चंडीगढ़ प्रशासन के इस्टेट ऑफिस ने प्रॉपर्टी मालिकों के लिए अलग से नो ड्यूज सर्टिफिकेट या नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेने की जरूरत खत्म कर दी है। इसके लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर (एसओपी) जारी की गई है। फिलहाल यह व्यवस्था लीज राइट्स के ट्रांसफर और लीजहोल्ड टेन्योर से फ्री-होल्ड टेन्योर में कन्वर्जन की सर्विस पर लागू होगी। अगर यह कॉन्सेप्ट सफल रहता है तो इसे बाकी सर्विसेस में भी लागू किया जा सकता है। नई व्यवस्था के तहत एप्लीकेंट को पहले अलग से एनडीसी के लिए आवेदन नहीं करना होगा। पूरी प्रक्रिया एक ही एप्लीकेशन पर होगी। इसका बेस वन एप्लीकेशन, वन स्क्रूटनी, वन डिस्क्रेपेंसी या डिमांड नोटिस और वन फाइनल डिस्पोजल रहेगा। पूरी जानकारी और जरूरी डॉक्यूमेंट्स के साथ जमा की गई एप्लीकेशन का निपटारा 15 वर्किंग डे के अंदर करने का प्रावधान किया गया है। टुकड़ों में ऑब्जेक्शन नहीं, एक ही कम्युनिकेशन जाएगा… अब एक फाइल पर बार-बार अलग-अलग ऑब्जेक्शन या डिमांड नोटिस जारी नहीं होंगे। प्रॉपर्टी रिकॉर्ड की स्क्रूटनी के बाद डॉक्यूमेंट्स में कमी, क्लेरिफिकेशन, एक्स्ट्रा डॉक्यूमेंट्स, बकाया ड्यूज और सभी फीस की जानकारी एक ही डिस्क्रेपेंसी मेमो-कम-डिमांड नोटिस में दी जाएगी। 8 स्टेप में ऐसे चलेगी नई एसओपी 1रिसिप्ट ऑफ एप्लीकेशन: एप्लीकेंट प्रशासन के ऑनलाइन पोर्टल से लीज राइट्स ट्रांसफर या लीजहोल्ड से फ्री-होल्ड कन्वर्जन के लिए चेकलिस्ट के अनुसार डॉक्यूमेंट्स के साथ आवेदन करेगा। अलग से एनडीसी लेने की जरूरत नहीं होगी। 2स्क्रूटनी ऑफ एप्लीकेशन: आवेदन मिलने के बाद प्रॉपर्टी रिकॉर्ड और जमा डॉक्यूमेंट्स की जांच होगी। कमी या गलती इसी शुरुआती स्टेज पर चिन्हित की जाएगी। इसकी जिम्मेदारी रिकॉर्ड कीपर, डीलिंग असिस्टेंट और ब्रांच इंचार्ज की होगी। 3वेरिफिकेशन एंड कैलकुलेशन ऑफ ड्यूज: प्रॉपर्टी पर सभी आउटस्टैंडिंग चार्जेस की गणना होगी। साथ ही मेन सर्विस के लिए देय फीस भी इसी स्तर पर कैलकुलेट की जाएगी। यह अकाउंटेंट की जिम्मेदारी होगी। 4ऑडिट ऑफ कैलकुलेशंस: जहां ऑडिट वेरिफिकेशन जरूरी है, वहां एप्लीकेंट को डिमांड भेजने से पहले बकाया राशि और सर्विस चार्जेस के कैलकुलेशन की ऑडिट सेक्शन से जांच होगी। इसकी जिम्मेदारी एसओ ऑडिट और एओ ऑडिट की होगी। 5सिंगल कम्युनिकेशन टू एप्लीकेंट: डॉक्यूमेंट्स की सभी कमियां और प्रॉपर्टी से जुड़े सभी सरकारी बकाया चार्जेस को एक लिस्ट में शामिल कर सिर्फ एक बार डिस्क्रेपेंसी मेमो-कम-डिमांड नोटिस जारी किया जाएगा। इसकी जिम्मेदारी ब्रांच और एईओ की होगी। 6 कम्प्लायंस बाय एप्लीकेंट: नोटिस मिलने के बाद एप्लीकेंट कम पाए गए डॉक्यूमेंट्स ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड करेगा और नोटिस में बताई गई कुल बकाया राशि व अन्य सरकारी चार्जेस जमा करेगा। 7वेरिफिकेशन ऑफ कम्प्लायंस: कमियां दूर होने और बकाया राशि जमा होने के बाद डॉक्यूमेंट्स और पेमेंट का दोबारा वेरिफिकेशन होगा। इसके बाद नए एनडीसी की मांग नहीं की जाएगी। इसकी जिम्मेदारी डीलिंग असिस्टेंट और अकाउंटेंट की होगी। 8फाइनल डिस्पोजल: सभी डॉक्यूमेंट्स, औपचारिकताओं और पेमेंट का वेरिफिकेशन होने के बाद केस को अंतिम मंजूरी और एनओसी या कन्वर्जन ऑर्डर जारी करने के लिए कंपीटेंट अथॉरिटी के पास भेजा जाएगा। इसकी जिम्मेदारी ब्रांच इंचार्ज, एईओ और कंपीटेंट अथॉरिटी की होगी। लोगों को सुविधा हो, इसलिए अब अलग से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट या नो ड्यूज सर्टिफिकेट की जरूरत खत्म की गई है। इससे सिस्टम सही होगा और सर्विस को पूरा करने में लगने वाले टाइम को कम करने में भी मदद मिलेगी।-निशांत कुमार यादव, डिप्टी कमिश्नर-कम-इस्टेट ऑफिसर, चंडीगढ़ पहले एनओसी-एनडीसी में ही लग जाते थे कई दिन… नई व्यवस्था की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि कई मामलों में सिर्फ एनओसी या एनडीसी लेने में ही कई दिन लग जाते थे। इसके बाद एप्लीकेंट को मेन सर्विस यानी लीज ट्रांसफर या कन्वर्जन के लिए आवेदन करना पड़ता था। एक ही फाइल में कई बार डिमांड नोटिस जारी होने से भी लोगों को परेशानी होती थी। कभी एक डॉक्यूमेंट की कमी बताई जाती, उसे जमा करने के बाद दूसरा डॉक्यूमेंट मांगा जाता। इसी तरह अलग-अलग समय पर अलग फीस की जानकारी मिलने से एप्लीकेंट को कई बार इस्टेट ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ते थे। अब एक ही कम्युनिकेशन में सभी कमियां, जरूरी डॉक्यूमेंट्स और बकाया राशि की जानकारी मिलने से एप्लीकेंट इन्हें एक साथ पूरा कर सकेगा। इससे पूरी प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।
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लीज ट्रांसफर और कन्वर्जन के लिए अलग एनडीसी की जरूरत खत्म, एक ही फॉर्म में पूरा होगा काम
