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कुछ हजार वर्ष पहले आर्य हिमालय के उत्तर में स्थित क्षेत्र से भारत आए। उस क्षेत्र तक मानसूनी वर्षा नहीं पहुंचती थी। इसलिए भारत आने से पहले वे वर्ष को अयनांत और विषुव के आधार पर चार भागों में विभाजित करते थे। वैदिक स्तोत्रों में उल्लेख मिलता है कि शीत ऋतु में लंबे समय तक सूर्य क्षितिज के ऊपर दिखाई नहीं देता था। अन्य स्तोत्रों में उषस् नामक देवी के रूप में भोर को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। उषस् वसंत ऋतु में आकाश में दिखाई देती थीं, लेकिन सूर्योदय केवल ग्रीष्म ऋतु में होने देती थीं।
उत्तर भारत में आर्यों ने पहली बार मानसूनी वर्षा का अनुभव किया। इस कारण उनके लिए वर्षा, सूर्य और भोर से भी अधिक महत्वपूर्ण बन गई। अब वे वर्ष को तीन भागों में बांटने लगे – वर्षा ऋतु से पहले वसंत और ग्रीष्म तथा वर्षा ऋतु के बाद शरद और शीत ऋतु। इस क्षेत्र के लिए वर्षा इतनी महत्वपूर्ण थी कि साल के लिए ‘वर्ष’ शब्द भी वर्षा से ही उत्पन्न हुआ। वर्षा के देवता पर्जन्य की स्तुति में सूक्त रचे गए। वैदिक काल के ब्राह्मण साहित्य में चातुर्मास के अनुष्ठानों का उल्लेख मिलता है। ये अनुष्ठान प्रत्येक चार महीने पर किए जाते थे – वसंत ऋतु की शुरुआत में, वर्षा ऋतु के आरंभ में और उसके अंत में।
कहा जाता है कि एक समय ऐसा था, जब देवताओं, असुरों, मनुष्यों और यहां तक कि पितरों को भी अनुष्ठान करने पड़ते थे। अनुष्ठान करने पर देवताओं को शुक्ल पक्ष के लिए पर्याप्त खाद्य प्राप्त होता था। पितरों को कृष्ण पक्ष के लिए पर्याप्त खाद्य मिलता था। मनुष्यों को अनुष्ठान करके केवल एक दिन के लिए पर्याप्त खाद्य प्राप्त होता था। लेकिन असुर इतने चालाक थे कि वे केवल एक अनुष्ठान से पूरे वर्ष के लिए खाद्य प्राप्त कर लेते थे। यह जानकर देवता चिंतित हो गए कि एक ही अनुष्ठान के बाद असुरों के पास उन्हें परेशान करने के लिए बहुत समय बच जाता है। इसे रोकने के लिए देवताओं ने हर चार महीने में अनुष्ठान करना शुरू किया, ताकि असुरों के लिए खाद्य कम पड़ जाए। इस प्रकार असुरों को खाद्य से वंचित कर वश में किया गया। बाद में मनुष्यों को भी ऐसे ही अनुष्ठान करने के लिए प्रेरित किया गया, ताकि वे अपने शत्रुओं को वश में रख सकें।
किंतु आज हिंदू समुदाय इन अनुष्ठानों को लगभग भूल चुका है। इनका उल्लेख शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय ब्राह्मण में मिलता है, जिनकी रचना लगभग 2500 वर्ष पहले हुई थी। आज वर्षा ऋतु की चर्चा प्रायः विष्णु के चार महीने के शयन तक सीमित रह गई है। उनकी यह निद्रा ग्रीष्म अयनांत से आरंभ होकर शरद विषुव के समय समाप्त होती है। यही दो तिथियां शयनी एकादशी और प्रबोधिनी एकादशी कहलाती हैं। लोग सोचते हैं कि इस अवधि में विश्व की रक्षा कौन करता है। देवी से जुड़े आख्यान यहीं से उभरते हैं। विष्णु की अनुपस्थिति में उनकी बहन योगमाया विश्व की रक्षा करती हैं।
भैंसों के विपरीत गायें वर्षा ऋतु में गीली धरती पर चलना पसंद नहीं करतीं। वे एक स्थान पर स्थिर खड़ी रहती हैं। इसलिए आर्य भी वर्षा ऋतु में एक जगह पर रुकने के लिए विवश हुए। साथ ही, चातुर्मास के दौरान वेदों में वर्णित तीन प्रकार की अग्नियों को प्रज्ज्वलित रख पाना लगभग असंभव था। इसलिए हर चार महीने बाद अनुष्ठान करने की परंपरा संभवतः इसी कारण विकसित हुई। चातुर्मास के दौरान बौद्ध भिक्षु और जैन मुनि भी एक स्थान पर ठहरते थे। लोग घरों में रहकर उन ज्ञानी पुरुषों के प्रवचन सुनते थे, जो सामान्यतः एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं ठहरते थे।
मानसूनी हवाओं ने भारत के समुद्री व्यापार को भी आकार दिया। व्यापारी ग्रीष्म ऋतु की हवाओं के सहारे भारत आते थे और शीत ऋतु में हवाओं की दिशा बदलने पर उन्हीं की मदद से वापस लौट जाते थे। आजकल वर्षा ऋतु में हमारे शहरों में पानी भर जाता है और नाले उफनने लगते हैं। फिर भी हम अच्छी वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि बारिश की कमी का सीधा असर फसलों पर पड़ता है और परिणामस्वरूप पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। इस प्रकार भारत की अर्थव्यवस्था, राजनीति, आध्यात्मिकता, अनुष्ठानों और उत्सवों का पूरा चक्र वर्षा ऋतु के इन चार महीनों से गहरे और अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।
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