पंजाब विधानसभा में मंत्रियों द्वारा सदन में दिए गए आश्वासनों की जमीनी स्थिति ने विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। सरकारी आश्वासन संबंधी समितियों की 51वीं, 52वीं, 53वीं और 54वीं रिपोर्टों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें कार्रवाई लंबित रही। समय पर प्रगति रिपोर्ट नहीं भेजने से लेकर फाइलों के दूसरे विभागों में अटके रहने तक, समितियों ने कई मामलों में विभागों से जवाब तलब किया है। इन चार रिपोर्टों में 800 से अधिक आश्वासनों की समीक्षा की गई। कई मामलों में समिति ने विभागों को निर्देश देकर लंबित कार्रवाई आगे बढ़ाने को कहा, जबकि वर्षों से संतोषजनक कार्रवाई न होने और समय बीत जाने के कारण कुछ आश्वासनों को ड्रॉप भी करना पड़ा। स्थिति यह रही कि कुछ मामलों में संबंधित विभागों के पास मूल आश्वासन की प्रति तक उपलब्ध नहीं थी और उन्हें इसके लिए विधानसभा सचिवालय से जानकारी लेनी पड़ी। जानिए, क्या होती है ‘सरकारी आश्वासन समिति’ और यह कैसे करती है काम सदन का विशेषाधिकार: सदन में मंत्री जब किसी प्रश्न या चर्चा पर कोई वादा करते हैं, तो वह केवल बयान नहीं बल्कि सदन के प्रति औपचारिक प्रतिबद्धता होती है।{कमेटी की भूमिका: यह समिति जांचती है कि मंत्री द्वारा दिए वादे तय समयसीमा में पूरे हुए या नहीं। {ड्रॉप होने का मतलब: जब किसी प्रोजेक्ट की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है या विभाग वर्षों तक उस पर कोई ठोस कदम नहीं उठा पाता, तो समिति मजबूरी में उस आश्वासन को रिकॉर्ड से निरस्त कर देती है, जिससे जनता का सीधा नुकसान होता है। 52वीं रिपोर्ट में 231 आश्वासनों की जांच चारों रिपोर्टों के अनुसार, हर साल अलग-अलग सत्रों में मंत्रियों द्वारा सैकड़ों आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन प्रशासनिक अमले के आपसी पत्राचार और जवाबदेही से बचने के कारण लगभग 40% मामले उलझे रहते हैं। सभापति सरदार जगरूप सिंह गिल द्वारा 6 मार्च 2024 को सदन में पेश 52वीं रिपोर्ट में बजट सत्र 2017 से 2023 तक के 231 आश्वासनों की पड़ताल की गई। इसमें स्वास्थ्य, जल संसाधन, परिवहन और पर्यटन विभाग से जुड़े दर्जनों मामलों में कड़ी चेतावनी देकर जवाब तलब किया गया। कमेटियों ने सख्त लहजे में निर्देश दिए हैं कि भविष्य में कोई भी मंत्री सदन में बिना पूरी तैयारी और जमीनी होमवर्क के आश्वासन न दे। इसके अलावा, हर आश्वासन की प्रगति रिपोर्ट 3 महीने के भीतर भेजना अनिवार्य किया गया है। यदि कोई विभाग फाइल दूसरे विभाग को ट्रांसफर करता है, तो इसकी सूचना तत्काल विधानसभा सचिवालय को देनी होगी। बयानबाजी पर रोक, हर 3 महीने में मांगी रिपोर्ट पशुपालन एवं स्वास्थ्य: शुतराणा की वेटरनरी डिस्पेंसरियों में खाली पद और अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के आश्वासन सालों-साल फाइलों में कैद रहे।{तकनीकी शिक्षा व उद्योग: मल्लोद में ITI शुरू करने और बिना पूरी संबद्धता (एफिलिएशन) के कोर्स चलाने के मामलों में विभाग ने समिति को गुमराह करने का प्रयास किया।{राजस्व एवं ग्रामीण विकास: मल्लांवाला सब-तहसील कॉम्प्लेक्स के लिए जमीन ट्रांसफर और मनरेगा के तहत छोटे किसानों के हितों से जुड़े मामले कागजों में उलझे रहे।{पीडब्ल्यूडी एवं स्थानीय निकाय: शहरी ढांचे, सड़कों की मरम्मत और पार्कों के रखरखाव में देरी से प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ी, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।
Source link
विधानसभा में मंत्रियों के दिए 40 फीसदी आश्वासन फाइलों में अटके
