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Balod MLA Hiralal Sonboir Biography Included in SCERT School Syllabus


शिक्षक रहते अंग्रेजी शासन के खिलाफ बांटते थे गुप्त परचे

बालोद। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, बालोद के एकमात्र चार बार विधायक रहे पूर्व विधायक और राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षक स्व. हीरालाल सोनबोइर की जीवनगाथा अब स्कूली बच्चों को पढ़ाई जाएगी। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने उनकी जीवनी को सत्

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विद्यार्थी पाठ क्रमांक 13 के पेज 21 पर उनकी जीवनी पढ़कर स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान, संघर्ष और देशभक्ति से परिचित होंगे।

1967 में पहली बार बने विधायक

1967 में पहली बार बने विधायक

गांधीजी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े

हीरालाल सोनबोइर महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए थे। वर्ष 1933 में महात्मा गांधी के दुर्ग आगमन के दौरान वे उनके दर्शन के लिए पहुंचे थे। इसके बाद रायपुर में आयोजित गांधीजी के कार्यक्रम में भी शामिल हुए। गांधीजी से प्रभावित होकर उन्होंने जीवनभर खादी पहनने का संकल्प लिया।

शिक्षक रहते अंग्रेजों के खिलाफ चलाया अभियान

वर्ष 1930 में अर्जुंदा स्कूल में शिक्षक रहते हुए सोनबोइर अपने साथियों के साथ आसपास के गांवों में रैलियां निकलवाते और अंग्रेजी शासन के खिलाफ नारे लगवाते थे। वे ग्रामीणों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे।

डाकखाने में छिपाकर रखते थे क्रांतिकारी परचे

स्कूल में शिक्षक की जिम्मेदारी के साथ वे डाकखाने का काम भी देखते थे। इसी दौरान अंग्रेजी शासन के खिलाफ लिखे परचे डाक के डिब्बे में छिपाकर रखते और बाद में उन्हें गुप्त रूप से गांवों में वितरित करवाते थे। अंग्रेज अधिकारियों को इसकी भनक लगी तो CID से जांच कराई गई। प्रमाण मिलने के बाद उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया।

राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षक से चार बार विधायक बने

15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के समय हीरालाल सोनबोइर डौंडीलोहारा में थे। शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए वर्ष 1961 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में सम्मानित किया। इसके बाद 60 वर्ष की उम्र में वर्ष 1967 में वे पहली बार बालोद विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। वे कुल चार बार विधायक रहे।

नई पीढ़ी को प्रेरणा देगी जीवनगाथा

हीरालाल सोनबोइर का निधन 16 अप्रैल 1997 को हुआ था। अब उनकी जीवनगाथा के कक्षा-4 के पाठ्यक्रम में शामिल होने से स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका, जेल जाने का संघर्ष, गांधीजी के विचारों से प्रभावित जीवन और शिक्षक से चार बार विधायक बनने का सफर नई पीढ़ी तक पहुंचेगा। यह पाठ बच्चों के लिए देशभक्ति, त्याग, संघर्ष और सेवा की प्रेरणा बनेगा।



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