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पॉकेट गवाह (स्टॉक विटनेस) बनाने के मामले में डिमोट होकर टीआई से सब-इंस्पेक्टर बने दिनेश वर्मा ही अकेले ऐसे जांच अधिकारी नहीं हैं, जिन्होंने खजराना थाने के 1246 केसों में सिर्फ दो ही गवाह रखे। शहर के अधिकांश थानों में ‘पॉकेट गवाहों’ का नेटवर्क आज भी सक्रिय है। अवैध हथियार, ड्रग्स-शराब, जुआ-सट्टा और छेड़छाड़ जैसे मामलों में पुलिस अब भी अपने इर्द-गिर्द घूमने वाले लोगों को गवाह बना रही है। इनमें थानों में रोजाना चाय-पानी देने वाले, पास की गुमटी पर चाय-पान-गुटखा बेचने वाले और थाने के सामने गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर शामिल हैं। कुछ पॉकेट गवाह तो बड़े पुलिस अफसरों के भी करीबी हैं, जिनका पूरा दिन थाने और कोर्ट के चक्कर काटते ही बीतता है। 2013 में इंदौर के सबसे चर्चित पॉकेट गवाह सतीश धूत की मौत के बाद पुलिस महकमे की पोल खुली थी। तब उच्च अधिकारियों ने गंभीर अपराधों में पॉकेट गवाह बनाना बंद करने के निर्देश दिए थे। हालांकि, छोटे मामलों में निचले जांच अधिकारी (आईओ) आज भी मनमाने ढंग से पॉकेट गवाह बना रहे हैं और थाना प्रभारी बिना जांच किए ही चालान पर दस्तखत कर देते हैं। खजराना में 1246 तो चंदन नगर के 165 केस में मैजिक चालक और परिचित बने गवाह कानूनी परिभाषा में ‘पॉकेट गवाह’ उस व्यक्ति को कहा जाता है, जिसे पुलिस बार-बार अलग-अलग मुकदमों में गवाह बनाती है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब उस व्यक्ति को ऐसे घटनाक्रम में भी गवाह दर्शा दिया जाता है, जहां मौके पर उसकी मौजूदगी ही संदिग्ध हो। इंदौर के ही एक मामले में यह सवाल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। हाल ही में खजराना पुलिस ने 1246 केसों में नवीन और इरशाद को गवाह बनाया था, जो थाने के सामने मैजिक चलाते थे। इसी तरह चंदन नगर पुलिस ने भी सलमान कुरैशी और आमिर उस्मान रंगरेज को 165 केसों में गवाह बना रखा था। चर्चित पॉकेट गवाह सतीश धूत : सुबह 10:30 बजे कोर्ट पहुंच जाता था, पुलिस की ओर से हजारों केसों में दी गवाही इंदौर का सबसे चर्चित पॉकेट गवाह मल्हारगंज निवासी सतीश धूत था। अप्रैल 2013 में खुद पर छेड़छाड़ का केस दर्ज होने के बाद उसने सुसाइड कर लिया था। इसके बाद हुई जांच में खुलासा हुआ कि वह अकेला ही पुलिस के हजारों केसों में गवाह था। सतीश रोज सुबह कोर्ट पहुंच जाता था और दोपहर 2 बजे तक वहीं रुकता था। फिर शाम को दोबारा कोर्ट जाता था। वह रोजाना 4 से 5 केसों में गवाही देता था और शहर के कई चर्चित हत्याकांडों तक में मुख्य गवाह था। बचाने से लेकर सजा दिलाने तक का सौदा; जांचें हुईं पर ढर्रा नहीं बदला
कानून से जुड़े सूत्रों के अनुसार, कई पॉकेट गवाह झूठी और सच्ची गवाहियां देकर ही अपना जीवन-यापन करते हैं। इन्हें कभी पुलिस से, तो कभी आरोपी या फरियादी से पैसे मिलते हैं। कई मामलों में ये आरोपियों से मोटी रकम लेकर गवाही से पलट जाते हैं और आरोपी बरी हो जाते हैं। वहीं सजा दिलाने के नाम पर भी सौदा किया जाता है। जांच अधिकारी का तबादला होते ही ये समय आने पर पुलिस के केस का समर्थन करने से मुकर जाते हैं। एडीजी की जांच में खुले थे 20 थानों के राज
वर्ष 2014-15 में पुलिस अफसरों की एक जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि जिले के 20 थानों में 40 से ज्यादा ‘फिक्स गवाह’ काम कर रहे थे। इन्हीं के नाम पर एफआईआर और केस डायरी तैयार होती थी। तत्कालीन एडीजी विपिन माहेश्वरी ने 20 थाना प्रभारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए थे। हालांकि, अफसरों के तबादले के साथ ही जांच ठंडे बस्ते में चली गई और व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आई। शहर-ग्रामीण के चर्चित पॉकेट गवाह
जांच और अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक शहर और देहात के थानों में ये नाम बार-बार गवाह के रूप में दर्ज होते रहे हैं- रघुवीर पौहरा, रणवीर, सुरेश माघरे, संजय, धीरज, वकीलसिंह, रामलाल, रामसिंह, धरमू, रमेश, महादेव, राजेश, गंगाचरण, अजय पथरोड़, राजू दीनानाथ, सुबोध पांडे, बाबूखां, सत्तारखान, मिठ्ठूलाल, रामप्रसाद, रतनलाला, रमाकांत, रतनलाल, जसवंत, नवाबखां, किशोर, नारायण, रुमाब, छगनलाल, भेरू, गणेश, छीतू, हीरालाल, अनिल, भीमसिंह, रामचंद्र, शंकरलाल, विनोद और कुंअरलाल।
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मिलीभगत से बरी करा देते और सजा दिला देते हैं….:थानों के चक्कर काटने वाले, चाय वाले, ड्राइवर आज भी पुलिस के ‘पॉकेट गवाह’
