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हाईकोर्ट ने महिला की 3 अर्जियां खारिज कीं:₹25 हजार का जुर्माना, अदालत- बेवजह याचिकाएं दाखिल कर न्यायिक प्रक्रिया में डाल रही बाधा




पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मामले में लगातार आवेदन दाखिल कर न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने पर नवजोत लहल की तीनों आपराधिक विविध (क्रिमिनल मिसलेनियस) अर्जियां खारिज कर दीं। अदालत ने उनके खिलाफ 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह राशि दो महीने के भीतर पीजीआई चंडीगढ़ के पुअर पेशेंट वेलफेयर फंड में जमा कराने के आदेश दिए गए हैं। यदि तय समय में राशि जमा नहीं की गई तो इसे भू-राजस्व की बकाया राशि की तरह वसूला जाएगा। न्यायमूर्ति एन.एस. शेखावत ने यह आदेश उस मामले में दिया, जिसमें पुष्पिंदर कौर ने 2018 में दर्ज धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और साजिश के मामले में अग्रिम जमानत की याचिका दायर की थी। अदालत ने 23 फरवरी 2026 को उन्हें अग्रिम जमानत दे दी थी। जमानत याचिका में पक्षकार नहीं थीं अदालत ने अपने आदेश में कहा कि नवजोत लहल इस जमानत याचिका की पक्षकार नहीं थीं, इसलिए उन्हें इस मामले में आवेदन दाखिल करने का कानूनी अधिकार नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने बार-बार अलग-अलग अर्जियां दाखिल कीं। अदालत के अनुसार इन अर्जियों का मुख्य उद्देश्य मामले की सुनवाई को लंबा खींचना था। इन आवेदनों के कारण अग्रिम जमानत याचिका का फैसला होने में कई महीनों की देरी हुई। हाईकोर्ट ने बताया कि आखिरकार 23 फरवरी 2026 को पुष्पिंदर कौर की अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला सुनाया गया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा था कि पुलिस चार्जशीट दाखिल कर चुकी है, मामला दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित है और आरोपी लंबे समय से अदालत के अंतरिम आदेशों का पालन करते हुए जांच में सहयोग कर रही थीं। इसलिए उनकी हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं थी और उन्हें अग्रिम जमानत दे दी गई। अदालत ने कहा कि जमानत याचिका का फैसला होने के बाद मामला समाप्त हो चुका है। ऐसे में उसी याचिका में बाद में दायर की गई किसी भी नई अर्जी पर सुनवाई करने या नया आदेश देने का अधिकार अदालत के पास नहीं बचता। इसके बावजूद नवजोत लहल ने तीन और आवेदन दाखिल कर दिए, जिन्हें अदालत ने पूरी तरह निराधार और न्यायिक समय की बर्बादी बताते हुए खारिज कर दिया। भाषा और आरोपों पर अदालत की नाराजगी हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक द्वारा दायर अर्जियों में इस्तेमाल की गई भाषा और लगाए गए आरोप निराधार, आपत्तिजनक और अदालत की अवमानना की श्रेणी में आने वाले हैं। हालांकि, अदालत ने यह कहते हुए अवमानना की कार्रवाई शुरू नहीं की कि आवेदक महिला हैं और भविष्य में अपने व्यवहार में सुधार करेंगी। साथ ही उन्हें चेतावनी दी गई कि आगे किसी भी अदालत में इस तरह की निरर्थक याचिकाएं दाखिल न करें। अदालत ने यह भी कहा कि जानकारी मिली है कि आवेदक ट्रायल कोर्ट में भी इसी तरह की अर्जियां दाखिल करती रही हैं और न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें करने की भी आदी हैं। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह किसी भी प्रकार के दबाव से प्रभावित हुए बिना, कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष तरीके से मुकदमे की सुनवाई जारी रखे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला अपने आदेश में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अजय कुमार पांडे बनाम अज्ञात (1998) फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालयों की गरिमा बनाए रखना और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने वाले कृत्यों पर सख्ती से कार्रवाई करना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि निराधार आरोपों और बेबुनियाद आवेदनों के जरिए न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।



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