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बक्सर में इस रक्षाबंधन बाजार में भाई की कलाई पर सजने वाली राखियों में कुछ राखियां ऐसी भी होंगी, जिन्हें जेल की चारदीवारी के भीतर बंदियों ने अपने हाथों से तैयार किया है। केंद्रीय कारा बक्सर के बंदियों द्वारा तैयार की गई आकर्षक राखियां अब ‘मुक्ति’ आउटलेट के जरिए आम लोगों तक पहुंच रही हैं। अलग-अलग रंग और डिजाइन में तैयार इन राखियों की कीमत 15, 20, 25 और 30 रुपए रखी गई है। कारा महानिरीक्षक के निर्देश पर बंदियों को हुनरमंद बनाने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से कारा निर्माणशाला एवं प्रशिक्षण के माध्यम से राखियां तैयार कराई गई हैं। रक्षाबंधन के मौके पर बंदियों के हाथों से बनी ये राखियां न सिर्फ बाजार में उपलब्ध हैं, बल्कि सुधार और पुनर्वास की एक अलग कहानी भी कह रही हैं। 8 बंदियों ने मिलकर तैयार कीं राखियां केंद्रीय कारा बक्सर में संसीमित आठ सजावार बंदी राखियां तैयार करने के काम में जुटे हैं। प्रशिक्षण के बाद बंदियों ने अलग-अलग रंगों और डिजाइन की राखियां तैयार की हैं। रक्षाबंधन को देखते हुए इन राखियों को आकर्षक रूप दिया गया है। इनकी बिक्री केंद्रीय कारा बक्सर के बाहरी परिसर में संचालित ‘मुक्ति’ आउटलेट के साथ-साथ आदर्श केंद्रीय कारा बेउर और खादी मॉल पटना में भी की जा रही है। इस पहल के जरिए जेल में तैयार उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि बंदियों की मेहनत लोगों तक पहुंचे और उन्हें अपने हुनर का मूल्य मिल सके। प्रशिक्षण से नई जिंदगी की तैयारी ‘मुक्ति’ पहल का उद्देश्य बंदियों को सिर्फ जेल की अवधि पूरी करने तक सीमित रखना नहीं है। इसके जरिए उन्हें अलग-अलग कामों का प्रशिक्षण देकर भविष्य के लिए तैयार करने की कोशिश की जा रही है। राखियां तैयार करने के दौरान बंदियों को काम का व्यावहारिक प्रशिक्षण तो मिल ही रहा है, साथ ही उनकी रचनात्मक क्षमता को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। अपने हाथों से तैयार किए गए उत्पाद को बाजार में बिकते देखना उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में भी मदद कर रहा है। यह पहल इस सोच पर आधारित है कि सजा पूरी होने के बाद जब बंदी समाज में लौटें तो उनके पास कोई हुनर हो, जिसके जरिए वे सम्मानजनक तरीके से अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकें। राखी के साथ कई दूसरे उत्पाद भी तैयार केंद्रीय कारा बक्सर में बंदियों को केवल राखियां बनाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है। यहां उनके द्वारा कपड़े, साबुन, फिनाइल, तेल, मसाले, अगरबत्ती, सत्तू-बेसन, क्लीनर और फर्नीचर समेत कई उपयोगी सामान भी तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों को ‘मुक्ति’ आउटलेट के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाया जाता है। इससे एक ओर बंदियों की मेहनत को बाजार मिलता है, वहीं दूसरी ओर लोगों को रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कई सामान अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं। चारदीवारी के भीतर हुनर, बाहर बाजार जेल में रहने वाले बंदियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती समाज में दोबारा सम्मान के साथ लौटना होती है। ऐसे में प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़ी गतिविधियां उनके पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। राखियां तैयार करने की प्रक्रिया में बंदी डिजाइन, निर्माण और उत्पाद तैयार करने के अलग-अलग चरणों को सीख रहे हैं। इससे उनमें काम के प्रति रुचि और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं, ‘मुक्ति’ आउटलेट इन उत्पादों और बाजार के बीच एक कड़ी का काम कर रहा है। रक्षाबंधन पर सुधार और पुनर्वास का संदेश राखी भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और रिश्ते का प्रतीक है। ऐसे त्योहार पर जेल में बंदियों के हाथों से तैयार राखियों का बाजार तक पहुंचना सुधार और पुनर्वास की सोच को भी सामने लाता है। इन राखियों के जरिए बंदियों को यह अवसर मिल रहा है कि वे अपनी रचनात्मकता को सकारात्मक दिशा दें और समाज के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार करें। जेल की दीवारों के भीतर तैयार हुई ये राखियां इस बार सिर्फ भाई की कलाई नहीं सजाएंगी, बल्कि यह संदेश भी देंगी कि सही प्रशिक्षण और अवसर मिले तो बंदियों की ऊर्जा को रचनात्मक काम से जोड़कर उन्हें नई जिंदगी की राह दिखाई जा सकती है।
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बक्सर जेल में बंदियों ने बनाई राखियां:केंद्रीय कारा के 8 सजावार बंदियों ने तैयार कीं आकर्षक राखियां; ‘मुक्ति’ आउटलेट के जरिए बाजार में बिक्री
