्ड-31 से टिकट मांग सकते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्षद महेंद्र सिंह मेड़तिया भी इस बार वार्ड बदलने की तैयारी में हैं। पिछले चुनाव में वे वार्ड संख्या 17 से निर्वाचित हुए थे, लेकिन इस बार उनकी नजर अपने गृह वार्ड 14 पर है। वार्ड 14 अनारक्षित पुरुष होने के बाद उन्होंने यहां से कांग्रेस टिकट की दावेदारी शुरू कर दी है। ऐसे में इस वार्ड में भी टिकट को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होने की संभावना है। कई नेताओं को बदलना पड़ेगा वार्ड, अब टिकट ही सबसे बड़ी लड़ाई आरक्षण के बाद सबसे बड़ा असर उन नेताओं पर पड़ा है, जिन्होंने पहले से किसी एक वार्ड में पूरी तैयारी कर रखी थी। अब कई दावेदारों को नया वार्ड तलाशना पड़ेगा, जबकि कुछ नेताओं के लिए आरक्षण उम्मीद से बेहतर साबित हुआ है। शहर में ऐसे कई वार्ड हैं जहां भाजपा की पकड़ मजबूत मानी जाती है, वहीं कुछ वार्ड कांग्रेस के प्रभाव वाले हैं। इसलिए अब केवल वार्ड चुनना ही नहीं, बल्कि सही वार्ड से पार्टी का टिकट हासिल करना भी बड़ी चुनौती बन गया है। पिछला बोर्ड कांग्रेस का था। जहां कांग्रेस एक बार फिर बोर्ड बनाने की कोशिश करेगी। वहीं बीजेपी के लिए वापसी करना भी चुनौती होगी। पार्टी को उसी के हिसाब से टिकट का वितरण करना जरूरी है। कई वार्डों में एक से ज्यादा दावेदार सामने आएंगे, वहां पार्टी नेतृत्व के सामने संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। इसलिए आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा हलचल टिकट वितरण को लेकर ही देखने को मिलेगी। भाजपा में सांसद-विधायक का संतुलन, कांग्रेस में गुटबाजी सबसे बड़ी चुनौती नगर परिषद चुनाव से पहले भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सांसद सीपी जोशी और निर्दलीय विधायक चंद्रभान सिंह आक्या के समर्थकों के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी। दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से राजनीतिक मनमुटाव किसी से छिपा नहीं है। हाल के दिनों में दोनों साथ होने का दावा जरूर कर रहे हैं, लेकिन टिकट वितरण के समय यह तालमेल कितना मजबूत रहता है, इस पर सबकी नजर रहेगी। पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि भाजपा और निर्दलीय खेमे के नेताओं को किस तरह टिकट देकर संतुष्ट रखा जाए, ताकि चुनाव में कोई अंदरूनी नाराजगी सामने न आए। कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं होगी राह, एकजुटता की होगी सबसे बड़ी परीक्षा दूसरी ओर कांग्रेस के सामने भी हालात आसान नहीं हैं। पार्टी में जिस तरह की अंदरूनी खींचतान पिछले कुछ समय से देखने को मिल रही है, उसके बीच टिकट वितरण किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। एक ओर कांग्रेस जिलाध्यक्ष प्रमोद सिसोदिया, पूर्व मंत्री उदयलाल आंजना और पूर्व सभापति संदीप शर्मा एक साथ माने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह जाड़ावत का अलग राजनीतिक प्रभाव है। जाड़ावत पहले भाजपा के खिलाफ कांग्रेस का सबसे मजबूत चेहरा रहे हैं और उनका अपना समर्थक वर्ग भी है। ऐसे में चुनाव से पहले पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन दोनों धड़ों को साथ लेकर चलने और टिकट वितरण में संतुलन बनाने की होगी। अगर कांग्रेस ऐसा करने में सफल रहती है तो मुकाबला दिलचस्प होगा, लेकिन यदि गुटबाजी बढ़ी तो उसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर भी पड़ सकता है। नगर परिषद चुनाव से पहले फिलहाल इतना तय है कि इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं होगा, बल्कि दोनों दलों के भीतर भी राजनीतिक परीक्षा कम नहीं रहने वाली है।
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चित्तौड़गढ़ में आरक्षण की लॉटरी ने फंसाया पेंच:कई नेताओं को बदलना पड़ सकता है वार्ड; टिकट के लिए करनी होगी मशक्कत
