![]()
नगर परिषद चुनाव में नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब चुनावी मुकाबले की तस्वीर साफ हो गई है। यह चुनाव केवल 60 पार्षद चुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि झुंझुनूं की स्थानीय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की साख की भी बड़ी परीक्षा बन गया है। झुंझुनूं नगर परिषद में फिलहाल कांग्रेस का बोर्ड है। ऐसे में कांग्रेस के सामने अपना गढ़ बचाने की चुनौती है, जबकि भाजपा इस बार सत्ता परिवर्तन का दावा कर रही है। चुनाव परिणाम यह भी संकेत देंगे कि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले जिले में किस दल की संगठनात्मक स्थिति अधिक मजबूत है। राजेन्द्र भाम्बू की रणनीति की असली परीक्षा भाजपा की ओर से नगर परिषद चुनाव में टिकट वितरण की पूरी कमान झुंझुनूं विधायक राजेन्द्र भाम्बू के हाथों में रही। पार्टी सूत्रों के अनुसार अधिकांश वार्डों में प्रत्याशी चयन उनकी राय से हुआ। भाजपा ने 60 में से 41 वार्डों में अपने अधिकृत प्रत्याशी उतारे हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम का सीधा असर विधायक की राजनीतिक साख पर पड़ेगा। हालांकि टिकट वितरण के दौरान भाजपा में असंतोष भी सामने आया। कई वार्डों में कार्यकर्ताओं ने टिकट चयन पर नाराजगी जताई। विधायक के दामाद मनु धनखड़ को टिकट दिए जाने को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं रहीं। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. कमल सैनी टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं और खुलकर बगावती तेवर दिखा रहे हैं। ऐसे में भाजपा को बागियों से होने वाले नुकसान पर भी नजर रहेगी। ओला के सामने बोर्ड बचाने की चुनौती कांग्रेस के लिए यह चुनाव मौजूदा नगर परिषद बोर्ड को बरकरार रखने की चुनौती है। पार्टी ने 60 में से 51 वार्डों में अपने प्रत्याशी उतारे हैं। टिकट वितरण और चुनावी रणनीति में सांसद बृजेन्द्र सिंह ओला की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। ऐसे में चुनाव परिणाम को उनकी राजनीतिक पकड़ और संगठन पर प्रभाव के रूप में भी देखा जाएगा। नगर परिषद में पिछले कार्यकाल में कांग्रेस का बोर्ड रहा है। इसलिए यदि कांग्रेस दोबारा बहुमत हासिल करती है तो इसे ओला के नेतृत्व की सफलता माना जाएगा। वहीं अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन होने पर पार्टी के भीतर टिकट वितरण और चुनावी रणनीति पर सवाल उठ सकते हैं। बागी और निर्दलीय भी बिगाड़ सकते हैं समीकरण दोनों दलों के कई असंतुष्ट नेता और कार्यकर्ता निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं। विशेष रूप से भाजपा में बगावत खुलकर सामने आई है। ऐसे में कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि निर्दलीय प्रत्याशी कई सीटों पर जीत-हार का गणित बदल सकते हैं। 2028 की राजनीति का भी माना जा रहा सेमीफाइनल नगर परिषद चुनाव के नतीजों को जिले की आगामी राजनीतिक दिशा तय करने वाला माना जा रहा है। भाजपा के लिए यह विधायक राजेन्द्र भाम्बू के नेतृत्व की परीक्षा है, जबकि कांग्रेस के लिए सांसद बृजेन्द्र ओला की संगठनात्मक ताकत का आकलन होगा। ऐसे में 60 वार्डों का यह चुनाव स्थानीय निकाय से आगे बढ़कर जिले की भविष्य की राजनीति का भी अहम संकेत देने वाला माना जा रहा है। कांग्रेस की राह में अपनों की चुनौती, वार्डों में बगावत से बढ़ी मुश्किल झुंझुनूं नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से ज्यादा अपनों की बगावत बन गई है। कई वार्डों में पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के सामने कांग्रेस से जुड़े नेता और पूर्व पार्षद ही निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय होता नजर आ रहा है। सबसे दिलचस्प मुकाबला वार्ड 38 में है। यहां कांग्रेस ने पूर्व नगर पालिका चेयरमैन और निवर्तमान सभापति के ससुर तैयब अली को प्रत्याशी बनाया है। उनके सामने कांग्रेस के जिला प्रवक्ता शहबाज फारूकी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, कांग्रेस के पूर्व पार्षद आजम भाटी ने भी अपनी पुत्रवधु को निर्दलीय मैदान में उतार दिया है। ऐसे में इस वार्ड में कांग्रेस समर्थित तीन चेहरे आमने-सामने होने से मुकाबला बेहद रोचक बन गया है। वोट बैंक बांटने की आशंका बढ़ी वहीं वार्ड 37 में भी कांग्रेस को बगावत का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी ने पूर्व पार्षद मुराद अली को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस के पूर्व पार्षद रियाज अली निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। इससे इस वार्ड में भी कांग्रेस का वोट बैंक बांटने की आशंका बढ़ गई है। कांग्रेस नेतृत्व के लिए इन दोनों वार्डों में बागियों को साधना बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
Source link
नगर परिषद चुनाव में सांसद और विधायक की साख-दांव पर:बीजेपी में भाम्बू ने अपनी पसंद के बांटे टिकट, कांग्रेस में ओला के नेतृत्व की परीक्षा
