धर्मशाला के इको पार्क में 542 करोड़ खर्च बर्बाद:उगी पड़ीं बड़ी बड़ी झाडि़यां, जंग खा रहे झूले, मेयर बोले-बजट-स्टाफ की कमी से दिक्कत




हिमाचल प्रदेश की दूसरी राजधानी धर्मशाला को ‘स्मार्ट सिटी’ का दर्जा देने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। शहर में स्थानीय निवासियों, बुजुर्गों, बच्चों और पर्यटकों के सुकून के लिए बनाए गए इको पार्क आज घोर उपेक्षा का शिकार हैं। आलम यह है कि सावन के पवित्र महीने में पारंपरिक रूप से झूले झूलने की आस लगाए बैठीं युवतियां और महिलाएं पार्कों में फैली अव्यवस्था और झाड़ियों के कारण इस आनंद से वंचित हैं। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत 542 करोड़ रुपये के विशाल बजट से शहर के विभिन्न पार्कों का कायाकल्प किया गया था। यहाँ आधुनिक झूले, ओपन-एयर जिम उपकरण और आरामदायक बेंच लगाए गए थे। लेकिन लंबे समय से देखरेख और सफाई न होने के कारण पूरा परिसर जंगली घास और झाड़ियों में तब्दील हो चुका है। जहरीले जीव-जंतुओं के डर से स्थानीय लोगों ने पार्कों में जाना बंद कर दिया है, जिससे लाखों रुपये के उपकरण अब लावारिस पड़े धूल फांक रहे हैं। नगर निगम की बैठक में गूंजा बदहाली का मुद्दा हाल ही में आयोजित धर्मशाला नगर निगम की पहली बोर्ड बैठक में यह मामला जोर-शोर से उठा। वार्ड नंबर 14 के पार्षद अनोज बिष्ट (मिंटू) ने पार्कों की बदहाली और चरमराई सफाई व्यवस्था को लेकर निगम प्रशासन की कार्यशैली पर कड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने सावन माह का हवाला देते हुए पार्कों की तुरंत सफाई कराने की मांग की, जिसे अन्य पार्षदों का भी पुरजोर समर्थन मिला। चौतरफा दबाव के बाद प्रशासन ने गलियों और पार्कों की स्थिति में जल्द सुधार लाने का भरोसा दिया है। स्टाफ की कमी और बजट की अड़चन: मेयर पार्कों की इस दयनीय हालत पर धर्मशाला नगर निगम के मेयर शमशेर नैहरिया ने अपनी सफाई दी है: मेयर ने बताया कि उनके पद संभालने के बाद प्रत्येक वार्ड में दो-दो बेलदार तैनात किए गए हैं और झाड़ियों की कटाई शुरू कर दी गई है, हालांकि काम में कुछ समय लगेगा। उनका कहना है कि सफाई को लेकर कुछ समस्या है, जिसे दूर किया जा रहा है। क्या है समस्याएं कर्मचारियों का टोटा: उन्होंने माना कि नगर निगम में स्थायी स्टाफ की भारी कमी है और नया स्टाफ अभी उपलब्ध नहीं हो पाया है। बजट का इंतजार: फाइनेंस कमेटी का गठन हो चुका है। उसकी पहली बैठक होने के बाद ही यह तय हो पाएगा कि चालू वित्तीय वर्ष में रखरखाव और विकास कार्यों के लिए प्रति वार्ड कितना बजट आवंटित किया जाएगा।



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