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ब्लैकबोर्ड-विकास जिंदा होते तो मैं उन्हें थप्पड़ मारती:बच्चे बाप का नाम तक नहीं सुनना चाहते, डोरबेल बजते ही छिप जाते हैं




ब्लैकबोर्ड में कहानी- 8 पुलिसवालों की हत्या के बाद एनकाउंटर में मारे गए गैंगस्टर विकास दुबे की पत्नी रिचा दुबे की। आज वो बच्चों के साथ दुनिया की नजरों से छिपते-छिपाते जिंदगी जी रही हैं… साल 2020, 2-3 जुलाई की दरमियानी रात। मैं अपने छोटे बेटे के साथ लखनऊ वाले घर पर सो रही थी। बड़ा बेटा उन दिनों छुट्टी पर मॉस्को से इंडिया आया हुआ था और अपनी चाची के घर पर था। रात 2 बजे अचानक फोन बजा। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से घबराई हुई आवाज आई- ‘रिचा, तुम बच्चों को लेकर कहीं चली जाओ। जितना जल्दी हो सके घर छोड़ दो।’ वो आवाज मेरे पति विकास दुबे की थी। मैंने पूछा- कहां चली जाऊं, वो भी इतनी रात में, आखिर बात क्या है। वो लगभग चिल्लाते हुए बोले- बिकरू में लड़ाई हो गई है। गोलियां चल गई हैं। तुम लोगों की जान को खतरा है। जो कह रहा हूं, वो करो। ये कहकर विकास ने फोन रख दिया। लड़ाई की बात पर मुझे विकास पर गुस्सा तो बहुत तेज आया। गांव में अक्सर उनकी लड़ाइयां होती रहती थी। मैंने बेटे से गुस्से में कहा- हमें घर छोड़कर जाना पड़ेगा। मैं तंग आ गई हूं तुम्हारे पापा के लड़ाई-झगड़ों से। अब मैं इस आदमी को तलाक दे दूंगी। गुस्से में बड़बड़ाते हुए मैंने अलमारी में रखे 4500 रुपए निकाले। छोटे बेटे को लेकर लखनऊ के आलमबाग बस स्टैंड पहुंच गई। हमारे साथ हमारा कुत्ता भी था। वहां वेटिंग रूम में सोच ही रही थी कि कौन सी बस का टिकट बुक करूं, तभी टीवी में देखा कि विकास ने आठ पुलिस वालों को गोली मार दी है। ये देखते ही मेरी धड़कनें बढ़ गईं। हाथ-पैर कांपने लगे। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। मैंने अपने बेटे का हाथ कसकर पकड़ लिया और काफी देर वहीं बैठी रही। उस वक्त बड़ा बेटा 21 और छोटा बेटा 13 साल का था। उस दिन से हमारी जिंदगी पूरी तरह बर्बाद हो गई। हम दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए। गैंगस्टर तो पति था, लेकिन उसके किए की सजा हम भुगत रहे हैं। रिचा दुबे ये बताते हुए रोने लगीं। कुछ देर चुप रहीं फिर बोलीं- विकास की मौत के बाद हमारी प्रॉपर्टी और बैंक खाते सीज कर दिए गए। अपना घर छोड़ना पड़ा। मेरे बच्चों की पढ़ाई छूट गई। उस दिन घर तो छोड़ दिया, लेकिन शहर नहीं छोड़ पाई। दिन में बेटे को लेकर किसी पार्क में बैठी रहती। एक दिन पार्क की तरफ दो पुलिस वालों को आते देखा। मैंने बेटे का हाथ पकड़ा और चुपचाप वहां से उठकर दूसरे पार्क चली गई। डर लगता था कि कहीं पुलिस हमें भी न पकड़ ले। ब्रेड खाकर दिन बिताएं हैं। रात में किसी अधूरी बनी बिल्डिंग में जमीन पर ही सो जाते थे। मुझे आज भी याद है एक रात अपने छोटे बेटे के साथ अधूरी बनी बिल्डिंग में सो रही थी। बेटे को नींद नहीं आ रही थी। कई बार पूछने पर उसने कहा- मुझे भूख लगी है, इसलिए सो नहीं पा रहा। इतने पैसे भी नहीं थे कि बेटे को खाना खिला सकूं। मैंने उसे 50 रुपए दिए और कहा जाकर चाय-बिस्किट ले आ। जितने पैसे थे उसमें तो बस यही आ सकता था। बेटा पैसे लेकर चला गया। उसके जाते ही मैं फूट-फूटकर रोई। मैंने कभी नहीं सोचा था कि बच्चों को ये दिन देखना पड़ेगा। उन्हें खाने के लिए तरसना पड़ेगा। सोचने लगी कि अच्छा हुआ बड़ा बेटा पहले ही अपनी चाची के घर चला गया था। वरना उसे भी भूखे तड़पना पड़ता। खाने के लिए तरसना पड़ता। इधर-उधर भटकते हुए लगभग 8-9 दिन बीत चुके थे। 9 जुलाई की बात है। मैं बेटे के साथ रेलवे स्टेशन पर बैठी थी। वहां टीवी में देखा कि विकास ने उज्जैन के महाकाल मंदिर कैंपस में सरेंडर कर दिया है। विकास के सरेंडर करते ही मैं बेटे को लेकर घर के लिए निकल गई। वहां पहले से ही पुलिस सेंध लगाए बैठी थी। हमें देखते ही पुलिस वाले बोले- ‘बैग को एक तरफ फेंकों और घुटनों के बल हाथ ऊपर करके बैठ जाओ।’ सिर्फ मुझे ही नहीं मेरे बेटे को भी इसी तरह बैठा दिया। उसकी तस्वीरें पूरी दुनिया ने देखीं। उस वक्त एक मां होने के नाते मैं जो महसूस कर रही थी उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती। बेटे को देखकर मन ही मन सोच रही थी कि विकास के किए सजा मेरे बच्चे को मिल रही है। रिचा आगे बताती हैं कि पुलिस वालों ने हमारी तलाशी ली उसके बाद पुलिस स्टेशन ले गए। मैं वहीं विकास का इंतजार करने लगी। कुछ घंटे बीते ही थे तभी एक लेडी पुलिस वाली ने आकर बताया कि विकास दुबे पुलिस एनकाउंटर में मारे गए। मेरे शरीर से तो जान ही निकल गई थी। उस दिन मुझे समझ आया कि जिंदा लाश होना किसे कहते हैं। तब भी छोटा बेटा मेरे साथ था। बेटे ने उस दिन जो कपड़े पहने थे, घर जाते ही उसे जला दिया। उसे उन कपड़ों से नफरत हो गई। उस दिन के बाद से उसने बोलना बंद कर दिया। आज तक उसे कई बार डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। उसे कई बार समझाया कि तुम्हारे पापा ने गलत किया था। आठ पुलिस वालों को मारा था। फिर भी वो चुप ही रहता है। रिचा बताती हैं कि जिस वक्त विकास का एनकाउंटर हुआ, तब बड़ा बेटा मॉस्को से एमबीबीएस कर रहा था। उसका आखिरी साल था, लेकिन विकास की मौत के बाद वह वापस नहीं जा सका। उसकी फीस भरने के पैसे नहीं थे। फिर वह दिल्ली में रहकर पढ़ने लगा। विकास की मौत के बाद मैं खुद भी बीमार हो गई। नींद नहीं आती थी। बीपी, शुगर सब बढ़ गया। हर दिन थाने जाना पड़ता। पुलिस वाले घंटों पूछताछ करते। वकीलों के चक्कर लगाती। जो वकील कभी विकास के आगे-पीछे घूमते थे, वो मेरी शक्ल देखकर दूर से ही भाग जाते। साल 2022 तक यही सिलसिला चलता रहा। फिर एक दिन डीएम ऑफिस से एक लेटर आया। उसमें लिखा था कि आपकी पूरी प्रॉपर्टी सीज की जाएगी। अगले दिन एक पुलिस वाला घर आ आया और उसने कहा कि कल ही अपना ठिकाना ढूंढ लो, ये घर खाली कर दो। अगले दिन तेज बारिश हो रही थी। छोटे बेटे के साथ किराए का मकान ढूंढने निकल पड़ी। लखनऊ का चप्पा-चप्पा घूम लिया, लेकिन घर तो दूर किसी ने किराए पर एक कमरा तक नहीं दिया। तब बड़े बेटे को बताया कि यहां रहने का कोई ठिकाना नहीं मिल रहा। उसने हमें दिल्ली बुला लिया। हम सब दिल्ली में एक ही कमरे में रहते थे। खाना पकाने के लिए सिर्फ एक इंडक्शन और एक कढ़ाई थी। उसी में खाना बनाते थे। कई महीने तो केवल दाल-चावल बनता था। वो भी भरपेट नहीं। एक दिन घर में केवल इतना चावल बचा था कि दो लोग खा सकें। मैंने सोचा कम से कम बच्चों का पेट तो भर ही जाएगा। दाल-चावल बनते ही मैंने बच्चों को परोस दिया। कुछ देर बाद बच्चे बोले- मम्मी खाना नहीं खाओगी क्या। तब मैंने कह दिया आज भूख नहीं है, तुम लोग खा लो। एकबार कोरियर वाल पार्सल लेकर आया था। घंटी बजी तो बेटा इतना घबरा गया कि खुद को कमरे में बंद कर लिया। पूरा दिन अंदर ही बंद रहा। शाम में बड़ी मुश्किल से समझाकर उसको बाहर निकाला। उसकी हालत भी ठीक नहीं है। ज ब घर की घंटी बजती है तो वह डर जाता है। अगर कोई एक से ज्यादा बार घंटी बजा दे तो उसकी हालत खराब हो जाती है। वो कमरे से बाहर ही नहीं निकलता। हमारे घर में विकास का कोई फोटो नहीं है। न ही कोई उनका नाम लेता है। बच्चों के पास विकास का लाया हुआ एक भी सामान नहीं। रिचा बताती हैं कि जब हमारे पास गुजारा करने के पैसे नहीं बचे तो दोनों बेटों ने छोटी-मोटी नौकरियां ढूंढ़ी। अब दोनों अलग-अलग शहरों में हैं। अपनी पहचान भी छिपाकर रखते हैं। जब भी हम तीनों घर पर होते हैं, हमारी आपस में कोई बात नहीं होती। विकास की मौत के बाद अखबारों में मेरे लिए जाने क्या-क्या छपा। किसी ने छापा- अब बिकरू की कमान रिचा के हाथ रहेगी, रिचा बंदूक उठाएंगी। जिसे देखो वो मेरे बारे में लिख रहा था। किताबें छप गई, फिल्में बन गईं। मेरी दिमागी हालत और बिगड़ने लगी। लगता था कि बीपी बढ़ा हुआ। हमेशा मन में घबराहट होती। ऐसे लगता कि मरने पर सब ठीक हो जाएगा। छोटे-मोटे इलाज से फर्क नहीं पड़ा तो मेदांता अस्पताल में दिखाना पड़ा। रिपोर्ट में कुछ नहीं आया। डॉक्टरों ने काउंसलिंग की सलाह दी। पहले तो मैंने डॉक्टर से भी अपनी पहचान छिपाई, लेकिन बाद में सच बताना पड़ा। विकास का नाम सुनते ही डॉक्टर चौंक गए। कहने लगे कि रोज-रोज यहां आना मंहगा पड़ेगा। ऑनलाइन काउंसलिंग लीजिए। मैंने काफी दिनों तक ऑनलाइन काउंसलिंग ली। आज भी जब आंखें बंद करती हूं तो सारा मंजर सामने आता है। विकास की मौत से पहले का और बाद का भी। पत्नी होने के नाते सभी मामलों में सारी जांचे मेरे ही ऊपर आईं। ईडी, इनकम टैक्स और तमाम झूठे मुकदमें। विकास मुझसे 8-10 साल बड़े थे। मेरे भाई के दोस्त थे। घर आना-जाना था। धीरे-धीरे हमें एक दूसरे से प्यार हो गया। वो ब्राह्मण थे और मैं कायस्थ। परिवार इस शादी के लिए राजी नहीं हुआ। छह-सात साल के रिलेशन के बाद साल 1996 में हमने कोर्ट मैरिज कर ली। साल 2022 में हमारी 25वीं सालगिरह थी। विकास ने वादा किया था कि हम दोबारा शादी करेंगे। उन्होंने कहा था कि तुम लहंगा पहनना, मेहंदी लगाना, मैं घोड़ी पर आऊंगा और हम अपने सारे शौक पूरे करेंगे। जिस दिन हमारी एनिवर्सरी थी उस दिन तो रो रोकर मेरा बुरा हाल हो गया था। कोर्ट कचहरी के खर्च उठाने के लिए जेवर बेचने पड़े। दो सोने के कड़े, दो मंगलसूत्र, अंगूठियां बेचकर वकील की फीस भरी। बहुत मायूस होकर रिचा कहती हैं कि बच्चों की पढ़ाई नहीं रोकनी चाहिए थी। बच्चे अगर गुंडई बदमाशी करते तो उनको वैसी सजा दी जाती। बच्चे पढ़ने वाले थे, मैं मानती हूं कि विकास ने गलती की, लेकिन उसकी सजा बच्चों को नहीं देनी चाहिए थी। रिचा कहती हैं कि विकास ने जो भी किया, मुझे उसका पछतावा है। उसने जिन आठ पुलिसवालों को गोली मारी, मैं उनके परिवार से हाथ जोड़कर माफी मांगती हूं। अगर विकास ने मुझे बताया होता कि उसने पुलिस वालों को गोली मार दी है, तो मैं उस दिन घर छोड़ती ही नहीं। मेरा तो विकास से झगड़ा ही केवल गांव की सियासत को लेकर होता था। कितनी बार उनको समझाया कि ये सब छोड़ दो। डर था कि कोई बच्चों को नुकसान न पहुंचा दे। मुझे हमेशा इस बात का अफसोस रहेगा कि विकास ने अगर मेरी थोड़ी सी भी सुनी होती तो आज जिंदगी कुछ और होती। गांव छोड़कर कानपुर रहने लगी। फिर बाद में बच्चों के साथ लखनऊ रहने लगी। लेकिन विकास बिकरू में ही रहे। कई बार विकास ने कहा कि मैं बच्चों के साथ रहूंगा, उन्हें स्कूल छोड़ने जाऊंगा। फिर गांव से कोई फोन आता, ये फिर चले जाते। महीनों-महीनों वहीं रहते। पति जब थे तब भी जिंदगी मुश्किल थी, उनके जाने के बाद और ज्यादा मुश्किल हो गई। मुश्किल से आंसू रोकते हुए रिचा कहती हैं कि विकास की लड़ाइयां कभी मुझ तक नहीं पहुंचीं। उस दिन भी अगर में बिकरू में होती तो ये सब न होता। शायद ये सुनकर लोग मुझपर हसेंगे, लेकिन वे मुझसे डरते थे। कभी बहस हो जाती थी, तो मैं फोन बंद कर लेती थी। विकास घबरा जाते थे। विकास को मेरे लंबे बाल बहुत पसंद थे। उनसे कुछ भी करवाने के लिए मैं बाल कटवा लेने की धमकी देती थी। उनके जाने के बाद मैंने सबसे पहले बाल कटवा दिए। मैं तो सिर मुंडवा लेना चाहती थी, लेकिन बच्चों ने रोक लिया। विकास अगर जिंदा होते तो मैं उन्हें थप्पड़ मारती और तलाक दे देती। उन्हें पता चलता कि परिवार से दूर होने का दर्द क्या होता है। मैं चाहती हूं कि मेरा लखनऊ वाला घर खुल जाए, सिर्फ इसलिए कि मेरे भगवान वहीं है। बारिश में घर छोड़ते वक्त उन्हें वहीं छोड़ आई थी। मैं उनसे पूछना चाहती हूं कि 25 साल की पूजा का मुझे क्या फल मिला। विकास के एनकाउंटर के बाद कई किताबें लिखी गईं। संजीव मिश्रा ने तो किताब में बेडरूम तक की बातें लिख दीं। सब गलत है। कल को बच्चे सुनेंगे तो क्या सोचेंगे… विकास ने जो किया, उसके लिए मैं पत्नी होने के नाते सभी से माफी मांगती हूं। हर पुलिस वाले के परिवार से माफी मांगती हूं। वे मेरे पति थे, मैं इस सच को झुठला नहीं सकती। मैं शादी से खुश थी, पर उनके कर्मों से नाराज हूं। मैं किसे दोषी ठहराऊं। शायद ये मेरे ही कर्मों का फल है। ———————————– ब्लैकबोर्ड की ये कहानियां भी पढ़ें… 1- ब्लैकबोर्ड-दूसरे के बच्चे धोखे से मेरी कोख में डाल दिए:शक्ल-सूरत नहीं मिली तो DNA करवाया, आखिर कहां गए मेरे बच्चे कहानी ऐसे पति-पत्नी की जिनकी दो बेटियां हैं। इन्होंने एकबार फिर मां-बाप बनने का फैसला किया, लेकिन उम्र आड़े 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