देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले
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हड़प्पा कालीन मुहर में एक प्राचीनकालीन देवी को दो बाघों से लड़ते हुए दिखाया गया है।
बीसवीं सदी के अंत में कई नारीवादियों का मानना था कि कृषि की शुरुआत से पहले मनुष्यों में देवी पूजा प्रचलित थी और मानव समाज मातृसत्तात्मक तथा मातृवंशीय था। उनका तर्क था कि कृषि के विकास के बाद यह व्यवस्था बदल गई। देवताओं को अधिक महत्व मिलने लगा, देवियों को दरकिनार किया जाने लगा और अंततः एकेश्वरवाद के सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने उनका स्थान ले लिया। लेकिन भारतीय कला और ग्रंथों का अध्ययन एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। उसके अनुसार भारत में देवियों की लोकप्रियता वास्तव में 500 ईस्वीं के बाद बढ़नी शुरू हुई। उस समय बौद्ध, जैन और ब्राह्मण भारत के विभिन्न भागों में फैल रहे थे और उन्हें स्थानीय तथा गौण संस्कृतियों के देवी-देवताओं के लिए भी अपने धार्मिक संसार में स्थान बनाने पड़े।
पाषाण युग तक की कालांकित गुफाओं में देवियों की कोई छवियां नहीं मिली हैं। हड़प्पा सभ्यता की कला में पेड़ों और बाघों के साथ देवियों की कुछ रोचक छवियां अवश्य मिलती हैं, लेकिन इसके बाद लगभग 1500 वर्षों तक देवी की छवियां लगभग लुप्त हो जाती हैं। वे फिर बौद्ध, जैन और हिंदू कला के उभार के साथ दोबारा दिखाई देने लगती हैं।
प्रारंभिक बौद्ध कला में तारा देवी की कोई छवि नहीं मिलती। प्रारंभिक जैन कला में भी यक्षियां अनुपस्थित हैं। इसी प्रकार प्रारंभिक हिंदू कला में कृष्ण तो हैं, लेकिन राधा नहीं। शिव हैं, लेकिन पार्वती नहीं। लक्ष्मी की सबसे प्रारंभिक छवियां भारतीय-यूनानी सिक्कों और बौद्ध स्तूपों पर मिलती हैं। सरस्वती की प्रारंभिक प्रतिमा मथुरा के निकट स्थित लगभग 2,000 वर्ष पुराने जैन पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुई है।
इसके कुछ सदियों बाद कुषाणकालीन कला में शेर पर सवार और भैंस को वश में करती हुई देवी की प्रारंभिक छवियां दिखाई देती हैं। फिर गंगा के मैदानों, हरियाणा और पूर्वी उत्तर प्रदेश में टेराकोटा के फलकों पर रामायण के दृश्य अंकित मिलते हैं। इनमें अहल्या, अनसूया, शूर्पणखा और सीता जैसी स्त्रियों की छवियां भी शामिल हैं।
सन 500 ईस्वी के बाद से मध्य भारत में गुप्तकालीन कला में देवियों के निरूपण अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने लगते हैं। लक्ष्मी विष्णु के चरणों में विराजमान हैं, पृथ्वी को वराह समुद्र तल से बाहर ला रहे हैं और गंगा तथा यमुना देवियां डॉल्फिन तथा कछुओं पर सवार होकर मंदिरों के प्रवेशद्वारों पर खड़ी दिखाई देती हैं। 800 ईस्वीं तक आते-आते मध्य भारत के दक्षिण की तरफ स्थित एलोरा की गुफाओं में देवी के अनेक रूप उभरकर सामने आते हैं। इनमें भैंस से युद्ध करती दुर्गा, सप्त मातृकाएं, योगमाया जिनके दोनों ओर कृष्ण और बलराम हैं तथा कमल के फूल के साथ तारा देवी की छवि उल्लेखनीय हैं। हम यह तर्क दे सकते हैं कि हिंदू धर्म में देवियों को वैदिक काल से महत्व प्राप्त था। लेकिन ऋग्वेद के 1000 सूक्तों में किसी भी देवी को समर्पित सर्वाधिक सूक्त भोर की देवी ‘उषस’ के हैं और उनकी संख्या भी मात्र 21 है। इसके विपरीत ऋग्वेद में इंद्र, अग्नि, सोम, सूर्य, प्रजापति, आदित्य, वरुण और मित्र जैसे देवता प्रमुख हैं। पृथ्वी और अदिति जैसी देवियों की भूमिका अपेक्षाकृत सहायक है। हालांकि रामायण और महाभारत में महिलाओं की महत्वपूर्ण उपस्थिति है, फिर भी दोनों महाकाव्य मूलतः पुरुषों और उनकी चिंताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं।
वर्ष 1000 ईस्वीं तक आते-आते यह परिदृश्य काफी बदल चुका था और देवियां देवताओं की समकक्ष तथा संपूरक बन चुकी थीं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव का संतुलन सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा से स्थापित हुआ। बौद्ध कला में तारा देवी बुद्ध के साथ दिखाई देने लगीं। तांत्रिक बौद्ध कला में उग्र बोधिसत्त्वों के साथ उग्र डाकिनियों तथा योगिनियों का चित्रण मिलता है। जैन कला में प्रत्येक तीर्थंकर एक यक्षी से जुड़े हैं, जैसे ऋषभनाथ चक्रेश्वरी से, नेमिनाथ अंबिका से और पार्श्वनाथ पद्मावती से। राजाओं ने अपने राजपद की वैधता दुर्गा से प्राप्त की, व्यापारियों ने लक्ष्मी को महत्व दिया और विद्वानों ने सरस्वती की आराधना की।
भारत में इस्लाम के आगमन के बाद परमेश्वर का पुरुष रूप फिर से प्रमुख होने लगा। राम और कृष्ण की पूजा भगवान के रूप में होने लगी। देवी का महत्व थोड़ा कम होकर उन्हें भगवान की सहचरी, उनकी श्रद्धालु या उनकी माता के रूप में देखा जाने लगा, जिनकी रक्षा करना आवश्यक समझा गया। एकेश्वरवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण परमेश्वर को या तो निर्गुण माना जाने लगा या फिर उन्हें पुरुष रूप में प्रतिष्ठित किया गया। यही कारण है कि हिंदुत्व में अब राम को सीता के बिना, कृष्ण को राधा के बिना और शिव को पार्वती के बिना अधिक बढ़ावा दिया जाने लगा है।

