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दुर्ग जिला अस्पताल में जन्माष्टमी की छुट्टी के दौरान एक नवजात की मौत का मामला सामने आया है। प्रेग्नेंट महिला 3 सितंबर से अस्पताल में भर्ती थी। परिजनों का आरोप है कि 5 सितंबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा के बावजूद उन्हें डॉक्टर के आने का इंतजार करने को कहा गया। दोपहर करीब 12 बजे महिला को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया और करीब आधे घंटे बाद नवजात की मौत की जानकारी दी गई। परिजनों ने समय पर इलाज नहीं मिलने और डॉक्टरों की उपलब्धता पर सवाल उठाए हैं। वहीं, अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि महिला की स्थिति के अनुसार इलाज का फैसला लिया गया था। मामले की जांच के लिए टीम बनाई जा रही है और जांच के बाद ही मौत की सही वजह पता चल पाएगी। ये है पूरा मामला भिलाई के सुपेला फरीदनगर की 28 वर्षीय सबीना 3 सितंबर से अस्पताल में भर्ती थी। उसे 5 सितंबर की सुबह प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों का आरोप है कि वे लगातार डॉक्टर और स्टाफ को महिला की हालत बता रहे थे, लेकिन उन्हें डॉक्टर के आने का इंतजार करने को कहा गया। दोपहर में महिला को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। करीब आधे घंटे बाद परिजनों को नवजात की मौत की जानकारी दी गई। परिजनों ने इस पूरी घटना के लिए अस्पताल में समय पर इलाज न मिलने और छुट्टी के दिन डॉक्टर की कमी पर सवाल उठाए हैं। वहीं, अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि इलाज का फैसला हालात के हिसाब से लिया गया था। नवजात की मौत की असली वजह जांच के बाद ही साफ होगी। मृत नवजात के पिता आशिक अली ने बताया कि वे अपनी पत्नी सबीना (28) को 3 सितंबर को दोपहर करीब 12 से 1 बजे के बीच जिला अस्पताल ले आए थे। भर्ती के बाद शाम 4 बजे जांच में डॉक्टरों ने बताया था कि बच्चे के गले में दो नाल फंसी हुई है। परिजनों के मुताबिक, उस समय सी-सेक्शन की बात भी कही गई थी। आशिक का कहना है कि इसके बाद उन्हें बताया गया कि अगले दिन जन्माष्टमी की छुट्टी है। इसलिए ऑपरेशन बाद में किया जाएगा। परिजनों के अनुसार, महिला की हालत पर लगातार नजर रखी जा रही थी, लेकिन ऑपरेशन को लेकर कोई साफ फैसला नहीं हो सका। छुट्टी के दिन अचानक उनसे कहा गया कि सी-सेक्शन करना होगा। आशिक के मुताबिक अगले दिन जब परिवार खाना खा रहा था, तब अस्पताल के स्टाफ की ओर से सी-सेक्शन की बात कही गई। लेकिन महिला के खाना खा लेने के कारण उस समय ऑपरेशन नहीं किया गया। इसके बाद रात में महिला को कुछ भी खाने से रोक दिया गया। परिजन का कहना है कि रात करीब 9 बजे दोबारा जांच की गई और उन्हें बताया गया कि ऑपरेशन सुबह किया जाएगा। इसके बाद परिवार सुबह तक डॉक्टर के आने का इंतजार करता रहा। सुबह 6 बजे से दर्द, 7 बजे लेबर रूम में ले गए परिजनों के अनुसार 5 सितंबर की सुबह करीब 6 बजे महिला को तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिवार ने अस्पताल के कर्मचारियों को इसकी जानकारी दी। करीब 7 बजे महिला को लेबर रूम में ले जाया गया। आशिक का दावा है कि उसने डॉक्टर और स्टाफ को महिला की बढ़ती पीड़ा के बारे में बताया, लेकिन उसे कहा गया कि डॉक्टर सुबह 9 बजे आएंगे और जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। परिजन का कहना है कि उस समय तक बच्चे की धड़कन सामान्य थी। इसके बावजूद उन्हें तत्काल ऑपरेशन को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। 12 बजे ऑपरेशन थिएटर, 12.30 बजे मौत की खबर परिजनों के अनुसार सुबह डॉक्टरों के आने के बाद महिला की जांच की गई और दोपहर करीब 12 बजे उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। परिवार को उम्मीद थी कि अब सी-सेक्शन होगा और बच्चे को बचाया जा सकेगा। लेकिन करीब 12.30 बजे परिजनों को बताया गया कि प्रसव के दौरान नवजात की मौत हो गई। इसके बाद परिवार में मातम छा गया। परिजनों का आरोप है कि महिला को सी-सेक्शन के लिए ले जाया गया था, लेकिन अंततः सामान्य प्रसव कराया गया। ‘डॉक्टर समय पर आते तो शायद बच्चा बच जाता’ मृत नवजात के पिता आशिक अली ने कहा कि उनका सवाल केवल अपने बच्चे की मौत का नहीं, बल्कि अस्पताल की व्यवस्था का है। उनका आरोप है कि यदि समय पर डॉक्टर उपलब्ध होते और सुबह ही महिला की स्थिति के अनुसार निर्णय लिया जाता तो शायद बच्चे की जान बचाई जा सकती थी। उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पताल में गरीब परिवार इलाज की उम्मीद लेकर आता है। ऐसे में मरीजों को समय पर इलाज और चिकित्सकीय सुविधा मिलना जरूरी है। उन्होंने पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है। बुआ ने भी लगाया डॉक्टर के इंतजार कराने का आरोप मृत नवजात की बुआ सबा सिद्दीकी ने कहा कि सुबह महिला की हालत खराब होने पर परिवार जांच के लिए लगातार कह रहा था। उनका आरोप है कि डॉक्टर के नहीं आने की बात कहकर उन्हें इंतजार कराया गया। सबा ने अस्पताल के स्टाफ के व्यवहार पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि प्रसव के लिए आने वाले परिवार पहले ही मानसिक दबाव में होते हैं। ऐसे समय में अस्पताल में संवेदनशील व्यवहार और समय पर चिकित्सा सुविधा मिलना जरूरी है। अस्पताल प्रबंधन बोला- छुट्टी का मतलब डॉक्टरों की अनुपलब्धता नहीं सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने बताया कि मामले की जांच के लिए डॉक्टरों की टीम बनाई जाएगी। टीम यह जांच करेगी कि इलाज के दौरान किस समय क्या फैसला लिया गया और कहीं कोई लापरवाही तो नहीं हुई। उन्होंने बताया कि महिला दो दिन से अस्पताल में भर्ती थी और यह उसकी तीसरी डिलीवरी थी। उसकी पहले की दोनों डिलीवरी सामान्य हुई थी। उनके मुताबिक, 5 सितंबर की सुबह करीब 9 बजे तक बच्चे की धड़कन सामान्य थी। इसके बाद प्रसव के दौरान नवजात की मौत हो गई। खाना खाने के बाद तत्काल ऑपरेशन जोखिमपूर्ण सिविल सर्जन के मुताबिक, शुरुआती जांच में पता चला है कि महिला को ऑपरेशन के लिए ले जाया गया था, लेकिन उसने खाना खा लिया था। खाना खाने के तुरंत बाद ऑपरेशन करना जोखिम भरा हो सकता है। महिला की पिछली दो डिलीवरी सामान्य हुई थी, इसलिए डॉक्टर सामान्य प्रसव की संभावना को देखते हुए इलाज कर रहे थे। उन्होंने बताया कि सी-सेक्शन करना है या नहीं, इसका फैसला मरीज की स्थिति देखकर स्त्री रोग विशेषज्ञ करते हैं। जांच से तय होगी जिम्मेदारी परिजनों ने जहां पूरी घटना को लापरवाही और छुट्टी के दौरान डॉक्टर की उपलब्धता से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं, वहीं अस्पताल प्रबंधन ने इन आरोपों को जांच का विषय बताया है। सिविल सर्जन ने कहा कि अस्पताल में स्टाफ की कमी है, लेकिन सी-सेक्शन के लिए आवश्यक पूरी टीम उपलब्ध रहती है। मरीज की प्राथमिकता के अनुसार स्टाफ लगाया जाता है। अब जांच समिति घटनाक्रम के हर चरण की समीक्षा करेगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि नवजात की मौत चिकित्सकीय जटिलता के कारण हुई या समय पर उपचार में किसी तरह की चूक हुई।
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दुर्ग जिला अस्पताल में नवजात की मौत:परिजनों का आरोप- समय पर नहीं मिला इलाज, अस्पताल प्रबंधन ने कहा- जांच के बाद तय होगी वजह
