इस बार का स्वतंत्रता दिवस छत्तीसगढ़ के लिए खास है। लंबे समय तक नक्सल हिंसा का दंश झेलने वाला प्रदेश अब नक्सल मुक्त हो चुका है। इस बदलाव के पीछे 1400 से ज्यादा जवानों और सुरक्षाकर्मियों की शहादत है। इन्हीं शहीदों की याद रायपुर के ऊर्जा पार्क में बनी श
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वर्ष 2012 में बनाई गई इस वाटिका में नक्सल मोर्चे पर शहीद हुए जवानों के नाम पत्थरों पर उकेरे गए हैं। शहीदों के नाम पर यहां पेड़ भी लगाए गए हैं। हरियाली के बीच ये पेड़ उन जवानों की स्मृतियों को संजोए हुए हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ में शांति और लोकतंत्र के लिए अपनी जान दी।

शहीद वाटिका में 1988 से शहीद हुए जवानों के नाम दर्ज हैं।

डिजिटल डिस्प्ले के जरिए शहीद जवानों के सेवा और वीरता की गाथा बताई जाती है।

नक्सल मोर्चे पर शहीद हुए जवानों के नाम पत्थरों पर उकेरे गए हैं।
शहीद वाटिका में पत्थरों पर दर्ज है बलिदान की कहानी
रायपुर के ऊर्जा पार्क में वर्ष 2012 में शहीद वाटिका बनाई गई थी। यहां नक्सल मोर्चे पर शहीद हुए जवानों के नाम पत्थरों पर उकेरे गए हैं। यह वाटिका सिर्फ स्मारक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के संघर्ष और बलिदान की जीवंत कहानी है।
इस वाटिका की सबसे खास बात यह है कि यहां शहीदों के नाम से पेड़ लगाए गए हैं। इन पेड़ों की हरियाली मानो उन जवानों की स्मृतियों को जिंदा रखती है। पेड़ों के पत्ते, फूल और उनसे आती हवा की सरसराहट उन शहीदों की मौजूदगी का एहसास कराती है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की धरती पर शांति और लोकतंत्र के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।
1988 से दर्ज हो रहे शहीदों के नाम
रायपुर के ऊर्जा पार्क स्थित शहीद वाटिका में शहीद जवानों के नाम शिलाओं पर दर्ज किए गए हैं। यहां 1988 से शहीद हुए जवानों के नाम दर्ज हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद नक्सल हिंसा में शहीद हुए जवानों के नाम भी लगातार इस स्मारक में जोड़े जाते रहे हैं।
2007 में सबसे ज्यादा शहादत
छत्तीसगढ़ गठन के बाद वर्ष 2025 तक 1,429 जवानों की शहादत का रिकॉर्ड यहां दर्ज है। इनमें सबसे ज्यादा जवान 2007 में करीब 200 शहीद हुए। इसके बाद 2010 में 177, 2009 में 126 और 2011 में 87 जवानों ने नक्सल हिंसा के खिलाफ लड़ाई में जान गंवाई।

हर नाम के साथ एक कहानी
ऊर्जा पार्क की शहीद वाटिका सिर्फ पत्थरों पर लिखे नामों का स्मारक नहीं है। यहां बने इंटरप्रिटेशन सेंटर में शहीद जवानों की तस्वीरें लगाई गई हैं। डिजिटल डिस्प्ले के जरिए उनके जीवन, परिवार, सेवा और वीरता की गाथा भी बताई जाती है।
शहीदो नाम के साथ पेड़ भी
शहीद वाटिका में शहीद जवानों की स्मृति में पेड़ भी लगाए गए हैं। यानी यहां दर्ज हर नाम के साथ एक पेड़ भी उनकी याद को जिंदा रखता है। शिलाओं पर उकेरे नाम और पेड़ों की हरियाली मिलकर यह एहसास कराती है कि शहीदों की यादें समय के साथ मिटती नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती हैं।

साल 2012 में तत्कालीन राज्यपाल शेखर दत्त की पहल पर शहीद वाटिका की शुरुआत हुई थी।
30 जनवरी 2012 को हुई थी शुरुआत
राजीव स्मृति वन के प्रभारी एसके बाजपेयी के मुताबिक, रायपुर के राजीव स्मृति वन (ऊर्जा पार्क) में शहीद वाटिका की परिकल्पना को आकार देने की शुरुआत 30 जनवरी 2012 को तत्कालीन राज्यपाल शेखर दत्त की पहल से हुई थी। सेना से जुड़े रहे शेखर दत्त की पहल पर शहीदों से जुड़ी जानकारी को वाटिका में प्रदर्शित करने की योजना बनाई गई।
शहीद वाटिका में छत्तीसगढ़ की धरती पर शहीद हुए जवानों के जीवन, सेवा और शहादत से जुड़ी जानकारी, तस्वीरें और डिजिटल डिस्प्ले लगाने की परिकल्पना की गई। यहां सेना, सशस्त्र बल और पुलिस के उन जवानों के नाम और जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था की गई, जिन्होंने छत्तीसगढ़ में ड्यूटी के दौरान अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

बस्तर में जवानों के शहादत की बड़ी घटनाएं

रानीबोदली में हुए नक्सली हमले में 55 जवान शहीद हुए थे। (फाइल फोटो)
2007 रानीबोदली हमला: 55 जवान शहीद
15 मार्च 2007 की रानीबोदली की घटना इन्हीं दर्दनाक घटनाओं में से एक है। आधी रात को माओवादियों ने सुरक्षा कैंप पर ऐसा हमला किया, जिसने पूरे इलाके को दहला दिया। इस हमले में 55 जवान शहीद हुए थे, जबकि 25 जवान गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

55 जवानों की शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया
रानीबोदली हमले में 55 जवान शहीद हुए और 25 घायल हुए। यह बस्तर में माओवादी हिंसा की बड़ी घटनाओं में शामिल था। हमले में सुरक्षा कैंप को निशाना बनाया गया था। इस हमले में शहीद हुए जवानों के नाम शहीद वाटिका में दर्ज हैं। इन जवानों ने माओवाद के खिलाफ अभियान के दौरान अपनी जान गंवाई थी।
रानीबोदली हमले में शहीद हुए जवानों के नाम शहीद वाटिका में दर्ज हैं। इन जवानों ने माओवाद के खिलाफ अभियान के दौरान अपनी जान गंवाई थी। रानीबोदली हमला बस्तर में माओवादी हिंसा की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा है।

76 जवानों के शवों को राजकीय सम्मान दिया गया था। (फाइल फोटो)

शहीद वाटिका में शहीदों के नाम दर्ज
दंतेवाड़ा के चिंतलनार-ताड़मेटला इलाके में हुआ नक्सली अटैक उस समय सुरक्षा बलों पर हुआ सबसे घातक माओवादी हमला था। ताड़मेटला हमले ने देश की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। इस घटना के बाद नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा रणनीति और ऑपरेशन के तरीकों को लेकर बड़े स्तर पर मंथन हुआ।
इस हमले की याद आज भी शहीद वाटिका में दर्ज है। 76 जवानों के नाम जब एक साथ सामने आते हैं तो यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होता कि उस एक दिन में कितने परिवारों ने अपने बेटे, पति या पिता को खो दिया था। आज भी ताड़मेटला का नाम बस्तर में माओवादी हिंसा की सबसे भयावह घटनाओं में लिया जाता है।

2010 में लगातार हुए इन बड़े हमलों ने यह साफ कर दिया था कि बस्तर में माओवादी संगठन सुरक्षा बलों के खिलाफ बड़े स्तर पर हमले करने की क्षमता रखता था। ताड़मेटला के बाद नारायणपुर की घटना ने सुरक्षा बलों के सामने चुनौती को और गंभीर बना दिया।

बुर्कापाल में हुआ यह हमला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि सड़क निर्माण जैसे विकास कार्यों की सुरक्षा में तैनात जवानों को निशाना बनाया गया था। माओवादी बस्तर के अंदरूनी इलाकों में सड़क और अन्य सरकारी सुविधाओं के विस्तार का विरोध करते थे। बुर्कापाल हमले के दौरान सड़क निर्माण कार्य की सुरक्षा में तैनात जवानों पर ही हमला किया गया था।

तर्रेम और जोनागुड़ा के जंगलों में हुई मुठभेड़ के बाद माओवादी सुरक्षा बलों के कुछ हथियार भी अपने साथ ले गए थे। इस हमले में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे और 30 से ज्यादा जवान घायल हुए थे। यह 2017 के बाद सुरक्षा बलों पर हुए बड़े माओवादी हमलों में शामिल था।
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भास्कर की टीम ने DRG में सेवा दे रही लक्ष्मी उर्फ सनी और जवान बामन राम से बातचीत की है।
“मैं सिर्फ 15 साल की थी, जब नक्सली मुझे अपने साथ ले गए। छोटी उम्र में हाथ में बंदूक थमा दी। जवानों को मारना सिखाया। नक्सल संगठन में रहते हुए मेरी शादी हुई, लेकिन नक्सलियों ने मेरी आंखों के सामने ही मेरे पति को सूली पर लटका दिया। आज मैं DRG में हूं और जिन्होंने बंदूक उठाना सिखाया, उन्हीं के खिलाफ लड़ रही हूं।” पढ़ें पूरी खबर…
