![]()
अखिल राज्य ट्रेड एंड इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आरतिया) ने जीएसटी कौंसिल से आग्रह किया है कि टैक्स क्रेडिट सैट आफ नियमों का सरलीकरण किया जाये, क्योंकि संबंधित नियम पेचीदा होने के कारण कारोबारियों द्वारा बैंक से उधार ली हुई कार्यशील पूंजी जीएसटी पेटे सरकारी खातों में बैलेंस रहती है, जिस कारण कारोबारी को बैंक ब्याज राशि का नुकसान भी उठाना पड़ता है। आरतिया के विष्णु भूत, कमल कंदोई, आशीष सर्राफ, प्रेम बियाणी, ओ पी राजपुरोहित, दिनेश गोयल, जसवंत मील, एच एम जौहरी, राजीव सिंहल, कैलाश शर्मा, आयुष जैन व अरविंद अग्रवाल ने बताया कि अन्य देशों में तो जीएसटी एक देश एक टैक्स की तरह है, लेकिन हमारे यहां इसे फेडेरल एडमिनिस्ट्रेशन सिस्टम के कारण तीन तरह के टैक्स आईजीएसटी, सीजीएसटी तथा एसजीएसटी में विभाजित कर दिया है। यह एक प्रशासनिक व्यवस्था है, लेकिन इससे कारोबारियों को आर्थिक नुकसान बहुत हो रहा है। टीम आरतिया का कहना है कि एक कारोबारी चाहे उद्यमी हो या व्यापारी वह अगर एक राज्य से दूसरे राज्य से वस्तुओं की खरीद करता है, तो उसे आईजीएसटी अर्थात अंतर्राज्यीय जीएसटी चुकाना होता है। इस खरीदी हुई वस्तु को प्रोसेस कर या स्टाक में रखने के बाद जब वह बेचता है तो क्रेता अर्थात खरीददार से दो तरह के टैक्स वसूल करता है, पहला सीजीएसटी अर्थात केंद्रीय जीएसटी और दूसरा एसजीएसटी अर्थात राज्य जीएसटी। इस विक्रय पर जो टैक्स वसूली होती है, उसके लिए क्रय मूल्य व विक्रय मूल्य के अंतर अर्थात वैल्यू एडीशन को आधार बनाकर टैक्स दर के हिसाब से गणना होती है। सामान्यतः क्रय पर चुकाये गये आईजीएसटी में से सीधे सैट आफ मिलना चाहिए, लेकिन इसे लेकर कोई नियम नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित किया होता है कि आईजीएसटी में पहले सीजीएसटी के लिए सैट आफ मिलेगा, वह जब पूरा हो जाये तब एसजीएसटी के लिए सैट आफ मिलेगा। लाखों व्यापारी उद्यमी ऐसे होते हैं जो अपने प्रांत में की गई खरीद पर टैक्स देते हैं, इस टैक्स राशि में उन्हें तत्काल सैट आफ नहीं मिलता। राजस्थान में अरबों रुपए की रकम व्यापारियों व उद्यमियों की एसजीएसटी पेटे सरकार के यहां जमा होती है। पर इसका उन्हें रिफंड नहीं मिलता और टैक्स क्रेडिट का सैट आफ भी मिलने में बहुत समय लग जाता है। आरतिया ने जानकारी दी है कि रिफंड संबंधित नियम केवल दो प्रकरण में सहज हैं, पहला जब वस्तुओं का निर्यात होता हो और दूसरे जब क्रय की गई वस्तु (अधिकतर कच्चे माल पर ) टैक्स दर अधिक हो और फिनिश्ड गुड्स पर कम हो। बाकी अन्य प्रकरणों में सैट आफ नियम भी पेचीदा है और कारोबारी की रकम भी अटकी रहती है। आरतिया ने सुझाया है कि जीएसटी कौंसिल इस पेचीदगी तथा कारोबारियों की व्यवहारिक समस्या का निदान करे, इसके लिए यह तय करना चाहिए कि भले ही प्रशासनिक मकसद से जीएसटी के तीन स्वरूप तय कर दिए गए हों, लेकिन सैट आफ में कर राशि को जीएसटी ही समझा जाये। इसके अलावा जो रिफंड योग्य राशि सरकार के पास रहती है, वह तुरंत कारोबारी के खाते में ट्रांसफर की जाये। अगर नहीं तो इस जमा राशि पर 18 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज दिया जाये।
Source link
'टैक्स क्रेडिट सैट आफ नियमों का सरलीकरण हो':आरतिया ने कहा- कारोबारी को बैंक ब्याज राशि का नुकसान उठाना पड़ता
