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गुरु गोरखनाथ और उनके सहयोगी योगियों की भारतभर में कई कहानियां हैं।
आज गोरखपुर में जो गोरखनाथ मंदिर है, वहां पहले घनी झाड़ियां थीं। कथा यूं है कि एक नेपाली सुंदरी ने गुरु गोरखनाथ को भोजन पर बुलाया। जानती थी योगी सिर्फ खिचड़ी खाते हैं। उसने पकवानों के थालों की तरह खिचड़ी के थाल परोसे। दूर बैठे गुरु गोरखनाथ को सुंदरी के मन में खोट नजर आई। वे गोरखपुर के पास घनी झाड़ियों में ध्यान लगाकर बैठ गए। सुंदरी इंतजार करते-करते थक गई। रोज खिचड़ी पकाती, परोसती… पर गोरख नहीं आते। खिचड़ी पकाते- पकाते पत्थरों के बीच वह खुद भी पत्थर हो गई, पर गोरख नहीं आए। उस सुंदरी का इंतहा दर्द उन पत्थरों से एक गरम पानी का चश्मा बनकर बह निकला, जहां आज भी खिचड़ी की देगें पकती हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी सत्ता-सुंदरी की खिचड़ी पक रही है। साल के अंत में या नए साल की शुरुआत में यहां चुनाव होने वाले हैं। क्या कांग्रेस पार्टी, क्या समाजवादी पार्टी, क्या भारतीय जनता पार्टी, क्या आम आदमी पार्टी, सबके अपने-अपने एजेंडे हैं। सबने अपनी-अपनी बिसात बिछा रखी है। देखना यह है कि कौन बाजी मारता है? कौन सत्ता-सुंदरी का वरण करता है या बुलावा स्वीकारता है!
जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है तो चढ़ावा-चोरी का मामला लगभग निबटा लिया गया है, इसलिए वहां भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ कोई एंटी-इंकम्बेन्सी दिखाई नहीं देती। वैसे भी पिछले लोकसभा चुनावों के परिणामों को देखकर इन विधानसभा चुनावों का कोई अंदाजा निकालना ठीक नहीं होगा। इसलिए कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में फिलहाल मौजूदा सत्ता का पलड़ा ही भारी दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी ने वैसे भी पिछले साढ़े चार साल में उत्तर प्रदेश में कोई ऐसा आंदोलन तो नहीं ही छेड़ा है, जिससे योगी सरकार बैकफुट पर आई हो। बल्कि कहना यह चाहिए कि समाजवादियों और कांग्रेस ने आंदोलनों के कई अवसर गंवाए जरूर हैं, जिनका उन्हें राजनीतिक लाभ मिल सकता था। गुंडागर्दी खत्म करने का और बाहुबलियों को ठिकाने लगाने का यश तो योगी सरकार के साथ है ही और वो दिखाई भी देता है। लोगों की बातों में। उनके चेहरों पर। जहां तक पंजाब का सवाल है, यहां नई-नवेली आम आदमी पार्टी सरकार का राज है और कई मायनों में ठीक भी चल रही है। उत्तर प्रदेश की तरह पंजाब में भी फिलहाल तो सत्ता पक्ष का ही पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। चुनाव आते-आते क्या होगा, क्या होने वाला है, ये तो भविष्य ही बताएगा। अभी से कुछ पक्का इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि चुनाव और चुनावी माहौल दरअसल बाबू देवकीनन्दन खत्री की कृति चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति की तरह है। अब बात चंद्रकांता की होगी तो चर्चा में क्रूर सिंह भी आएगा और बहुत से अय्यार भी। अब चुनाव कोई ऐसा अय्यार तो रहा नहीं कि वो देवताओं को जगाने आए! उन देवताओं को, जो लोगों के भीतर सो गए हैं। जाने कब वो दिन आएंगे, जब लोग अपने भीतर के देवताओं को जगाकर वोट देना शुरू करेंगे। अच्छे लोगों को चुनेंगे और जो अच्छे नहीं होंगे, उन्हें हराएंगे! यह किसी राजनीतिक पार्टी का मामला नहीं है, व्यक्ति का मामला है। पार्टी जो भी हो, उसके उम्मीदवार जो सही हों वे ही चुने जाने चाहिए। पंजाब, दरअसल भावनात्मक मुद्दों पर वोट देता है। यह भावना-प्रधान प्रदेश है। विभाजन का दंश अगर किसी ने सबसे ज्यादा झेला है तो वो पंजाब ही है। उन दिनों को याद करते ही पूरा पंजाब कांप उठता है। सिहरन-सी होती है। ये वही पंजाब है, जो अपने दु:खों की कहानियां कहते-कहते थक चुका है। पर लगता है ये उम्र से पहले खत्म नहीं होने वालीं। ये वही पंजाब है, जिसने लाशें देखी हैं। लाशों जैसे लोग देखे हैं। झड़पों, झगड़ों और गोलियों के बीच छाया घोर-अंधेरा समय के इतिहास के समान था। दिन हो या रात, हवा इस तरह सांय-सांय करती थी, जैसे इतिहास के पहलू में बैठ कर रो रही हो। बाहर ऊंचे-ऊंचे पेड़ दु:खों की तरह उगे हुए थे। ये पेड़ अब तक ढले नहीं। गिरे नहीं। जीवित हैं कहीं न कहीं। मन के किसी कोने में।
यही वजह है कि इस भावुक और भावना-प्रधान प्रदेश को बहुत समझदारी और गम्भीरता के साथ देखा जाना चाहिए। राजनीतिक पार्टियों को लोगों से वोट मांगते समय और लोगों को वोट देते समय। तभी पंजाब के साथ न्याय हो सकेगा। सबने चुनावों के लिए अपनी- अपनी बिसात बिछा रखी है…
यूपी और पंजाब में सत्ता-सुंदरी की खिचड़ी पक रही है। साल के अंत में या नए साल की शुरुआत में यहां चुनाव होने वाले हैं। क्या कांग्रेस, क्या समाजवादी पार्टी, क्या भाजपा, क्या आम आदमी पार्टी, सबके अपने-अपने एजेंडे हैं। सबने अपनी-अपनी बिसात बिछा रखी है।
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नवनीत गुर्जर का कॉलम:जाने कब वो दिन आएंगे, जब लोग अपने भीतर के देवताओं को जगाकर वोट देने लगेंगे
