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कलश स्थापना के साथ ही शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। आज नवरात्र के दूसरे दिन स्वाति नक्षत्र और जयद् योग में माता ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी। हरे रंग का वस्त्र, गुलाल, पत्र, फल आदि से पूजन होगा। देवी को पंचामृत से स्नान और भोग में दूध से निर्मित वस्तु तथा मिश्री अर्पण होगा। मान्यता है कि देवी माता अपने शरणागत की हमेशा रक्षा व कल्याण करती हैं। मां ब्रह्मचारिणी को सरल, शांत और सौम्य का प्रतीक माना जाता है आचार्य राकेश झा ने बताया कि ब्रह्म का अर्थ है तपस्या। चारिणी का मतलब है आचरण करने वाली देवी। इस माता के हाथ में अक्ष माला और कमंडल होता है। माता ब्रह्मचारिणी की पूजा से ज्ञान, सदाचार, लगन, एकाग्रता व संयम रखने की शक्ति प्राप्त होती है। श्रद्धालु अपने कर्म पथ से नहीं भटकता है तथा दीर्घायु होता है। कलियुग में समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाली माता दुर्गा अपने भक्तों का दुःख, दरिद्रता, भय, रोग का नाश तथा निर्भयता, सुख, ऐश्वर्य, यश, कामना व सिद्धि प्रदान करती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में फूल लेकर उनका ध्यान करें और प्रार्थना करें। इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल, अक्षत, कुमकुम, सिंदूर अर्पित करें। देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं। इसके अलावा कमल का फूल भी देवी मां को चढ़ाए और फिर प्रार्थना करें। माता को शक्कर है अति प्रिय ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप अत्यंत भव्य है। यह सफेद साड़ी धारण किए हैं। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है। देवी ब्रह्मचारिणी को चीनी और शक्कर प्रिय है। इसलिए मां को भोग में चीनी, शक्कर और पंचामृत का भोग लगाएं। मां ब्रह्मचारिणी को दूध और दूध से बने व्यंजन भी अति प्रिय हैं, इसलिए इसका भोग लगाएं। इस भूख से देवी ब्रह्मचारिणी प्रसन्न हो जाएंगी।
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शारदीय नवरात्र का आज दूसरा दिन:मां ब्रह्मचारिणी की होगी पूजा, स्वाति नक्षत्र और जयद् योग का बन रहा संयोग
