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रसरंग में माथोलॉजी:बौद्ध विहारों से शिव गुफाओं तक, ऐसा है उत्तर मुंबई का इतिहास




अगले तीन लेखों में हम मुंबई की भूमि पर प्राचीन काल से विभिन्न धर्मों के प्रभाव के बारे में जानेंगे। शुरुआत हिंदू धर्म से करते हैं। शिव के विवाह और अंधक तथा रावण जैसे राक्षसों के साथ उनके युद्ध को दर्शाने वाली प्रारंभिक प्रतिमाएं लगभग 1500 वर्ष पहले उत्तर मुंबई की जोगेश्वरी गुफाओं और दक्षिण मुंबई के निकट स्थित एलिफेंटा द्वीप की गुफाओं में तराशी गई थीं। इससे स्पष्ट होता है कि लगभग छठी सदी में इस क्षेत्र में पाशुपत संप्रदाय का प्रभाव था। संभव है कि उत्तरी कोंकण क्षेत्र पर शासन करने वाला कलचुरि राजवंश, जो दक्षिणी चालुक्य राजवंश का प्रतिद्वंद्वी था, इस संप्रदाय का संरक्षक रहा हो। मुंबई में मौर्य काल से जनजातीय, बौद्ध, जैन, हिंदू, मुसलमान और ईसाई प्रभाव रहे हैं। इसे समझने के लिए पहले मुंबई की भौगोलिक संरचना को समझना होगा। मुंबई क्षेत्र को मोटे तौर पर तीन भागों में बांटा जा सकता है – एक, उत्तर में बहने वाली उल्हास नदी। दूसरा, उसके नीचे की तरफ स्थित सैलसेट द्वीप। तीसरा, सैलसेट के नीचे स्थित दक्षिण मुंबई का द्वीप। यहां पहले सात अलग-अलग द्वीप हुआ करते थे, जिन्हें ब्रिटिश काल में मिलाकर एक द्वीप बना दिया गया। इस प्रकार, सैलसेट द्वीप और मुख्य भूमि के बीच उल्हास नदी बहती है। यह नदी दोनों सिरों पर अरब सागर से मिलती है। पश्चिमी छोर पर वसई की खाड़ी है, जबकि पूर्वी छोर पर ठाणे की खाड़ी। नदी के उत्तर में वसई, विरार और नालासोपारा उपनगर स्थित हैं। जातक कथाओं और महाभारत में उल्लिखित प्राचीन सोपारा बंदरगाह यहीं था। सैलसेट के उत्तर-पूर्वी छोर पर ठाणे है, जो दोनों खाड़ियों से घिरा हुआ है। ठाणे के पूर्व में, खाड़ी के पार मुख्य भूमि पर कल्याण नामक उपनगर स्थित है। प्राचीन ग्रंथों में कल्याण का भी उल्लेख मिलता है। यहीं से अपरांत क्षेत्र आरंभ होता था। इसके उत्तर में लाट देश अर्थात दक्षिण गुजरात का क्षेत्र और दक्षिण में कोंकण अर्थात महाराष्ट्र का क्षेत्र था। इसके निकट घोड़बंदर या घोड़े-बंदर स्थित है। फारस और अरब से आने वाले घोड़े इसी बंदरगाह के माध्यम से दक्कन तक पहुंचाए जाते थे। बौद्ध आख्यानों के अनुसार, पूर्ण मैत्रायणीपुत्र नामक बौद्ध व्यापारी ने सोपारा में एक भव्य विहार बनवाया था। लगभग 2,500 वर्ष पहले स्वयं बुद्ध के इस विहार में आने का उल्लेख मिलता है। इसके लगभग 200 वर्ष बाद सम्राट अशोक ने यहां एक स्तूप बनवाया। उन्होंने अपनी प्रजा को संदेश दिया कि धार्मिक अनुष्ठान करने की अपेक्षा दूसरों का सम्मान करने से अधिक पुण्य प्राप्त होता है। कुछ समय बाद सातवाहन राजाओं ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया। पश्चिमी समुद्रतट पर अधिकार बनाए रखने के लिए सातवाहनों और गुजरात के क्षत्रप राजाओं के बीच अक्सर संघर्ष होता था। सातवाहनों ने सह्याद्रि पर्वत के उस पार से बंदरगाहों तक आने वाले व्यापारियों के ठहरने के लिए अनेक गुफाओं का निर्माण कराया था। आज हम इन गुफाओं को लगभग भूल चुके हैं, जबकि इनमें से कुछ गुफाओं में स्तूप हैं तो कुछ में बुद्ध की प्रतिमाएं मिली हैं। कुछ गुफाओं में बाद के समय में देवी के मंदिर स्थापित किए गए, जैसे वसई के उत्तर में स्थित विरार में जीवदानी माता मंदिर। जीवदानी माता का संबंध एकवीरा देवी से माना जाता है, जिनकी यहां पूजा होती है और जिनसे विरार को नाम मिला।
हिंदू आख्यानों के अनुसार, क्षत्रियों के संहार के पश्चात परशुराम ने इसी क्षेत्र में आकर समुद्र में अपनी कुल्हाड़ी फेंकी थी और जिससे पश्चिमी समुद्रतट का निर्माण हुआ था। बाद में शंकराचार्य और उनके अनुयायी भी इस क्षेत्र में आए और यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ बन गया। लगभग दसवीं सदी में शिलाहार राजाओं ने नालासोपारा में चक्रेश्वर महादेव मंदिर और उल्हासनगर के निकट अंबरनाथ मंदिर का निर्माण कराया। आज इन मंदिरों के केवल खंडहर शेष हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि ये मंदिर पुर्तगालियों द्वारा नष्ट किए गए या श्रद्धालुओं की संख्या घटने के कारण उपेक्षित हो गए या फिर स्थानीय लोगों ने मूर्तियों को तोड़फोड़ से बचाने के लिए उन्हें कहीं छिपा दिया। अब नालासोपारा में नया शिव चक्रेश्वर मंदिर बनाया गया है। यहां मिली मूर्तियों में विभिन्न देवियों की प्रतिमाएं, सात घोड़ों के रथ पर सवार सूर्यदेव की प्रतिमा, महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा, चार भुजाओं वाले विष्णु की प्रतिमा तथा तीन सिर और चार भुजाओं वाले ब्रह्मा (या विश्वकर्मा) की भव्य प्रतिमा शामिल हैं। जैन धर्म के अनुयायी प्रायः वहीं बसते थे, जहां व्यापारिक गतिविधियां होती थीं। उनका मानना है कि चक्रेश्वर नाम की उत्पत्ति चक्रेश्वरी नामक जैन यक्षी से हुई है। चक्रेश्वरी अपने सिर पर जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की प्रतिमा धारण करती हैं। दूसरी ओर, कई हिंदू ऋषभदेव को शिव समझ बैठते हैं, क्योंकि दोनों जटाधारी हैं और दोनों बैल से जुड़े हैं।
अगले सप्ताह के लेख में हम मुंबई के देवताओं से अपना परिचय आगे बढ़ाएंगे।



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