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भारतीय भाषाओं के संरक्षण-संवर्धन पर अंतरराष्ट्रीय विमर्श संपन्न:तकनीक व रोजगार से जोड़ने पर जोर, अश्विनी केगांवकर बोले- भाषा को सुरक्षित रखने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी




भारत और यूरोप में भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और तकनीकी विकास की संभावनाओं पर चर्चा के लिए शनिवार को ‘भारतीय भाषाओं का भविष्य एक व्यावहारिक दृष्टिकोण’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय आभासी विमर्श आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में बियॉन्ड ब्रैकेट्स, नागरी लिपि परिषद दिल्ली, नागरी लिपि परिषद यूरोपीय इकाई और साझा संसार फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस विमर्श में विशेषज्ञों ने भारतीय भाषाओं को नई पीढ़ी से जोड़ने, विलुप्तप्राय लिपियों के पुनर्जीवन, विदेशों में भाषा शिक्षण और भारतीय भाषाओं को रोजगारपरक बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया। म्यूनिख, फ्रैंकफर्ट, मिलान, एम्स्टर्डम, दिल्ली, गाजियाबाद, पटना, वलसाड, बेंगलुरु और चेन्नई सहित विभिन्न शहरों से जुड़े प्रतिभागियों ने भारतीय भाषाओं, विशेषकर नागरी लिपि आधारित भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और भविष्य की संभावनाओं पर विचार साझा किए। विमर्श का मुख्य उद्देश्य भारत और यूरोप में व्यक्तिगत एवं संस्थागत स्तर पर हो रहे प्रयासों की समीक्षा करना तथा भारतीय भाषाओं को आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक उपयोगी और प्रासंगिक बनाने के व्यावहारिक उपाय तलाशना था। डॉ. अजीत बोले- भाषा संरक्षण की शुरुआत घर से होनी चाहिए गेटे एवं माइन्ज विश्वविद्यालय में आधुनिक इंडोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. अजीत सिंह सिकंद ने आयोजन को सार्थक और प्रासंगिक बताते हुए कहा कि भाषाओं को सहेजने की शुरुआत स्कूल-कॉलेज से नहीं, बल्कि अपने घरों से होनी चाहिए। गुरु नानक देव जी के एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु नानक जी ने ‘शब्द’ को अपना गुरु बताया था। उनके अनुसार, शब्द गुरु है और लिपि उसका परिधान। शब्द और लिपि के समन्वय से ही भाषा का व्यापक स्वरूप विकसित होता है। उन्होंने यूरोपीय देशों में अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान और लगाव को भारत के लिए सीख बताते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं को भी आधिकारिक स्तर पर उचित मान्यता और प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए। भाषा के भविष्य के लिए उसके इतिहास को समझना जरूरी मिलान से जुड़ी भाषा, संस्कृति और शिक्षा की विदुषी उर्मिला चक्रवर्ती ने हिंदी, बांग्ला, इटालियन और अंग्रेजी भाषाओं में अपने व्यापक अनुभवों और कार्यों को साझा किया। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा के भविष्य की दिशा तय करने के लिए उसके अतीत को समझना आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अतीत में भाषा को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए किए गए प्रयासों और प्रयोगों का अध्ययन करके उन्हें वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया जा सकता है। उन्होंने हिंदी को आधुनिक और उपयोगी भाषा के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता बताई, ताकि नई पीढ़ी उसकी प्रासंगिकता और उपयोगिता को समझ सके। तिरहुता और कैथी लिपि के संरक्षण में तकनीक जरूरी राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट), पटना के सहायक प्रोफेसर जयंत कुमार ने बिहार की विलुप्तप्राय लिपियों तिरहुता और कैथी के पुनर्स्थापन के प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन लिपियों को आधुनिक प्रौद्योगिकी से जोड़कर ही उनका भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है। उन्होंने कंप्यूटर इनपुट उपकरणों, की-बोर्ड और टाइपफेस के माध्यम से इन लिपियों को डिजिटल मंच पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता बताई। जयंत कुमार इन लिपियों के तकनीकी विकास और पुनर्जीवन के लिए विभिन्न संस्थानों के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं। विदेशों में भारतीय भाषाओं की शिक्षा के लिए एकसमान पाठ्यक्रम जरूरी फ्रैंकफर्ट से जुड़ीं कानूनी विशेषज्ञ एवं मराठी भाषा की प्रतिनिधि शिल्पा गडमडे मुले ने जर्मनी में मराठी भाषा की वर्तमान स्थिति पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि सामूहिक प्रयासों से भाषा को सुरक्षित और संरक्षित रखने के साथ उसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण भी संभव है। उन्होंने विदेशों में रह रही नई पीढ़ी को भारतीय भाषाएं सिखाने के लिए एक समान पाठ्यक्रम विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। फ्रैंकफर्ट के भाषा-सेवी एवं इंजीनियर रुद्रदेव देवुलपल्ली ने दक्षिण भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच सेतु बनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भाषा संरक्षण की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। साथ ही, यूरोप के सांस्कृतिक और सार्वजनिक मंचों पर भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने की अपील की। उन्होंने भारतीय भाषाओं की पुस्तकों को उपहार के रूप में देने जैसे सरल प्रयासों को भाषा के प्रचार-प्रसार का प्रभावी माध्यम बताया। पुस्तकों के माध्यम से अगली पीढ़ी के लिए तैयार हो रहा दस्तावेज नागरी लिपि परिषद के यूरोपीय महाद्वीप के समन्वयक रामा तवक जी ने विमर्श को समृद्ध और सार्थक बताते हुए आयोजक दीपा दिनेशनील को बधाई दी। उन्होंने सभी वक्ताओं के प्रति उनके विचारों और अनुभवों को साझा करने के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने विमर्श में उठे विषयों से संबंधित अपनी पुस्तकों की जानकारी देते हुए कहा कि ऐसे प्रयासों को पुस्तक रूप में संरक्षित करना आवश्यक है, ताकि भावी पीढ़ी इन अनुभवों और विचारों से लाभान्वित हो सके। भारतीय भाषाओं को रोजगारपरक बनाना जरूरी कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नागरी लिपि परिषद, दिल्ली के महामंत्री हरिसिंह पाल ने विषय की नवीनता और व्यापकता की सराहना की। उन्होंने कहा कि परिषद भाषा और लिपि आधारित प्रयासों को प्रोत्साहित करती है और यूरोप में भारतीय भाषाओं के विकास के लिए हो रहे कार्यों से उत्साहित है। उन्होंने भविष्य में यूरोप में सहयोग और विस्तार की नई संभावनाओं का भी उल्लेख किया। कार्यक्रम में हिंदी के वरिष्ठ सेवक विजय कुमार मल्होत्रा की उपस्थिति को आयोजकों ने महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने विमर्श में उठाए गए प्रश्नों और सुझावों पर ठोस कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे संवादों से भाषा को नई दिशा मिलती है और नए प्रयोगों के अवसर पैदा होते हैं। भारतीय भाषाओं को रोजगारपरक बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने हिंदी शिक्षण के विभिन्न प्रयोगों की चर्चा की। उन्होंने बताया कि बॉलीवुड के गीतों के माध्यम से हिंदी सिखाना रोचक और प्रभावी तरीका हो सकता है, जिससे भाषा सीखने के प्रति नई पीढ़ी की रुचि बढ़ाई जा सकती है। सामूहिक प्रयासों से ही सुरक्षित होगा भारतीय भाषाओं का भविष्य कार्यक्रम के समापन पर नीदरलैंड से नागरी लिपि परिषद की प्रभारी अश्विनी केगांवकर ने सभी प्रतिभागियों और वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विमर्श को अत्यंत सफल और सार्थक बताया। विमर्श में सामने आए विचारों ने स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए पारिवारिक उपयोग, आधुनिक तकनीक, व्यवस्थित शिक्षण, संस्थागत सहयोग, सांस्कृतिक मंचों पर प्रयोग और रोजगार से जुड़ी संभावनाओं पर एक साथ काम करने की आवश्यकता है। यूरोप और भारत में भारतीय भाषाओं के विकास एवं संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों को प्रतिभागियों ने उत्साहजनक बताया। कार्यक्रम का समग्र संदेश यही रहा कि भारतीय भाषाओं का भविष्य सुरक्षित करने के लिए उन्हें केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में संरक्षित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें शिक्षा, तकनीक, रोजगार और दैनिक जीवन का सक्रिय हिस्सा बनाना भी जरूरी है।



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