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पानीपत के गुमनाम नायक हंसराज क्रांति कुमार:भगत सिंह के खास राजदार, जिन्हें आजादी के बाद पानीपत में जिंदा जला दिया गया




देश को आजादी दिलाने के लिए हजारों देशभक्तों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। हर साल स्वतंत्रता दिवस पर हम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद जैसे अमर शहीदों को नमन करते हैं, जिनके नाम बच्चे-बच्चे की जुबान पर रटे हुए हैं। लेकिन इतिहास के पन्नों में कई ऐसे गुमनाम नायक भी दर्ज हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजाने में अप्रत्यक्ष रूप से ऐतिहासिक भूमिका निभाई। ऐसे ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे पानीपत के हंसराज उर्फ क्रांति कुमार। एक ऐसा निडर योद्धा, जिस पर खुद शहीद-ए-आजम भगत सिंह आंख मूंदकर भरोसा करते थे। दुर्भाग्य देखिए कि जिस आजादी के लिए उन्होंने अपने जीवन के साढ़े 13 साल जेल की सलाखों के पीछे बिताए, उसी स्वतंत्र भारत में 15 मार्च 1966 को पानीपत के रामलाल चौक पर उन्हें भीड़ द्वारा एक दुकान में जिंदा जला दिया गया। महात्मा गांधी के कहने पर आंदोलन में उतरे हंसराज का जन्म और प्रारंभिक जीवन देशभक्ति के जज्बे से सराबोर था। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान जब देश में स्वतंत्रता संग्राम की लहर दौड़ रही थी, तब वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के आह्वान पर वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और आजादी के आंदोलन में पूरी तरह कूद पड़े। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठाई गई आवाज से बौखलाकर अंग्रेजों ने उन पर नकेल कसने की कोशिश की। साल 1922 में उन्हें पहली बार राजद्रोह (धारा 124) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इसके बाद से उनका जीवन जेल और स्वतंत्रता संग्राम के बीच ही बीतने लगा। अपने पूरे जीवनकाल में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के दौरान करीब साढ़े 13 साल जेल की अंधेरी कोठरियों में यातनाएं सहते हुए बिताए। भगत सिंह के संपर्क में आए और ‘हंसराज’ बन गए ‘क्रांति कुमार’ साल 1926 में हंसराज का संपर्क क्रांतिकारी आंदोलन के अग्रदूत शहीद भगत सिंह से हुआ। दोनों के बीच देश की आजादी को लेकर गहरे विचार-विमर्श हुए और हंसराज भगत सिंह की क्रांतिकारी नीतियों के साथ मजबूती से खड़े हो गए। हंसराज से क्रांति कुमार बनने के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक कहानी है। दरअसल, उस दौर में हंसराज नाम का एक व्यक्ति अंग्रेजों का जासूस बन गया था, जिसने क्रांतिकारियों की कई योजनाएं अंग्रेजों तक पहुंचाई थीं। भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनके इस सच्चे और जांबाज साथी का नाम किसी मुखबिर के नाम से मेल खाए। इसलिए शहीद भगत सिंह ने खुद उनका नाम बदलकर क्रांति कुमार रख दिया। भगत सिंह के सबसे भरोसेमंद राजदार क्रांति कुमार नौजवान भारत सभा के राष्ट्रीय महासचिव रहे, जिसकी स्थापना अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने की थी। संगठन में उनकी सक्रियता और रणनीति की वजह से वह शीर्ष क्रांतिकारियों के अत्यंत प्रिय बन गए थे। भगत सिंह का क्रांति कुमार पर इस कदर अटूट विश्वास था कि जब भी भगत सिंह को जेल के अंदर से कोई गुप्त लेख, पत्र, निर्देश या फाइल बाहर भेजनी होती थी या बाहर से कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज जेल के भीतर मंगवाना होता था, तो वह सबसे ज्यादा भरोसा क्रांति कुमार पर ही करते थे। क्रांति कुमार अंग्रेजों की सख्त पहरेदारी के बावजूद अपनी सूझबूझ से भगत सिंह के संदेशों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दिया करते थे। 1966 का काला दिन- पानीपत के रामलाल चौक पर जिंदा जलाए गए 1947 में देश के विभाजन के बाद क्रांति कुमार पानीपत आकर बस गए। उन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाया और निष्पक्ष पत्रकारिता के जरिए समाज व देश की सेवा करते रहे। लेकिन आजाद भारत का एक काला पन्ना उनकी दर्दनाक शहादत का गवाह बना। 15 मार्च 1966 को पंजाब के पुनर्गठन (पंजाब और हरियाणा के बंटवारे) के दौरान क्षेत्र में भीषण सांप्रदायिक और राजनीतिक हिंसा भड़क उठी। उपद्रवियों और हिंसक भीड़ ने पानीपत के रामलाल चौक पर जमकर उत्पाद मचाया। इसी दौरान भीड़ ने क्रांति कुमार को निशाना बनाया और उन्हें रामलाल चौक स्थित एक दुकान के अंदर बंद करके आग लगा दी। देश को अंग्रेजों से आजाद कराने वाला यह महान योद्धा आजाद भारत की वेदी पर जिंदा जलकर शहीद हो गया। सरकारी तंत्र की घोर उपेक्षा: होटलों में बर्तन धोने को मजबूर हुआ शहीद का बेटा जिस वीर क्रांतिकारी ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, आजादी के बाद का सरकारी तंत्र उन्हें और उनके परिवार को पूरी तरह भूल गया। उपेक्षा का आलम यह रहा कि क्रांति कुमार के 2 बेटों का जीवन घोर गरीबी और बदहाली में बीता। साल 2017 के आसपास जब मीडिया की नजर उनके परिवार पर पड़ी, तो हैरान कर देने वाली और आंखों में आंसू ला देने वाली सच्चाई सामने आई। शहीद का एक बेटा दिव्यांग हो चुका था, जबकि दूसरा बेटा विनय अपनी आजीविका चलाने के लिए स्थानीय ढाबों और होटलों पर लोगों के जूठे बर्तन धोने को मजबूर था। मीडिया में जब इस दर्दनाक बदहाली की खबरें प्रमुखता से छपीं और बवाल मचा, तो प्रशासनिक मदद मिलने के बजाय क्रांति कुमार का बेटा विनय अचानक संदिग्ध परिस्थितियों में गायब हो गया, जिसका आज तक कोई सुराग नहीं मिल सका।



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