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ब्लैकबोर्ड-रात को निकलती हूं तो पड़ोसी कहते हैं- धंधेबाज है:शराबी क्लाइंट बोला- आज रात मेरे साथ रुक जाओ; आमिर खान के लिए भी काम किया




रात के लगभग आठ बज चुके हैं। सड़कों पर अंधेरा है। एक स्विफ्ट डिजायर कार तेजी से मेरे पास आकर रुकी। गेट खुला तो देखा स्टीयरिंग और गियर पर चूड़ी से सजे एक महिला के हाथ हैं। ड्राइविंग सीट पर बैठी ये महिला प्रेग्नेंट है। मुझे देखते ही महिला हल्की सी मुस्कान के साथ बोली- ‘हैलो मैम! आज मैं आपकी ड्राइवर हूं, टीना।’ मैं मुस्कुराकर आगे वाली सीट पर ही बैठ गई। हरे रंग की यूनिफॉर्म पहने टीना की उम्र करीब 30 साल होगी। मेरे बैठते ही टीना बोलीं- ‘नाइट ड्यूटी में फीमेल क्लाइंट मिल जाए तो खुशी होती है।’ मैंने पूछा- ‘मेल क्लाइंट मिलें तो?’ टीना फौरन बोल पड़ीं- कई क्लाइंट तो बहुत अच्छे होते हैं। मुझे ड्राइविंग सीट पर देखकर खुश होते हैं। लेकिन अक्सर खराब लोग भी मिलते हैं। एक बार रात 12 बजे की बात है। मेल क्लाइंट की राइड आई। एक बार के बाहर उन्हें लेने पहुंची। उसने काफी शराब पी रखी थी। पीछे बैठकर शीशे से मुझे घूर रहा था। मैंने शीशे को दूसरी तरफ घुमाया, तो वो खिसककर दूसरी तरफ जा बैठा। फिर एकटक देखने लगा। मुझे घबराहट होने लगी, फिर भी राइड बीच में नहीं रोकी। उसे एक होटल तक ड्रॉप करना था। रात का वक्त था तो ज्यादा ट्रैफिक भी नहीं था। कुछ देर में होटल पहुंच गए। मैंने कहा- आपका डेस्टिनेशन आ गया, लेकिन वो कार से उतरा ही नहीं। मैंने फिर रिक्वेस्ट की, लेकिन वो कहने लगा- मेरे साथ होटल में चलो। आज रात मेरे साथ रुक जाओ। मैं बार-बार उसे उतरने को कहने लगी, लेकिन वो माना नहीं। लड़खड़ाती जुबान से कहता रहा कि आज रात तो तुम्हें मेरे साथ रुकना ही पड़ेगा। फिर मैंने कार का गेट खोला और उसका हाथ पकड़कर बाहर खींच लिया। उसकी हालत देखकर होटल वाले भी आ गए और उसे अंदर ले गए। मैं किसी तरह अपनी जान छुड़ाकर वहां से भागी। ऐसे लोगों की वजह से ही कैब कंपनी कार में एक इमरजेंसी सेफ्टी बटन लगवाती हैं। जिसे दबाने पर कंपनी को पता लग जाता है कि कोई मुसीबत है। बातों ही बातों में मैंने टीना से पूछा प्रेग्नेंसी में भी इतने घंटे टैक्सी चला रही हो, कोई दिक्कत तो नहीं होती? टीना ने कहा- क्यों नहीं होती मैडम, लेकिन क्या करें। घर भी तो चलाना है। इसके पहले जब पेट से थी तो कैब में ही मेरा बच्चा गिर गया था। पांचवां महीना था। जुड़वा बच्चे थे। उस दिन भी नाइट ड्यूटी थी। घर लौटने में कुछ ही घंटे बचे थे। सुबह पांच बजे एक कस्टमर को एयरपोर्ट पर छोड़ा। उसके बाद अचानक दर्द शुरू हो गया। कुछ ही मिनटों में ये दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया। ब्लीडिंग शुरू हो गई। पति को फोन करके एयरपोर्ट बुलाती तो अस्पताल पहुंचने में देर हो जाती। जैसे-तैसे हिम्मत करके खुद ही गाड़ी लेकर चल दी। दर्द के मारे आंखों के सामने बार-बार अंधेरा छाने लगा। ब्लीडिंग बढ़ती जा रही थी। करीब एक घंटे बाद हॉस्पिटल पहुंची। गेट पर गाड़ी रोककर जैसे ही उतरी, चारों तरफ खून फैल गया। आंखों के सामने मेरे बच्चे खून का लोथड़ा बनकर गिर गए। मैं वहीं बेहोश हो गई थी। होश आया तो अस्पताल के बेड पर थी। पति भी ड्यूटी से छुट्टी लेकर आ चुके थे। इसके बाद कई महीने लगे मुझे अपनी जिंदगी को पटरी में लाने के लिए। न काम में मन लगता था और न घर पर। ये बताते हुए टीना पेट में हाथ रखकर कहती हैं- ‘ऊपर वाले की मेहरबानी है मैम, इसबार सबकुछ ठीक है।’ मैंने पूछा दिल्ली में अब तक का सबसे अच्छा क्लाइंट कौन था, वो तुरंत बोल पड़ी- मैडम, आमिर खान, वो फिल्मों वाले। वो शूटिंग के लिए दिल्ली आए थे। दिवाली करीब थी। मुझे कंपनी ने बताया कि जितने दिन आमिर खान दिल्ली में रहेंगे, मैं ही उनकी ड्राइवर रहूंगी। सच कहूं तो मुझे यकीन नहीं हुआ। उन्हें लेने एयरपोर्ट पहुंची। जैसे ही वो आकर कार में बैठे मुझे भरोसा ही नहीं हुआ कि फिल्मों वाले आमिर खान हैं। मैं बार-बार पीछे पलटकर उन्हें देख रही थी। वो मुझे देखते ही बोले- अरे वाह! ड्राइविंग सीट पर आपको देखकर खुशी हुई। फिर उन्होंने मेरा नाम पूछा और हाल-चाल लिया। कुछ देर बाद उन्हें होटल ड्रॉप कर दिया। फिर अगले दिन उन्हें शूटिंग साइट पर ले गई। उस दिन पूरे रास्ते उन्होंने मेरे घरवालों और मेरी पढ़ाई-लिखाई के बारे में बात की। दोपहर में लंच के वक्त उन्होंने एक शख्स को भेजकर मुझे अंदर बुलाया। फिर अपने साथ लंच करवाया। वो जब तक दिल्ली में थे, हर दिन मुझे अपने साथ ही लंच करवाते थे। एक दिन उनकी शूटिंग नहीं थी। शायद रविवार था। उन्होंने पूछा- ‘टीना जी, हमारे साथ फिल्म देखने चलेंगी क्या?’ मैंने तुरंत हां कह दिया। उनके साथ करीब 8-10 लोग और थे। हम लोग साकेत के मॉल में फिल्म देखने गए थे। पांच दिन की शूटिंग के बाद जब वो वापस मुंबई गए तो दीवाली मनाने के लिए मुझे पांच हजार रुपए देकर गए थे। वो पांच दिन मेरे जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन थे। टीना को बीच में टोंकते हुए मैंने पूछा- आपने ड्राइविंग कैसे सीखी? कुछ सोचते हुए वो बोलीं- मेरा परिवार दिल्ली की झुग्गियों में रहता था। हम पांच भाई-बहन थे। मैं चौथे नंबर की थी। पापा बस ड्राइवर थे। एक दिन वे बस लेकर दिल्ली से बाहर गए थे। रास्ते में कुछ गुंडों ने उनकी बस को रोककर लूट लिया। सवारियों को बचाने के लिए पापा ने उनसे हाथापाई की। उन लोगों ने पापा के सिर पर लोहे की रॉड मार दी। उनकी मानसिक हालत बिगड़ गई। वो कई दिनों तक दिल्ली के शहादरा मेंटल अस्पताल में भर्ती रहे। ऐसे में घर की जिम्मेदारी मां पर आ गई। वो लोगों के घरों में बर्तन और झाड़ू पोछा करने लगीं। जब कई महीने तक पापा की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ तो उन्हें घर ले आए। लगभग दस साल लगे पापा को ठीक होने में। फिर उन्हें दोबारा ड्राइवर की नौकरी मिल गई। लेकिन मां ने उन्हें करने नहीं दी। इसी बीच मैं पैदा हुई। बचपन में जब औरतों को गाड़ी चलाते देखती तो बहुत अच्छा लगता था। बीच सड़क में खड़े होकर मैं उन्हें देखने लगती थी। घर की हालत तो ऐसी थी नहीं कि कभी कार चलाने का मौका मिले। पैसों की तंगी की वजह से दसवीं में पढ़ाई छोड़नी पड़ी। फिर मैंने सिलाई सीखी। एकबार मां ने मुझे ब्यूटी पार्लर का कोर्स करने भेजा। वहां एक संस्था का कैंप लगा था, जहां महिलाओं को ड्राइविंग सिखाई जा रही थी। इसके लिए वो लोग 2 हजार रुपए ले रहे थे और नौकरी का वादा भी किया। मेरे पास सिर्फ 500 रुपए थे। मैंने उनसे कहा- अभी 500 जमा कर लो, बाकि जब नौकरी लगेगी तब सैलरी से काट लेना। वो लोग मान गए। इस तरह से मैंने ड्राइविंग सीख ली। मां या फिर मेरे भाइयों को भी ड्राइविंग सीखने से कोई आपत्ति नहीं थी। पापा को इस बारे में कुछ पता नहीं था। छह महीने की ट्रेनिंग के बाद एक हाई कमिश्नर की बेटी की कार चलाने की नौकरी मिली। तब मैं 19 साल की थी। पहली बार जब ड्यूटी पर पहुंची तो कार चलाने में पांव कांप रहे थे। लेकिन वह मैडम अच्छी थी। रास्ते में कार के बारे में हर छोटी-छोटी बात मुझे बताती थीं। तब सैलरी 5 हजार रुपए महीना थी। करीब तीन साल मैंने वहां काम किया, फिर कैब कंपनी में काम करने लगी। एक बार मां का किसी पड़ोसी से झगड़ा हो गया। वो कहने लगा कि तुम्हारी बेटी तो रातों को गाड़ी चलाती है। क्या पता गाड़ी चलाने जाती है या कुछ और करने जाती है। हमें पता है कि तुम्हारी बेटी धंधा करने जाती है। तुम्हारी बेटी धंधेबाज है। हालांकि, घरवालों को गर्व था कि मैं लड़की होकर कार चला लेती हूं। एकबार मां रिश्तेदारी में गई थी। वो लोग कहने लगे कि तुम्हें शर्म नहीं आती, बेटी की कमाई खाते हो। कोई बेटी को इस तरह कमाने भेजता है। बेटी से टैक्सी चलवाता है क्या। मां घर आकर रोने लगीं, लेकिन मुझसे कभी ये नहीं कहा कि काम छोड़ दो। यहां तक कि जब शादी के लिए ससुराल वाले मुझे देखने आए थे, मां ने उनसे साफ कह दिया था कि मेरी बेटी ड्राइविंग नहीं छोड़ेगी। जब उन लोगों ने इसपर कोई आपत्ति नहीं जताई, तब मां ने रिश्ते के लिए हामी भरी। पति राजस्थान में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। टीना बात करते हुए टैक्सी चला रही थी, तभी बगल से एक बाइक वाला कुछ बुदबुदाते हुए निकल गया। मैं कुछ कहती उससे पहले ही टीना कहने लगी- ये सब कोई नई बात नहीं है मैडम। लोग जब ड्राइविंग सीट पर महिला को देखते हैं तो ताने मारते हुए चले जाते हैं। कहते हैं- अरे मैडम तुम्हें भी गाड़ी चलानी है क्या, घर में चूल्हा-चौका करो। रोटी सब्जी बनाओ। कई बार तो क्लाइंट भी पूछने लगते हैं कि मैडम आप अच्छे से गाड़ी चला लेंगी ना। कहीं भिड़ा तो नहीं देंगी ना। कई क्लाइंट तो महिला ड्राइवर देखकर राइड कैंसिल भी कर देते हैं। कहते है- मैडम छोड़ दो ये काम। ये आदमियों का पेशा है, औरतों का नहीं। जब शुरुआत में टैक्सी चलाती थी, तब पार्किंग में गाड़ी लगाना थोड़ा मुश्किल होता था। तब अक्सर ताने सुनने पड़ते थे। दूसरे ड्राइवर मजाक उड़ाते थे। कुछ मर्द ड्राइवर तो आज भी कह देते हैं- कहां हमारी रोजी रोटी छीनने लगी हो मैडम। घर पर रहो। अपना काम करो। रोटी बनाओ। अब उन्हें कौन बताए कि मैं घर के काम भी करती हूं और कैब भी चलाती हूं। जब नाइट ड्यूटी के बाद घर जाती हूं तो पहले घर के सारे काम निपटाती हूं। खाना, कपड़ा, बर्तन सब करती हूं। इस वजह से नींद भी नहीं हो पाती है। फिर भी लोग घर का काम करने के ताने देते हैं। टीना कुछ सोचते हुए कहती हैं- ये ताने तो कुछ भी नहीं मैडम जी, कई क्लाइंट तो गाली भी देते हैं। जब मैंने पहली बार किसी से गाली सुनी थी तो रातभर सो नहीं पाई थी। एक क्लाइंट को रेलवे स्टेशन ड्रॉप करना था। मैप से उनका एड्रेस नहीं मिल रहा था। फोन करके पूछा तो नाराज हो गए। कहने लगे कि आप घर का पता तो ढूंढ नहीं पा रही, टाइम पर स्टेशन कैसे पहुंचाएंगी। जैसे-तैसे मैं उनके घर पहुंची। वो पूरे रास्ते मुझे चिल्लाते रहे कि आपकी वजह से मेरी ट्रेन छूट जाएगी। जब स्टेशन पहुंचे, तब भी उन्होंने गुस्से में गाड़ी का गेट पटक दिया। गाली देते हुए बोले- ‘जब कुछ आता नहीं तो ड्राइवर क्यों बन गई हो। घर के काम करो। ये सब औरतों के बस की बात नहीं है।’ अपनी एक खतरनाक राइड का जिक्र करते हुए टीना बताती हैं कि एक बार रात दो बजे करोल बाग से धौलाकुंआ होते हुए एयरपोर्ट जाना था। ये जंगल वाला सुनसान रास्ता है। तेज बारिश भी हो रही थी। इतना गहरा अंधेरा था कि गाड़ी की लाइट चालू होने के बाद भी मुश्किल से कुछ दिख रहा था। जाते वक्त तो क्लाइंट साथ में था। लौटते वक्त मेरी हालत खराब हो गई। मेरी दूर की बहन भी टैक्सी चलाती है। उस दिन वो भी क्लाइंट को लेकर इसी रास्ते से एयरपोर्ट जा रही थी। मैंने उसको कॉल किया और हम दोनों अलग-अलग टैक्सी में साथ में निकले। बीच रास्ते में वो टैक्सी रोककर कहने लगी कि उसकी कार में कोई चुड़ैल आ गई है। अब वो गाड़ी नहीं चला पाएगी। मैंने जैसे-तैसे उसको समझाया और किसी तरह बड़ी मुश्किल से हम उस दिन लौट पाए। नोट- टीना बदला हुआ नाम है। ———————————– ब्लैकबोर्ड की ये कहानियां भी पढ़ें… 1- ब्लैकबोर्ड-8 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