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हाथ हैं, लेकिन पैरों से चलती है वंदना की जिंदगी:जिस्म कंपकंपाता है, जुबान साथ नहीं देती; आखिरी ख्वाहिश- अमिताभ बच्चन से मिलना चाहती हूं




दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ‘ऐ जिंदगी’ में आज कहानी वंदना कटारिया की, जिसके लिए मैं नीरज झा पहुंचा हूं गुजरात के जैतपुर शहर- वक्त- शाम के करीब 4 बजे। मूसलाधार बारिश हो रही है। जैतपुर की तंग गलियों से गुजरते हुए एक शख्स से पूछा- वंदना कटारिया का घर कहां है? उसने एक पुरानी तीन मंजिला बिल्डिंग की ओर इशारा करते हुए कहा- वो कोने वाली दुकान वंदना दीदी की है। वहीं मिलेंगी। छोटी-सी दुकान में कुर्सी पर एक औरत बैठी हैं। दुकान पर एक शख्स आया। बोला- वंदना दीदी, चिप्स का पैकेट देना। पास ही एक छोटी टेबल रखी थी। ग्राहक ने उसी पर 10 रुपए रख दिए। वंदना ने इस सिक्के की तरफ हाथ की बजाय पैर बढ़ाया। लेकिन उनके पैर कंपकंपाते हुए पहले दाईं फिर बाईं ओर मुड़ गए। उन्होंने दोबारा कोशिश की। इस बार दोनों पैरों के पंजे से सिक्के को छू तो लिया, लेकिन पकड़ नहीं पाईं। इसके बाद तीसरी, फिर चौथी कोशिश… आखिरकार बड़ी मशक्कत के बाद दाएं पैर की उंगलियां ने किसी तरह सिक्के को दबोच लिया। फिर उन्होंने धीरे-धीरे पैर खींचते हुए सिक्के को टेबल के एक कोने तक सरका लिया। …लेकिन अभी एक और परीक्षा बाकी है। ग्राहक को चिप्स देना। वंदना कुर्सी पर बैठी-बैठी दूसरी ओर मुड़ी। पहले गर्दन, फिर कंधे और फिर कमर, लेकिन शरीर का एक हिस्सा, दूसरे हिस्से का साथ नहीं देता। एक पल के लिए उनका संतुलन बिगड़ा। ऐसा लगा कि कुर्सी से गिर पड़ेंगी। उन्होंने खुद को संभाला और दीवार पर टंगे चिप्स के पैकेट की ओर पैर बढ़ाया। पैरों की उंगलियों से धीरे-धीरे चिप्स का पैकेट खींचकर टेबल पर रख दिया। ग्राहक ने पैकेट उठाया और चला गया। वंदना जस की तस कुर्सी पर बैठ गईं। जो काम अमूमन कुछ सेकंड में हो जाते हैं, उन्हें पूरा करने में वंदना को कई मिनट लग जाते हैं। वजह – शरीर उनके कंट्रोल में नहीं है। हाथ कंपकंपाते हैं। गर्दन सीधी नहीं रहती, बार-बार झटक जाती है। होंठ हिलते हैं, लेकिन शब्द मुंह से बाहर निकलते-निकलते खो जाते हैं। बैठना, चलना, बोलना, खाना, पीना जैसे काम वंदना के लिए हर दिन की जद्दोजहद बन चुके हैं। तभी, एक बुजुर्ग आए। बाल काले-सफेद, चेहरे पर झुर्रियां। उन्होंने अपना नाम अशोक मेहता बताया। वे कहते हैं- 22 साल से मैं इसकी देखभाल कर रहा हूं। न इसकी मां है, न बाप। एक भाई है, वो भी सिर्फ नाम का। बिल्डिंग के गेट के पास मेरी फल की दुकान है। इसलिए वंदना की दुकान भी यहीं खुलवा दी, ताकि नजर रहे। अशोक यह कहते-कहते रुक गए। फिर बोले- दिनभर घर में अकेली बैठी रहे, उससे अच्छा है यहां लोगों के बीच बैठे। पहले इसी दुकान में एसटीडी-पीसीओ चलता था। वक्त बदला, तो उसे बंद करना पड़ा। अब चिप्स, नमकीन और बिस्किट रख दिए हैं। कोई ग्राहक आ जाए, तो 50–100 रुपए मिल जाते हैं। इससे ज्यादा खुशी उसे इस बात पर होती है कि वह अपने दम पर कुछ कर रही है। यह बिल्डिंग, यह मार्केट, सब इसके पिता का है। तभी बच्ची का हाथ थामे सीढ़ियों से एक शख्स उतरा। कुछ पूछने से पहले ही बोला- मैं भावेश हूं, वंदना का छोटा भाई। वंदना के बारे में बात करने से मना करते हुए वो कहते हैं- माफ कीजिए, मैं कुछ नहीं बता पाऊंगा। जो भी बात करनी है, अशोक भाई या उनके छोटे भाई हितेश से कर लीजिए। मेरी बेटी 6 साल की है, लेकिन दिखती 6 महीने की बच्ची जैसी। डॉक्टरों ने कहा है कि उसे वंदना जैसी बीमारी है। अब बताइए, पहले अपनी बेटी को संभालूं या 45 साल की बहन को? इतना कहकर वो चले गए। अशोक कुछ पल तक भावेश को जाते हुए देखते रहे। फिर बोले- बातें बनाना आसान है। अपने खून का साथ आखिर कौन छोड़ता है। मां-बाप थे, तब तक घर भी एक था और परिवार भी। उनके जाने के बाद सब बदल गया। इस बिल्डिंग की दुकानों के एक हिस्से से वंदना को महीने का 12 हजार रुपए किराया मिलता है। इसी से उसका गुजारा चलता है। मैं फल की रेहड़ी लगाता हूं। जितना बनता है, कर देता हूं, लेकिन हर जरूरत पूरी करने की हैसियत कहां है। मेरी आंखें अगर अभी मुंद जाएं, तो इसे पूछने वाला कोई नहीं। मैं तो खुद को धनवान समझता हूं कि भगवान ने इसके लिए मुझे भेजा है। अंतिम सांस तक इसकी सेवा करूंगा। चलिए, अब इसे घर ले चलते हैं। आगे की बात वहीं करेंगे। अशोक वंदना को कुर्सी से उठाते हैं। कुर्सी के पास ही उसकी जूतियां रखी हैं। वंदना दोनों पैरों को धीरे-धीरे जूतियों की तरफ बढ़ाती हैं, लेकिन पैर सीधे जूतियों तक पहुंचते ही नहीं। कभी दायां पैर दूसरी तरफ मुड़ जाता, तो कभी बायां पैर। वह गहरी सांस लेकर फिर कोशिश करती हैं, लेकिन शरीर धोखा दे जाता है। ये सिलसिला करीब 1 मिनट तक चला। तब कहीं जाकर वंदना के दोनों पैर जूतियों के भीतर पहुंचे। अशोक के सहारे वंदना ने धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ाए, लेकिन पैर बार-बार अपनी दिशा बदलते हैं। अशोक तुरंत उन्हें संभालते हैं। दो-तीन कदम चलने के बाद वंदना के शरीर का संतुलन डगमगाया। हाथ कांपने लगे। चेहरा भी सिकुड़ गया। ऐसा लगा, जैसे शरीर का हर अंग रुक जाने की जिद कर रहा हो। दोनों धीरे-धीरे कमरे की तरफ बढ़े। चलते-चलते अशोक बताते हैं- छह साल पहले इसकी मां चल बसीं। जब तक वह थीं, वंदना उन्हीं के साथ ऊपर वाले कमरे में रहती थी। इसके भैया-भाभी भी साथ रहते थे। मां का स्वभाव सख्त था, इसलिए सब वंदना का ध्यान रखते थे। उनके जाने के बाद, कोई इसकी देखभाल नहीं करता था। अकेली पड़ी रहती थी। तब मैंने इसे नीचे वाले कमरे में शिफ्ट किया। अब यहीं रहती है। जिस दुकान में आपने इसे बैठे देखा, वहीं मैं खाना भी बनाता हूं। पहले इसे अपने हाथों से खिलाता हूं, फिर खुद खाता हूं। अशोक कमरे के एक कोने की ओर इशारा करते हैं। कहते हैं- वहां फर्श पर गद्दा बिछा है। वंदना वहीं सोती है। बार-बार पलंग पर चढ़ाना-उतारना मुश्किल होता है, इसलिए जमीन पर सुला देता हूं सुबह एक हेल्पर आती है। वही इसे नहलाती है, कपड़े बदलवाती है, झाड़ू-पोंछा करती है। बाकी दिनभर जो बन पड़ता है, मैं कर देता हूं। आप इनके क्या लगते हैं? कुछ पल तक चुप रहने के बाद अशोक बताते हैं- मैं कोई नहीं हूं। न रिश्तेदार, न पड़ोसी। 1998 की बात है। मैं यहीं बिल्डिंग के बाहर फल की रेहड़ी लगाता था। तभी वंदना के पिता मनीलाल कटारिया से पहचान हुई। मनीलाल भाई, वंदना को जान से ज्यादा चाहते थे। हमेशा कहते थे- ये मेरी पहली संतान है। जब तक जिंदा हूं, इसे किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा। उन्हें शराब की लत थी। एक दिन तबीयत इतनी बिगड़ी कि अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मैं ही लेकर गया था। जांच में पता चला कि पेट में पानी भर गया है। तब वंदना 17 साल की थी। तीसरे दिन डॉक्टरों ने कह दिया कि अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। आखिरी वक्त में मनीलाल भाई ने मुझे बुलाया। मेरा हाथ पकड़ा और कहा- अशोक भाई, एक जिम्मेदारी देकर जा रहा हूं। मेरे बाद मेरी वंदना का ख्याल रखना। मैं जानता हूं, मेरे जाने के बाद इसे कोई नहीं देखेगा। मैंने उनसे वादा किया- जब तक मेरी सांस चलेगी, तब तक वंदना कभी अकेली नहीं होगी। उस एक वचन ने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी। घर में कई बार मेरी शादी की बात चली। हर बार मैंने मना कर दिया। कहा- मैं हनुमान भक्त हूं। ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा। न शादी करूंगा, न अपना परिवार बसाऊंगा। डर था, अगर मेरा अपना परिवार हो गया, तो कहीं मनीलाल भाई को दिया हुआ वचन अधूरा न रह जाए। बोलते-बोलते अशोक उठ जाते हैं। कहते हैं- ये सब मत पूछिए। दिल दुखता है। कुछ देर बाद उन्होंने एक स्ट्रॉ लगी बोतल वंदना की तरफ बढ़ा दी। वो पैर से बोतल को पकड़कर मुंह तक ले जाती हैं। एक घूंट पानी खींचती हैं। लेकिन पानी निगलना भी उनके लिए आसान नहीं है। जैसे ही पानी गले से नीचे उतरा, वंदना की गर्दन झटके से पीछे की ओर खिंच गई। चेहरे की मांसपेशियां तन गईं। मानो शरीर में किसी ने करंट दौड़ा दिया हो।
अशोक कहते हैं- इसके शरीर का कोई भी अंग इसके कंट्रोल में नहीं है। जो हरकतें आप देख रहे हैं, इन्हीं के साथ इसने पूरी जिंदगी काटी है। 1981 में इसका जन्म हुआ था। तारीख याद नहीं। इसकी मां होतीं, तो आपको बता देतीं। वंदना के जन्म वाले दिन तो किसी को कुछ समझ नहीं आया। लेकिन दूसरे दिन उसके हाथ-पैर अपने आप कांप रहे थे। मां-बाप को लगा कि शायद नवजात बच्चे में ऐसा होता होगा। लेकिन महीने बीतते गए, चिंता बढ़ती गई। वंदना दिनभर बिस्तर पर पड़ी रहती थी। वंदना के पिता उसे पहले जैतपुर के डॉक्टरों के पास ले गए। फिर राजकोट। लेकिन हर जगह डॉक्टरों ने यही कहा- दिमाग या नसों से जुड़ी कोई बड़ी बीमारी है। यहां जांच नहीं होगी। किसी बड़े अस्पताल ले जाइए। इसके बाद, वंदना को अहमदाबाद, मुंबई, डॉक्टरों ने जहां भेजा, मनीलाल वहां पहुंच गए। कई जांचों के बाद डॉक्टरों ने बीमारी का नाम बताया- सेरेब्रल पाल्सी (सीपी)। और कहा- बीमारी के साथ ही इसे जीना होगा। वंदना के चार साल बाद छोटा भाई भावेश हुआ। वो एकदम ठीक था। लेकिन 1998 में मनीलाल भाई की मौत के बाद पूरा घर बिखर गया। मेरा छोटा भाई हितेश ही उनका अस्थि कलश लेकर हरिद्वार गया था। मनीलाल भाई मुझसे कहते थे- अशोक, बेटी के इलाज में 5 लाख रुपए लगा दिए। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़़ा। पिता के जाने के बाद वंदना की पूरी दुनिया उसकी मां बन गईं। वो प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थीं। मां ही उसे नहलाती थीं, कपड़े पहनाती थीं, खाना खिलाती थीं। पिता के जाने के बाद भी वंदना की मां ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी। 2004 में मुंबई के मशहूर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अशोक जौहरी का पता चला। बताया गया कि वह साल में कुछ दिन मुंबई में मरीज देखते हैं, बाकी समय विदेश में रहते हैं। बड़ी मुश्किल से अपॉइंटमेंट मिला। लेकिन किस्मत ने यहां भी साथ नहीं दिया। जिस दिन वंदना को दिखाना था, उससे ठीक दो दिन पहले भावेश का एक्सीडेंट हो गया। वह 15 दिनों तक भर्ती रहा। हालात ऐसे बने कि वंदना को मुंबई नहीं ले जा पाए। धीरे-धीरे परिवार ने भी मान लिया कि जब कोई इलाज ही नहीं है, तो अस्पतालों के चक्कर काटने से क्या फायदा। वक्त गुजरता गया। मां के जाते ही भाई इसी बिल्डिंग में अलग रहने लगा। उसका अपना परिवार है। पत्नी है, बच्चे हैं, उसकी भी अपनी जिम्मेदारियां हैं। इसी बीच मेरी नजर वंदना के कमरे की दीवारों पर पड़ी। जगह-जगह अमिताभ और अभिषेक बच्चन की तस्वीरें लगी हैं। क्या आप अमिताभ बच्चन की फैन हैं? वंदना गर्दन को संभालने की कोशिश करती हैं। शब्दों को बाहर आने में वक्त लगता है। फिर रुकते-रुकते कहती हैं- बचपन से पसंद करती हूं। एक बार उनसे मिलने के लिए फाइल भी तैयार की थी। एक शूटिंग के लिए वो यहां आए थे, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई। आखिरी इच्छा है एक बार अमिताभ बच्चन से मिल लूं। इतना कहते ही वो जमीन पर घिसटते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करती हैं। गर्दन को मोड़कर धीमी आवाज में कहती हैं- कई बार दिल करता था कि अपनी जिंदगी खत्म कर दूं। मन में बार-बार सवाल उठता था कि भगवान ने मुझे ऐसी जिंदगी क्यों दी, जहां हर जरूरत के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। फिर मां की बात याद आ जाती है। वो कहती थीं- कोई कमजोर नहीं होता। भगवान हर इंसान को किसी खास वजह से भेजते हैं। बस इन्हीं शब्दों ने मुझे संभाल रखा है। मां की वजह से ही मैं बीकॉम कर पाई। उन्होंने डिस्टेंस लर्निंग से मुझे पढ़ाया। मैं लिख नहीं पाती थी, इसलिए परीक्षा देने मेरे साथ राइटर बैठता था। इतने में अशोक के भाई हितेश आए। वे जैतपुर बस स्टैंड के पास अपनी दुकान चलाते हैं। वे बताते हैं- मेरी अपनी जिम्मेदारियां हैं, लेकिन वंदना को देखकर यही लगता है कि अगर मेरी बच्ची के साथ ऐसा होता, तो क्या मैं उसे अकेला छोड़ देता। इसकी जितनी सेवा बन पड़ती है, हम लोग करते हैं। सरकार की तरफ से आज तक कोई बड़ी मदद नहीं मिली। हर महीने सिर्फ एक हजार रुपए मिलते हैं। कई लोग आए। मदद का भरोसा दिया,. लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। वंदना से मिलने के बाद बतौर रिपोर्टर मैं अहमदाबाद के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस पहुंचा। यहां पीडियाट्रिक न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. संजीव मेहता से मिला। डॉ. मेहता, वंदना के बारे बताते हैं- हमारे शरीर का हर हिस्सा दिमाग के इशारों पर काम करता है। उठना, बैठना, चलना, बोलना, खाना निगलना और हाथ-पैर हिलाना, हर काम का आदेश दिमाग देता है। अगर दिमाग का वह हिस्सा, जो इन गतिविधियों को नियंत्रित करता है, ठीक से विकसित नहीं होता, तो बच्चे को सेरेब्रल पाल्सी हो सकती है। इसकी शुरुआत अक्सर मां के गर्भ में ही हो जाती है। जब बच्चे का दिमाग बन रहा होता है, तब उसकी कुछ कोशिकाएं और तंत्रिका मार्ग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। कई मामलों में LIS1, DCX, TUBA1A और ARX जैसे जीन में गड़बड़ी भी इसकी वजह बनती है। हालांकि हर मामला जेनेटिक नहीं होता। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान होने वाली दिक्कतें भी इसका कारण बन सकती हैं। डॉ. मेहता बताते हैं कि लेबर पेन शुरू होने के बाद अगर प्रसव लंबा खिंच जाए या समय रहते सामान्य प्रसव और सर्जरी के बीच फैसला न लिया जा सके, तो बच्चे के दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इससे दिमाग की कोशिकाओं को स्थायी नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे का रोना बहुत जरूरी माना जाता है। इससे उसके फेफड़े ठीक से काम करने लगते हैं और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है। वंदना के लक्षण एटेक्सिक सेरेब्रल पाल्सी से मिलते हैं। यह बीमारी का सबसे दुर्लभ प्रकार माना जाता है। इसमें शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है और हाथ-पैर लगातार कांपते रहते हैं। डॉ. मेहता कहते हैं कि फिलहाल सेरेब्रल पाल्सी का कोई स्थायी इलाज नहीं है। दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्से की सर्जरी भी संभव नहीं है। अगर मरीज खुद बैठ सकता है और कुछ काम कर सकता है, तो उसकी उम्र 50-55 साल तक हो सकती है। गर्भावस्था के 24 से 28 सप्ताह के बाद भ्रूण का एमआरआई करके पता लगाया जा सकता है कि बच्चे का दिमाग विकसित हो रहा है या नहीं। ———————————- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पढ़ें… 1- शादी के दिन आंतें फटीं, 5 महीने खुला रहा पेट:सूप पिया तो छाती से बह निकला, हनीमून पर भी नहीं जा पाया 6 मार्च 2022 की शाम। कोलकाता के एक बैंक्वेट हॉल में हमारी शादी की पार्टी चल रही थी। मेहमानों की भीड़ थी। सभी बधाइयां दे रहे थे, फोटो खिंचवा रहे थे। कोई लिफाफा दे रहा था, तो कोई गिफ्ट। सामने पूरा परिवार, रिश्तेदार और दोस्त गानों की धुन पर झूम रहे थे। इसी बीच, मेरे पेट में तेज दर्द उठा। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें… 2- सिर से जुड़ीं दो बहनें अब अलग नहीं होना चाहतीं: सलमान खान ने बहन बनाया, इलाज का वादा किया, अब फोन तक नहीं उठाते ये हैं सबा और फरहा। उम्र 24 साल। दोनों का जन्म एक दिन, एक समय और एक ही मां की कोख से हुआ, सो ये जुड़वां कहलाती हैं। लेकिन… इनके जिस्म अलग-अलग नहीं, सिर से आपस में जुड़े हैं। वो भी इस तरह कि दोनों एक दूसरे को देख नहीं सकतीं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…



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