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मांग 9 लाख टन, केंद्र ने दिया 147% सरप्लस यूरिया:फिर भी किसान परेशान, इस खरीफ के सीजन में भी 52 हजार टन DAP कम मिला




बोवनी के हर सीजन में खाद वितरण केन्द्रों पर किसानों की कतारें नजर आतीं हैं। सरकार की ओर से यह कहा जाता है कि खाद की कोई कमी नहीं हैं। सरकारी दावों के बावजूद किसानों की कतारें खाद की आपूर्ति और वितरण व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं। संसद में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, चालू खरीफ मौसम 2026 (19 जुलाई 2026 तक) के लिए मध्य प्रदेश को करीब 9.61 लाख मीट्रिक टन यूरिया की जरूरत थी, लेकिन केंद्र सरकार ने मांग से 147% अधिक यानी 14.17 लाख मीट्रिक टन यूरिया एमपी को भेज दिया। इसके बावजूद राज्य में यूरिया के लिए हाहाकार मचने की मुख्य वजह स्थानीय वितरण और प्रबंधन की अव्यवस्था है। 52 हजार मीट्रिक टन डीएपी कम मिला दूसरी ओर, किसानों के लिए असली मुसीबत डीएपी (DAP) बनी, जिसकी 3.57 लाख मीट्रिक टन मांग के मुकाबले राज्य को केवल 3.05 लाख मीट्रिक टन ही आपूर्ति हो सकी। यानी ऐन बुवाई के समय मध्य प्रदेश के किसानों को 52 हजार मीट्रिक टन डीएपी कम मिला, जिससे सोसायटियों पर कतारें लग गईं। यूरिया भरपूर, डीएपी की कमी संसद के आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मध्य प्रदेश में समस्या खाद की कुल कमी की नहीं, बल्कि डीएपी की आपूर्ति में आई सीधी गिरावट की है। जहां यूरिया मांग से 4.56 लाख टन अधिक उपलब्ध कराया गया, वहीं डीएपी में 52,000 टन का बड़ा घाटा दर्ज किया गया। एनपीकेएस (NPKS) खाद भी मांग (4.21 लाख टन) के मुकाबले 6.67 लाख टन (सरप्लस) उपलब्ध कराई गई है। डीएपी की इस कमी के कारण ही सोसायटियों पर धक्का-मुक्की और हंगामे की स्थितियां बनीं। कैसे तय होती है खाद की सप्लाई? केंद्र सरकार द्वारा देश भर में खाद की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक बहुस्तरीय व्यवस्था अपनाई जाती है। फसल सीजन शुरू होने से पहले कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DAFW) मध्य प्रदेश सरकार के साथ चर्चा करके माह-वार आवश्यकता तय करता है। तय आवश्यकता के आधार पर उर्वरक विभाग हर महीने राज्यवार आवंटन जारी करता है। सब्सिडी वाली सभी खादों की रैक (ट्रेन) आवाजाही की निगरानी एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (iFMS) वेब-पोर्टल से डिजिटल रूप से की जाती है। हर हफ्ते केंद्र और राज्य कृषि अधिकारियों के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वास्तविक समय में आ रही दिक्कतों को दूर किया जाता है। खाद आवंटन केंद्र का, लेकिन खेत तक पहुँचाने की जिम्मेदारी किसकी? संसद में पेश जवाब में साफ तौर पर स्पष्ट किया गया है कि केंद्र सरकार का काम राज्यों की आवश्यकता के अनुसार रेलवे रैक के माध्यम से राज्य सीमा तक खाद का आवंटन पहुंचाना है। इसके बाद राज्य के भीतर जिलावार, ब्लॉकवार और सोसायटियों तक खाद का सुचारू और पारदर्शी वितरण करने का पूरा जिम्मा राज्य सरकार का होता है। यूरिया का सरप्लस स्टॉक होने के बावजूद सोसायटियों पर लाइनें लगना स्थानीय प्रशासनिक और वितरण तंत्र पर सवाल खड़े करता है। यूरिया उत्पादन में MP का अपना ‘पावरहाउस’ मध्य प्रदेश न केवल खाद का उपभोक्ता है, बल्कि देश का एक प्रमुख यूरिया उत्पादक राज्य भी है। राज्य में स्थापित यूरिया इकाइयाँ लगातार भारी उत्पादन कर रही हैं। 2004-2014 के दौरान एमपी में औसतन 18 से 21 लाख मीट्रिक टन यूरिया का सालाना उत्पादन होता था। 2022-23 में मप्र ने 22.37 लाख मीट्रिक टन का उच्चतम उत्पादन दर्ज किया था। वर्तमान स्थिति में वर्ष 2025-26 में 19.73 लाख टन यूरिया उत्पादन हुआ और चालू वित्त वर्ष 2026-27 में केवल जून 2026 तक ही 5.40 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया जा चुका है। यूरिया उत्पादन बढ़ाने केन्द्र ने 6 नई यूनिट शुरु की देश में यूरिया आयात पर निर्भरता खत्म करने के लिए सरकार ने वर्ष 2014 के बाद कई बड़े नीतिगत कदम उठाए हैं। 6 नई इकाइयां रामागुण्डम (तेलंगाना), गोरखपुर (यूपी), सिंदरी (झारखंड), बरौनी (बिहार), पानागढ़ (पश्चिम बंगाल) और गड़ेपान-III (राजस्थान) में 12.7 लाख टन वार्षिक क्षमता के नए प्लांट शुरू किए गए। उत्पादन क्षमता बढ़ाई देश की कुल यूरिया उत्पादन क्षमता 2014-15 के 207.54 लाख टन से बढ़कर 2026-27 में 269.42 लाख मीट्रिक टन हो गई है। हाल ही में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने यूरिया क्षेत्र में नए निवेश को आकर्षित करने के लिए राष्ट्रीय यूरिया निवेश नीति-2026 को मंजूरी दी है। तालचेर (ओडिशा) में कोयला गैसीकरण पर आधारित 12.7 लाख टन क्षमता का ग्रीनफील्ड संयंत्र और नामरूप (असम) में नया परिसर तैयार किया जा रहा है। डीएपी के बजाए एनपीकेएस का इस्तेमाल करें किसान संसद में पेश रिपोर्ट के अनुसार, जहां डीएपी की 52 हजार टन कमी है, वहीं डीएपी के बेहतर विकल्प के रूप में उपलब्ध एनपीकेएस (NPKS) खाद की उपलब्धता मध्य प्रदेश में काफी अधिक है। एनपीकेएस की मांग 4.21 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 6.67 लाख मीट्रिक टन (2.46 लाख टन सरप्लस) रही। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, किसानों को केवल डीएपी पर निर्भर रहने के बजाय एनपीकेएस जैसे संतुलित उर्वरकों के इस्तेमाल के प्रति जागरूक करने की जरूरत है।



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